‘सार्वजनिक सड़कें मौत का जाल नहीं बन सकतीं’: जनकपुरी गड्ढा हादसे में ठेकेदारों को अग्रिम जमानत से दिल्ली हाईकोर्ट का इनकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने जनकपुरी में खुले गड्ढे में गिरकर 25 वर्षीय बाइक सवार की मौत के मामले में दो ठेकेदारों को अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि सार्वजनिक सड़कों को “मौत का जाल” बनने नहीं दिया जा सकता और ठेका कार्य के नाम पर मानव जीवन को जोखिम में नहीं डाला जा सकता।

न्यायमूर्ति स्वरना कांत शर्मा ने हिमांशु गुप्ता और कविश गुप्ता की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि अनुबंध के अनुसार उन पर स्थल पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम सुनिश्चित करने का स्पष्ट दायित्व था, जिसमें बैरिकेड, ब्लिंकर, बचाव उपकरण, प्राथमिक उपचार की व्यवस्था तथा पुलिस और चिकित्सा अधिकारियों को तुरंत सूचना देना शामिल था।

अदालत ने पाया कि लगभग 20 फीट लंबा, 13 फीट चौड़ा और 14 फीट गहरा गड्ढा व्यस्त सड़क के बीचोंबीच बिना किसी बैरिकेड, संकेतक या सुरक्षा व्यवस्था के खोदा गया था, जो कार्य अनुमति, टेंडर शर्तों और ट्रैफिक पुलिस की शर्तों का उल्लंघन था।

न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्थिति में “दुर्घटना होना अवश्यंभावी” था।

“यह समय आ गया है कि दिल्ली के नागरिकों को हल्के में न लिया जाए और उनके जीवन का मूल्य समझा जाए… सार्वजनिक सड़कों को मौत का जाल बनने, मानव जीवन को ठेका कार्य का ‘कोलैटरल डैमेज’ बनाने और बाद में जिम्मेदारी से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

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अदालत ने कहा कि व्यस्त सड़कों पर खुदाई कार्य करते समय लोगों के जीवन को “भगवान के भरोसे” नहीं छोड़ा जा सकता।

रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि आरोपियों और उनके सब-कॉन्ट्रैक्टर ने दुर्घटना के बाद पीड़ित की मदद करने के बजाय जल्दबाजी में संकेतक और बैरिकेड लगाकर खुद को बचाने का प्रयास किया।

अदालत ने इसे “अत्यंत चिंताजनक” बताते हुए कहा कि न तो चिकित्सा सहायता की व्यवस्था की गई, न पुलिस को सूचना दी गई और न ही आपातकालीन मदद बुलाई गई, जबकि यह ज्ञात था कि पीड़ित गड्ढे में जीवन के लिए संघर्ष कर रहा था।

“मानव जीवन के प्रति इस तरह की लापरवाही… यह दर्शाती है कि आरोपियों के लिए कानून से बचना, एक मानव जीवन बचाने से अधिक महत्वपूर्ण था।”

हाईकोर्ट ने कहा कि प्राथमिक जिम्मेदारी आरोपियों की कंपनी पर थी, जिसे दिल्ली जल बोर्ड द्वारा कार्य आवंटित किया गया था और जिसने जून 2025 में, मुख्य अनुबंध के औपचारिक आवंटन से पहले ही, सब-कॉन्ट्रैक्ट जारी कर दिया था।

अदालत ने कहा कि ठेकेदारों पर सार्वजनिक दायित्व था कि वे सावधानी बरतें और अपेक्षित सुरक्षा उपायों का पालन करें, किंतु बुनियादी सुरक्षा प्रबंधों के अभाव ने एक निर्दोष नागरिक की जान ले ली।

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न्यायालय ने कहा कि अब “दोषारोपण का खेल समाप्त होना चाहिए” और इस घटना को मात्र दुर्घटना नहीं माना जा सकता क्योंकि यह रोकी जा सकती थी।

अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए अदालत ने कहा:

“यह संदेश जाना चाहिए कि सार्वजनिक ठेका लेने वाला व्यक्ति जिम्मेदारी के साथ कार्य करे और यदि वह जिम्मेदारी से विमुख होता है तो जवाबदेही और कानून उसका पीछा करेंगे।”

यह मामला 5-6 फरवरी की रात जनकपुरी में हुए हादसे से जुड़ा है, जिसमें रोहिणी निवासी निजी बैंक कर्मचारी कमल ध्यानी की मोटरसाइकिल बिना सुरक्षा वाले गड्ढे में गिरने से मौत हो गई थी।

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ट्रायल कोर्ट पहले ही दोनों ठेकेदारों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर चुका था। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद उन्हें गिरफ्तारी से कोई संरक्षण नहीं मिला है और जांच आगे जारी रहेगी।

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