इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2003 में पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आरोपी रईस को बरी कर दिया है। करीब 23 वर्ष जेल में बिताने के बाद मिली इस राहत के साथ अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा और यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने 16 फरवरी को दिए अपने फैसले में कहा कि केवल बैठकों और सम्मेलनों से न्याय व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है, बल्कि न्यायाधीशों की संख्या, स्टाफ और बुनियादी ढांचे में वास्तविक वृद्धि की आवश्यकता है।
मामले के अनुसार, 29-30 अगस्त 2003 की रात रईस पर घरेलू विवाद के बाद पत्नी और तीन बच्चों की गला काटकर हत्या करने का आरोप लगाया गया था। मृतका के मामा ने एफआईआर दर्ज कराई थी और ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को चार हत्याओं में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
अपील की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अभियोजन के प्रमुख साक्ष्य, यानी उस समय पांच वर्ष के रहे जीवित बेटे अजीम की गवाही की जांच की। जिरह में अजीम ने कहा कि उसने सूचक और एक सरकारी वकील के कहने पर बयान दिया था तथा उसे धमकाया गया था कि यदि वह उनकी बात नहीं मानेगा तो उसे घर से निकाल दिया जाएगा। अदालत ने इसे गवाही की विश्वसनीयता पर गंभीर आघात माना।
अदालत ने यह भी पाया कि सूचक और आरोपी के बीच पहले से जमीन का विवाद चल रहा था, जिससे उसके बयान की निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है।
खंडपीठ ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि मृतकों के गले लगभग शरीर से अलग होने की स्थिति में थे और ऐसी चोट किसी भारी धारदार हथियार से ही संभव है। यह अभियोजन के उस दावे से मेल नहीं खाता जिसमें साधारण चाकू से हत्या की बात कही गई थी। अदालत ने कहा कि बरामद चाकू और चिकित्सकीय साक्ष्य में स्पष्ट विरोधाभास है।
अदालत ने कहा कि घटना अत्यंत क्रूर और नृशंस थी, लेकिन उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि अपराध केवल आरोपी ने ही किया। ऐसे में संदेह का लाभ दिया जाना आवश्यक है। कोर्ट ने रईस को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।
फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि रिहाई के बावजूद आरोपी की वास्तविक पीड़ा अब शुरू होगी। संभव है कि उसके माता-पिता और भाई-बहन अब जीवित न हों, पत्नी और तीन बच्चों की मृत्यु हो चुकी है और यह भी निश्चित नहीं कि अब लगभग 25-26 वर्ष का हो चुका उसका बेटा उसे अपने साथ रखने को तैयार होगा।
इस टिप्पणी के साथ अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक त्रुटियों के मानव जीवन पर गहरे प्रभाव पड़ते हैं और ऐसी स्थितियों से बचने के लिए व्यवस्था में ठोस सुधार आवश्यक हैं।

