इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए रद्द हो चुकी चार्जशीट और प्रमोशन से पहले के ‘दाग’ भी देखे जा सकते हैं

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के एक अधिकारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) को सही ठहराते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जनहित में किसी सरकारी कर्मचारी को सेवा में बनाए रखने या रिटायर करने का निर्णय लेते समय समीक्षा समिति (Review Committee) उसके ‘संपूर्ण सेवा रिकॉर्ड’ की जांच करने के लिए स्वतंत्र है। इसमें वे आरोप भी शामिल हो सकते हैं जिनकी चार्जशीट तकनीकी आधार पर रद्द कर दी गई हो, या वे प्रतिकूल प्रविष्टियां जो प्रमोशन मिलने से पहले की हों।

न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), लखनऊ के फैसले और राष्ट्रपति द्वारा मौलिक नियम 56(j) के तहत पारित अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को बरकरार रखा है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 1992 बैच के आईआरएस अधिकारी आलोक कुमार मित्रा से जुड़ा है। उन्होंने 1995 से 2014 तक आयकर विभाग में सेवा दी और 2014 से 2017 तक प्रतिनियुक्ति पर रहे। 16 सितंबर 2015 को उन्हें पदोन्नति देकर आयकर आयुक्त (सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड) बनाया गया।

हालांकि, 10 जून 2019 को केंद्र सरकार ने मौलिक नियम 56(j) का इस्तेमाल करते हुए उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी। उस समय वे कोच्चि (केरल) में आयकर आयुक्त (अपील)-III के पद पर तैनात थे। उन्होंने इस आदेश के खिलाफ प्रतिवेदन दिया, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने कैट (CAT) का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिली। अंततः उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

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याची की दलील: ‘प्रमोशन मिल गया तो पुराने दाग धुल गए’

याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जे.एन. माथुर ने तर्क दिया कि सरकार का फैसला मनमाना है। उनकी प्रमुख दलीलें थीं:

  1. एसीसी की मंजूरी नहीं: अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश के लिए कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) से मंजूरी नहीं ली गई, जो अनिवार्य थी।
  2. शानदार रिकॉर्ड: 2015 में उन्हें ‘मेरिट-कम-सिनियोरिटी’ के आधार पर प्रमोशन मिला था। उनकी एसीआर (ACR) में उन्हें ‘आउटस्टैंडिंग’ बताया गया था और सत्यनिष्ठा पर कोई संदेह नहीं था।
  3. ‘वाश्ड-ऑफ’ थ्योरी (Washed-off Theory): उनका तर्क था कि प्रमोशन मिलने के बाद उससे पहले की प्रतिकूल प्रविष्टियों का कोई मतलब नहीं रह जाता। समीक्षा समिति को केवल प्रमोशन के बाद के रिकॉर्ड पर ध्यान देना चाहिए था।
  4. रद्द चार्जशीट: 2013 में जारी एक चार्जशीट को 2018 में कैट ने रद्द कर दिया था। याची का कहना था कि जब चार्जशीट ही रद्द हो गई, तो उन आरोपों को आधार नहीं बनाया जा सकता।

सरकार का पक्ष: ‘सत्यनिष्ठा पर संदेह’

केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि समीक्षा समिति ने पूरी प्रक्रिया का पालन किया है। उन्होंने तर्क दिया कि:

  1. सक्षम प्राधिकारी: याची की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की गई थी और अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश भी राष्ट्रपति ने ही दिया है, इसलिए अलग से एसीसी की मंजूरी की आवश्यकता नहीं थी।
  2. सहारा समूह और जांच में लापरवाही: काउंटर एफिडेविट में समीक्षा समिति के मिनट्स का हवाला दिया गया। इसमें सहारा समूह से संबंधित कर चोरी की याचिकाओं (TEPs) की जांच में ‘लापरवाही’ (Shoddy investigation) और बेनामी संपत्तियों की शिकायतों का जिक्र था। समिति ने पाया कि इन मामलों से अधिकारी की सत्यनिष्ठा (Integrity) संदिग्ध प्रतीत होती है।
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हाईकोर्ट का निर्णय और विधिक स्थिति

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद मौलिक नियम 56(j) और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की:

1. रद्द चार्जशीट भी है प्रासंगिक: कोर्ट ने कहा कि भले ही कैट ने 2018 में चार्जशीट को रद्द कर दिया था, लेकिन वह मुख्य रूप से ‘देरी’ जैसे तकनीकी आधारों पर था। इसका मतलब यह नहीं है कि समीक्षा समिति उन आरोपों की तह में नहीं जा सकती। कोर्ट ने कहा कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति कोई सजा नहीं है, बल्कि यह तय करने की प्रक्रिया है कि अधिकारी को बनाए रखना जनहित में है या नहीं। इसलिए, समीक्षा समिति उन तथ्यों को देखने से नहीं रोकी जा सकती।

2. प्रमोशन से पुराने दाग नहीं धुलते: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम बनाम बाबू लाल जांगिड़ (2013) और गुरदास सिंह (1998) के फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि ‘वाश्ड-ऑफ थ्योरी’ (प्रमोशन के बाद पुराने पाप धुल जाना) केवल आगे के प्रमोशन के लिए लागू होती है, अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए नहीं। जब किसी को अनिवार्य रूप से रिटायर करने पर विचार किया जाता है, तो “संपूर्ण सेवा रिकॉर्ड” देखा जाता है।

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“प्रमोशन मिलने से पहले की कोई भी प्रतिकूल प्रविष्टि मिटती नहीं है और कर्मचारी के समग्र प्रदर्शन पर विचार करते समय इसे ध्यान में रखा जा सकता है।”

3. प्रक्रिया सही पाई गई: कोर्ट ने माना कि समीक्षा समिति ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर अपनी “व्यक्तिपरक संतुष्टि” (Subjective Satisfaction) दर्ज की है। कोर्ट अपीलीय प्राधिकारी की तरह बैठकर इस संतुष्टि की समीक्षा नहीं कर सकता, जब तक कि यह पूरी तरह से मनमाना न हो।

इन आधारों पर हाईकोर्ट ने माना कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश वैध था और उसमें किसी प्रकार की दुर्भावना या अवैधता नहीं थी। याचिका को खारिज कर दिया गया।

केस का विवरण:

  • केस टाइटल: आलोक कुमार मित्रा बनाम भारत संघ और अन्य
  • केस नंबर: रिट – ए नंबर 2736 ऑफ 2023
  • कोरम: न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय
  • याची के वकील: श्री जे.एन. माथुर (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री शोभित मोहन शुक्ला, मनोज कुमार चौरसिया, वत्सला सिंह
  • प्रतिवादी के वकील: ए.एस.जी.आई., देवरिषि कुमार

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