विरोधाभासी गवाही और मुख्य गवाहों की गैर-मौजूदगी ने FIR को बनाया ‘संदेहास्पद’: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 39 साल पुराने मामले में उम्रकैद की सजा रद्द की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1987 के हत्या के एक मामले में दोषी करार दिए गए खूनी लाल की आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए उसकी आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा-प्रथम की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास है। कोर्ट ने ‘समानता के सिद्धांत’ (Principle of Parity) को लागू करते हुए स्पष्ट किया कि जब समान साक्ष्यों के आधार पर सह-आरोपियों को बरी कर दिया गया हो, तो उसी साक्ष्य पर एक आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यह अपील कन्नौज, फर्रुखाबाद के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा 17 मई, 1989 को पारित निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी। निचली अदालत ने अपीलकर्ता खूनी लाल को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत मौजी लाल की हत्या का दोषी माना था, जबकि दो अन्य सह-आरोपियों, भगवान दीन और जगदीश, को बरी कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 9 मई, 1987 को शाम करीब 7:00 बजे ठठिया थाना क्षेत्र में हुई थी। शिकायतकर्ता राम सिंह और आरोपी, जो आपस में रिश्तेदार थे, के बीच चबूतरे के निर्माण को लेकर विवाद हुआ था। आरोप था कि खूनी लाल (चाकू के साथ), भगवान दीन (तमंचे के साथ) और जगदीश (भाले के साथ) ने शिकायतकर्ता के भाई मौजी लाल पर हमला किया। अभियोजन का दावा था कि सह-आरोपियों ने पीड़ित को पकड़ा और खूनी लाल ने उसकी गर्दन पर चाकू से वार किया, जिससे उसकी मौत हो गई।

कोर्ट के समक्ष दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील सिकंदर बी. कोचर ने तर्क दिया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) घटना के काफी बाद सोच-समझकर लिखवाई गई थी और तथ्यों में हेरफेर किया गया था। बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि एफआईआर में नामित प्रमुख चश्मदीद गवाहों, जिनमें शिकायतकर्ता के पिता और एक अन्य भाई शामिल थे, का अभियोजन पक्ष द्वारा परीक्षण ही नहीं कराया गया।

वकील ने शिकायतकर्ता (PW-1) की गवाही में एक महत्वपूर्ण विरोधाभास की ओर इशारा किया। जहां एफआईआर में प्रत्येक आरोपी की विशिष्ट भूमिका बताई गई थी, वहीं जिरह के दौरान PW-1 ने स्वीकार किया कि “रात में अंधेरा होने के कारण वह अपीलकर्ता को मौजी लाल पर चाकू से हमला करते हुए नहीं देख सका।” बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि निचली अदालत ने एक ही सबूत पर दो सह-आरोपियों को बरी करके और अपीलकर्ता को दोषी ठहराकर गंभीर त्रुटि की है।

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दूसरी ओर, अपर शासकीय अधिवक्ता अमित सिन्हा ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि चश्मदीद गवाहों के बयान घटना की पुष्टि करते हैं और मेडिकल रिपोर्ट भी अभियोजन के मामले का समर्थन करती है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का बारीकी से परीक्षण किया और पाया कि अभियोजन की कहानी विसंगतियों से भरी हुई है।

1. विरोधाभासी गवाहियां: कोर्ट ने नोट किया कि मुखबिर (PW-1) की गवाही एफआईआर के बिल्कुल विपरीत थी। पीठ ने कहा:

“अपनी जिरह में PW-1 राम सिंह… ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा है कि रात का अंधेरा होने के कारण वह चाकू से हमला करते हुए नहीं देख सका।”

इसके अलावा, कोर्ट ने मृतक की पत्नी (PW-3) की गवाही को भी अविश्वसनीय माना। हालांकि उसने चश्मदीद होने का दावा किया था, लेकिन जिरह में उसने स्वीकार किया कि जब शोर मचा तो वह एक फूस की झोपड़ी के अंदर थी और “अपने घर से बाहर नहीं निकली।”

2. मुख्य गवाहों का परीक्षण न होना: पीठ ने एफआईआर में नामित महत्वपूर्ण गवाहों को पेश न करने पर चिंता व्यक्त की।

“घटना के चश्मदीद गवाह के रूप में नामित प्रमुख व्यक्तियों, अर्थात् बेचे लाल, गंगा राम, जलील और केशरी का परीक्षण नहीं कराया गया है। उनके परीक्षण न कराने का कारण अभियोजन पक्ष ही बेहतर जानता है।”

3. समानता का सिद्धांत (Principle of Parity): हाईकोर्ट के निर्णय का एक मुख्य आधार यह सिद्धांत था कि अदालत समान साक्ष्यों में लिप्त आरोपियों के प्रति विरोधाभासी दृष्टिकोण नहीं अपना सकती। जावेद शौकत अली कुरैशी बनाम गुजरात राज्य (2023) और राम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024) में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा:

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“जब दो आरोपियों के खिलाफ समान या एक जैसे चश्मदीद गवाहों के साक्ष्य हों और उनकी भूमिका भी समान बताई गई हो, तो कोर्ट एक आरोपी को दोषी और दूसरे को बरी नहीं कर सकता।” कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में, “एक ही तरह के सबूतों पर एक को दोषी ठहराया गया है और दो अन्य को बरी कर दिया गया है।”

4. संदेह बनाम सबूत: कोर्ट ने पाया कि एफआईआर पुरानी रंजिश के कारण केवल संदेह के आधार पर दर्ज कराई गई प्रतीत होती है।

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“संदेह चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, वह सबूत की जगह नहीं ले सकता।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी का दोष उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। कोर्ट ने 17 मई, 1989 के दोषसिद्धि आदेश को रद्द कर दिया।

“उपरोक्त को देखते हुए, हमारा मत है कि विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा दर्ज किया गया दोषसिद्धि का निर्णय और आदेश… त्रुटिपूर्ण है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।”

परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार कर ली गई और अपीलकर्ता खूनी लाल को धारा 302 आईपीसी के आरोप से बरी कर दिया गया। कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।

  • वाद शीर्षक: खूनी लाल बनाम राज्य
  • वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1188 ऑफ 1989

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