संदेह और संभावना के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 42 साल बाद दो आरोपियों को किया बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1983 के एक हत्या और हत्या के प्रयास के मामले में दो व्यक्तियों की सजा को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि केवल “संभावना या संदेह” के आधार पर नहीं टिकी हो सकती। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने अभियोजन पक्ष के सबूतों में गंभीर खामियां पाते हुए जीवित बचे अपीलकर्ताओं, नत्थी और भरत को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) दिया और उन्हें बरी करने का आदेश दिया।

हाईकोर्ट ने यह फैसला 12 मार्च, 2026 को दो संबद्ध अपीलों (क्रिमिनल अपील नंबर 639/1984 और 428/1984) पर सुनाया। ये अपीलें आगरा के एडिशनल सेशंस जज द्वारा 8 फरवरी, 1984 को सुनाए गए सजा के आदेश के खिलाफ दायर की गई थीं। मामले के मुख्य आरोपी रघुवीर सिंह और जगरम की अपील के लंबित रहने के दौरान ही मृत्यु हो गई थी, जिसके कारण उनके विरुद्ध कार्यवाही समाप्त हो गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा मामला 25 मई 1983 को आगरा के रायभा गांव में हुई एक घटना से शुरू हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, थान सिंह और नप्पा नामक व्यक्ति के दामाद के बीच एक विवाद हुआ था। आरोप था कि उसी शाम जब थान सिंह और टीकम सिंह एक झोपड़ी के पास कसरत कर रहे थे, तब रघुवीर सिंह, भरत, नत्थी और जगरम वहां पहुंचे।

रघुवीर सिंह के पास बंदूक, भरत के पास तमंचा और नत्थी व जगरम के पास चाकू होने की बात कही गई थी। आरोप था कि नत्थी और जगरम ने थान सिंह पर चाकुओं से हमला किया, जबकि रघुवीर और भरत ने फायरिंग की। इस हमले में थान सिंह की मौत हो गई, जबकि टीकम सिंह (PW-2) घायल हो गए थे। ट्रायल कोर्ट ने चारों को धारा 302/34 और 307/34 आईपीसी के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील श्री कमलेश कुमार त्रिपाठी ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष के सबूत विरोधाभासों से भरे हैं। उन्होंने मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु उठाए:

  • नत्थी और भरत का इस मामले से कोई सीधा संबंध या मकसद नहीं था, क्योंकि मूल विवाद थान सिंह और नप्पा के दामाद के बीच था।
  • करीब से फायरिंग के आरोपों के बावजूद मौके से कोई खाली कारतूस बरामद नहीं हुआ और न ही किसी के शरीर पर गोली के निशान मिले।
  • विवेचना अधिकारी (I.O.) और घायल गवाह का इलाज करने वाले डॉक्टर का कोर्ट में बयान दर्ज नहीं कराया गया, जिससे बचाव पक्ष को जिरह का मौका नहीं मिला।
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वहीं, सरकारी वकील (A.G.A.) ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि थान सिंह की हत्या साबित हो चुकी है और घायल गवाह का बयान सजा के लिए पर्याप्त आधार है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि नत्थी और भरत की संलिप्तता को लेकर कई “गंभीर त्रुटियां” मौजूद हैं:

1. चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी पर संदेह हाईकोर्ट ने गौर किया कि शिकायतकर्ता (PW-1) ने अपनी जिरह में स्वीकार किया था कि उसने घटना को मंदिर के पास से देखा और वह मौके पर तब पहुंचा जब आरोपी भाग चुके थे। खंडपीठ ने कहा, “जब PW-1 खुद स्वीकार करता है कि वह हमले वाली जगह से दूर था, तो प्रत्येक आरोपी की सटीक भूमिका बताने की उसकी क्षमता संदिग्ध हो जाती है।”

2. हथियारों के इस्तेमाल की पुष्टि नहीं अपीलकर्ता भरत के संबंध में हाईकोर्ट ने पाया कि फायरिंग के आरोपों की पुष्टि के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है। कोर्ट ने कहा, “मौके से कोई कारतूस नहीं मिला, न ही किसी को गोली लगी और न ही भरत से कोई हथियार बरामद हुआ।”

3. चोटों का अस्पष्ट विवरण नत्थी के मामले में कोर्ट ने पाया कि घायल गवाह (PW-2) यह स्पष्ट नहीं कर सका कि नत्थी और जगरम में से किसने कौन सी चोट पहुंचाई। हाईकोर्ट के अनुसार, भूमिका के स्पष्ट निर्धारण के बिना नत्थी को दोषी मानना असुरक्षित होगा।

4. महत्वपूर्ण गवाहों का पेश न होना हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी और डॉक्टर के बयान दर्ज न होने को गंभीरता से लिया। बेहारी प्रसाद बनाम बिहार राज्य (1996) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी का परीक्षण न होने से बचाव पक्ष को अपना पक्ष मजबूती से रखने का मौका नहीं मिला। साथ ही, डॉक्टर की गैर-मौजूदगी में चोटों की गंभीरता साबित नहीं हो पाई।

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5. संदेह का लाभ काली राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (1973) के सिद्धांत को दोहराते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष को अपना मामला संदेह से परे साबित करना चाहिए और यदि दो विचार संभव हों, तो आरोपी के पक्ष वाला विचार ही अपनाया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

“आपराधिक दोषसिद्धि संभावना या संदेह के आधार पर बरकरार नहीं रखी जा सकती। जहां रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य दो विचारों की अनुमति देते हैं, वहां आरोपी के अनुकूल विचार को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।”

कोर्ट का निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के 1984 के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने नत्थी और भरत को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया और उन्हें तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश दिया।

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केस का विवरण:

  • केस का नाम: जगरम और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 639/1984 और 428/1984
  • पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस गरिमा प्रसाद
  • तारीख: 12 मार्च, 2026
  • अपीलकर्ताओं के वकील: कमलेश कुमार त्रिपाठी, टी. घोष, टी. राठौर
  • प्रतिवादी के वकील: ए.जी.ए. (A.G.A.)
  • संदर्भित मामले: लक्ष्मी सिंह बनाम बिहार राज्य (1976), बेहारी प्रसाद बनाम बिहार राज्य (1996), काली राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (1973), राजस्थान राज्य बनाम तेजा राम (1999), रईस अहमद उर्फ रईसू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026)।

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