इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1987 के रेप और हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आरोपी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ परिस्थितियों की कड़ी (Chain of Circumstances) को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्रा-I की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि ‘चांस विटनेस’ (संयोगवश उपस्थित गवाह) की गवाही भरोसेमंद नहीं है और इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि मृतका की हत्या उसके अपने ही परिजनों द्वारा की गई हो सकती है।
ओम प्रकाश ने कानपुर देहात के सत्र न्यायाधीश द्वारा 12 अक्टूबर 1987 को दिए गए फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। निचली अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) के तहत आजीवन कारावास और धारा 376 (दुष्कर्म) के तहत 7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने 16 जनवरी 2026 को अपना फैसला सुनाते हुए अपील स्वीकार कर ली और आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह घटना 15 फरवरी 1987 को ग्राम तरबियतपुर में हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतका कु. सुधा (19) अपने मामा राज कुमार के घर पर अकेली थी। परिवार के अन्य सदस्य बिल्हौर अस्पताल गए थे, क्योंकि राज कुमार की बहू को प्रसव पीड़ा हो रही थी।
शिकायतकर्ता शिव कुमार (PW-2) के अनुसार, वह और उनका भतीजा रामेश्वर दोपहर करीब 2:00 बजे घर लौटे तो उन्होंने आरोपी ओम प्रकाश और एक अज्ञात व्यक्ति को घर से बाहर भागते हुए देखा। घर के अंदर जाने पर उन्होंने सुधा को एक चारपाई पर मृत पाया। उसकी गर्दन पर चोट का निशान था और उसके साथ रेप की आशंका जताई गई थी। उसी दिन मामले की एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता का पक्ष: न्यायमित्र (Amicus Curiae) श्री कृष्ण कांत दुबे ने तर्क दिया कि यह मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, जो आरोपी का दोष साबित करने में विफल रहे हैं। उन्होंने निम्नलिखित बिंदु उठाए:
- मेडिकल सबूत: पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतका का हाइमन पहले से ही टूटा हुआ (Old ruptured) पाया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि वह यौन संबंधों की आदी थी।
- अस्वाभाविक आचरण: गवाह शिव कुमार और रामेश्वर का आचरण अस्वाभाविक था क्योंकि उन्होंने आरोपी को घर से निकलते समय न तो रोका और न ही उससे कोई पूछताछ की।
- ऑनर किलिंग की आशंका: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृतका के चाल-चलन को लेकर घर के पुरुष सदस्यों ने गुस्से में आकर उसकी हत्या की हो सकती है (“ऑनर किलिंग”)।
- हथियार में विरोधाभास: गर्दन पर लगी चोट इतनी गहरी और चौड़ी थी कि वह चाकू से नहीं हो सकती थी, जबकि गवाहों ने बाद में आरोपी के हाथ में चाकू होने की बात कही थी।
राज्य का पक्ष: सरकारी वकील (AGA-Ist) श्रीमती मंजू ठाकुर ने अपील का विरोध करते हुए तर्क दिया कि:
- गवाहों ने घटना के तुरंत बाद आरोपी को मौके से भागते हुए देखा था।
- मौके से आरोपी की एक किताब और उसके नाम का पोस्टकार्ड बरामद हुआ था, जो वहां उसकी उपस्थिति को साबित करता है।
- मेडिकल साक्ष्यों ने रेप और हत्या की पुष्टि की है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य और ‘चांस विटनेस’ से जुड़े कानूनों की कसौटी पर सबूतों की बारीकी से जांच की।
1. परिस्थितिजन्य साक्ष्य का मानक सुप्रीम कोर्ट के शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए, पीठ ने दोहराया कि परिस्थितियां ऐसी होनी चाहिए जो “केवल आरोपी के अपराध की ओर इशारा करें” और किसी भी अन्य संभावना को खारिज करें।
2. ‘चांस विटनेस’ की विश्वसनीयता कोर्ट ने PW-2 (शिव कुमार) और PW-3 (लक्ष्मी शंकर) को ‘चांस विटनेस’ माना। मनोज और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए, पीठ ने कहा कि ऐसे गवाहों के बयानों की बहुत सावधानी और सख्ती से जांच की जानी चाहिए।
- कोर्ट ने पाया कि PW-2 ने “खेत देखने” के बहाने वापस लौटने का दावा किया था, लेकिन वह सीधे घर चला गया, जिसकी पुष्टि नहीं हो सकी।
- पड़ोसी PW-3 ने दावा किया कि उसने आरोपी को चाकू के साथ जाते देखा, लेकिन कोई शोर नहीं मचाया। कोर्ट ने टिप्पणी की: “PW-3 का आरोपी को भागते समय रोकने या पूछताछ करने का प्रयास न करना और हाथ में चाकू देखने के बावजूद शोर न मचाना, उसकी गवाही को अविश्वसनीय बनाता है।”
3. मेडिकल सबूत और हथियार में अंतर पोस्टमार्टम में गर्दन पर हड्डी तक गहरा घाव (12 सेमी x 3.5 सेमी) मिला था, जिसने श्वास नली और कैरोटिड धमनी को काट दिया था। कोर्ट ने कहा:
“इतनी बड़ी चोट किसी भारी और काटने वाले हथियार जैसे कुल्हाड़ी, फरसा या चापड़ से ही लग सकती है, न कि चाकू से, जैसा कि गवाहों ने आरोप लगाया है।”
4. परिजनों की संलिप्तता की संभावना कोर्ट ने बचाव पक्ष के इस तर्क में दम पाया कि परिवार के सदस्यों की संलिप्तता हो सकती है। चोट की गंभीरता यह दर्शाती है कि यह गुस्से में किया गया हमला था। पीठ ने कहा:
“बचाव पक्ष का यह तर्क कि मृतका को किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाते हुए देखे जाने के बाद उसके ही परिजनों ने मार डाला, एक ऐसी संभावना है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता… घटना के समय राज कुमार के घर से सभी परिवार के सदस्यों का चले जाना इस बात को बल देता है कि अपराध एक सुनियोजित तरीके से किया गया था।”
निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के अपराध को उचित संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने के लिए परिस्थितियों की पूरी कड़ी जोड़ने में विफल रहा है।
कोर्ट ने कहा:
“तथ्यों और परिस्थितियों की समग्रता को देखते हुए, हमारा मानना है कि अभियोजन का मामला विश्वास जगाने में विफल रहा है और अपीलकर्ता संदेह के लाभ का हकदार है।”
आदेश:
- अपील स्वीकार की जाती है।
- निचली अदालत द्वारा 12.10.1987 को पारित निर्णय और आदेश को रद्द किया जाता है।
- अपीलकर्ता को बरी किया जाता है, उसके जमानत बांड रद्द किए जाते हैं और जमानती आरोपमुक्त किए जाते हैं।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: ओम प्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 2480 वर्ष 1987
- पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्रा-I
- अपीलकर्ता के वकील: कृष्ण कांत दुबे (न्यायमित्र), ए. राठौर, महेंद्र प्रताप सिंह
- प्रतिवादी के वकील: श्रीमती मंजू ठाकुर (ए.जी.ए.-प्रथम)

