बिना ठोस सबूतों के ‘एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन’ पर सजा नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के आरोपी को 20 साल बाद रिहा किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में माता-पिता और भाई की हत्या के आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल ‘एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन’ (न्यायेतर संस्वीकृति) और पुलिस द्वारा दिखाई गई बरामदगी, जिसकी पुष्टि स्वतंत्र गवाहों ने न की हो, किसी व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा देने के लिए पर्याप्त नहीं है।

न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति जफीर अहमद की खंडपीठ ने सत्र न्यायालय, बलरामपुर द्वारा 2007 में सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की वह अटूट कड़ी साबित करने में विफल रहा है, जो आरोपी के दोषी होने की ओर स्पष्ट इशारा करती हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2006 का है। बलरामपुर जिले के सत्र न्यायाधीश ने 15 दिसंबर, 2007 को शिव पूजन वर्मा को अपने पिता रघुनाथ, मां कमला और भाई मुंशी की हत्या (आईपीसी की धारा 302) का दोषी ठहराया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 17 जनवरी 2006 को अपीलकर्ता के बेटे, मंगल प्रसाद वर्मा ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उसके दादा-दादी और चाचा की अज्ञात लोगों ने हत्या कर दी है। बाद में पुलिस जांच की सुई शिव पूजन वर्मा (अपीलकर्ता) पर घूमी। पुलिस का दावा था कि पूछताछ के दौरान शिव पूजन ने अपना जुर्म कबूल कर लिया और उसकी निशानदेही पर गन्ने के पत्तों के ढेर से हत्या में इस्तेमाल कुल्हाड़ी और डंडा बरामद किया गया। पुलिस ने अपनी कहानी मुख्य रूप से राम छबीले (PW-2) नामक गवाह के बयान पर आधारित की थी, जिसके सामने आरोपी द्वारा कथित तौर पर जुर्म कबूलने (एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन) की बात कही गई थी।

READ ALSO  उपभोक्ता अदालत ने चेक गुम होने के लिए यस बैंक को जिम्मेदार ठहराया

दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राजीव दुबे ने तर्क दिया कि पूरा मामला केवल अटकलों पर आधारित है। उन्होंने अदालत को बताया कि घटना का कोई भी चश्मदीद गवाह (Eyewitness) नहीं है। जिस गवाह (राम छबीले) के सामने जुर्म कबूलने की बात कही जा रही है, उसका बयान विश्वसनीय नहीं है। इसके अलावा, जिन स्वतंत्र गवाहों के सामने हथियार बरामदगी का दावा किया गया था, वे अदालत में मुकर गए (Hostile) थे और उन्होंने पुलिस की कहानी का समर्थन नहीं किया।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए ए.जी.ए. ने सजा का बचाव करते हुए कहा कि आरोपी की निशानदेही पर हत्या के हथियार बरामद हुए हैं और संपत्ति विवाद के कारण उसके पास हत्या का मकसद (Motive) भी था, जो उसकी संलिप्तता साबित करता है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

खंडपीठ की ओर से फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति जफीर अहमद ने मामले में पेश किए गए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का बारीकी से विश्लेषण किया और अभियोजन की कहानी में कई खामियां पाईं।

1. एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन पर संदेह: अदालत ने सहदेवन बनाम तमिलनाडु राज्य (2012) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ‘एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन’ एक कमजोर साक्ष्य होता है और इसकी गहन जांच जरूरी है। कोर्ट ने पाया कि गवाह राम छबीले (PW-2) ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जिस पर आरोपी इतना भरोसा करता कि उसके सामने तिहरे हत्याकांड का राज खोल देता। इसके अलावा, हत्या जैसी गंभीर घटना के बारे में सुनने के बाद भी गवाह का चुप रहना “सामान्य मानवीय आचरण के विपरीत” था।

READ ALSO  सनातन धर्म टिप्पणी: सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन के खिलाफ एफआईआर की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी किया

2. हथियारों की बरामदगी और गवाहों का मुकर जाना: साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत की गई बरामदगी पर कोर्ट ने सवाल उठाए। बरामदगी के स्वतंत्र गवाह महेंद्र नाथ (PW-3) और गुड्डन (PW-4) ने अदालत में साफ कहा कि उनके सामने कोई बरामदगी नहीं हुई और पुलिस ने उनसे सादे कागजों पर हस्ताक्षर करवाए थे।

कोर्ट ने राजा नायक बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2024) के फैसले का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की:

“महज खून से सने हथियार की बरामदगी, भले ही उस पर पीड़ित का ब्लड ग्रुप ही क्यों न हो, हत्या का आरोप साबित करने के लिए तब तक पर्याप्त नहीं है, जब तक कि बरामदगी को अपराध से विश्वसनीय रूप से जोड़ा न जाए और यह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की एक अटूट कड़ी का हिस्सा न हो।”

3. पंचशील सिद्धांत और परिस्थितिजन्य साक्ष्य: अदालत ने शरद बिरधीचंद सारदा (1984) मामले में स्थापित ‘पंचशील’ सिद्धांतों को लागू किया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के लिए केवल और केवल आरोपी ही जिम्मेदार है और उसकी बेगुनाही की कोई गुंजाइश नहीं है।

READ ALSO  Order Passed U/Sec 125 CrPC May Be Final or Interim and Can Be Recalled or Altered Under Section 127 CrPC, Bar of Section 362 CrPC Is Not Applicable in Such Cases: Allahabad HC

“अभियोजन द्वारा जिन परिस्थितियों पर भरोसा किया गया है, वे न तो पूरी तरह साबित हुई हैं और न ही वे साक्ष्यों की एक निरंतर और अटूट श्रृंखला बनाती हैं।”

4. केवल मकसद (Motive) काफी नहीं: संपत्ति विवाद को हत्या का कारण बताए जाने पर कोर्ट ने महेंद्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया:

“मकसद (Motive) केवल परिस्थितियों की एक कड़ी हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में सबूत की जगह नहीं ले सकता।”

निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि सत्र न्यायालय ने कमजोर और बिना पुष्टि वाले साक्ष्यों के आधार पर सजा सुनाने में त्रुटि की है। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानून में, “संदेह का लाभ” हमेशा आरोपी को मिलता है और अगर अभियोजन पक्ष मामले को “संदेह से परे” साबित नहीं कर पाता, तो आरोपी बरी होने का हकदार है।

तदनुसार, अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए शिव पूजन वर्मा को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया और उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया।

वाद शीर्षक: शिव पूजन वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 79/2008 

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles