बिना सुनवाई प्रभावित पक्ष के खिलाफ पारित एकतरफा आदेश को बहाल नहीं कर सकता पुनरीक्षण अधिकारी; हाईकोर्ट ने गांव सभा भूमि विवाद में कमिश्नर का आदेश रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने लखनऊ मंडल के एडिशनल कमिश्नर (जुडिशियल) द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें अनुसूचित जाति के एक भूमिहीन कृषि मजदूर के पक्ष में दिए गए बहाली (Restoration) के आदेश को पलट दिया गया था। न्यायमूर्ति इरशाद अली ने कहा कि पुनरीक्षण अधिकारी (Revisional Authority) के पास ऐसा करने का अधिकार क्षेत्र नहीं था और बिना नोटिस दिए पारित किए गए एकतरफा आदेश को बहाल करना एक स्पष्ट अवैधता है।

कानूनी मुद्दा

इस मामले में मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या कोई पुनरीक्षण अधिकारी उस प्रक्रियात्मक आदेश में हस्तक्षेप कर सकता है जो केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए मामले को गुण-दोष (Merits) पर सुनने के लिए बहाल करता है। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने इस पर भी विचार किया कि क्या यू.पी. जमींदारी विनाश और भूमि व्यवस्था (Z.A. & L.R.) अधिनियम की धारा 122-B (4-F) के तहत पारित आदेश पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार के अधीन हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता साहब दास, जो चमार समुदाय से हैं और एक भूमिहीन कृषि मजदूर हैं, ने जिला उन्नाव के ग्राम लगलेसरा में स्थित गाटा संख्या 147/2 (क्षेत्रफल 0.400 हेक्टेयर) पर 3 जून 1995 से पहले से कब्जे का दावा किया था। जांच के बाद, 9 जनवरी 1998 को परगना अधिकारी, हसनगंज ने उन्हें यू.पी. Z.A. & L.R. अधिनियम की धारा 122-B (4-F) के तहत लाभ प्रदान किया और उन्हें गैर-हस्तांतरणीय अधिकारों के साथ ‘भूमिधर’ घोषित किया।

इसके बाद, विपक्षी संख्या 2 (एक पूर्व प्रधान) ने इस आदेश को वापस लेने (Recall) के लिए एक आवेदन दिया। 18 जुलाई 1998 को परगना अधिकारी ने नियमितीकरण के आदेश को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उन्हें इस कार्यवाही की कोई सूचना नहीं दी गई थी, जिसके बाद उन्होंने 19 अप्रैल 1999 को बहाली के लिए आवेदन किया। 25 सितंबर 2003 को दोनों पक्षों को सुनने के बाद, परगना अधिकारी ने जुलाई 1998 के एकतरफा आदेश को वापस ले लिया। पूर्व प्रधान ने इस बहाली के आदेश को पुनरीक्षण (Revision) के माध्यम से चुनौती दी, जिसे एडिशनल कमिश्नर ने 10 अगस्त 2004 को स्वीकार कर लिया। इसी आदेश के खिलाफ वर्तमान रिट याचिका दायर की गई थी।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील: श्री अभिष्ट सरन ने तर्क दिया कि पुनरीक्षण अधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया। उन्होंने कहा कि 25 सितंबर 2003 का आदेश केवल प्राकृतिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक प्रक्रियात्मक बहाली थी और इसमें भूमि अधिकारों के गुण-दोष पर फैसला नहीं लिया गया था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि धारा 122-B (4-F) के तहत याचिकाकर्ता को ‘डीम्ड भूमिधर’ का दर्जा प्राप्त है जिसे पुनरीक्षण कार्यवाही के माध्यम से प्रभावित नहीं किया जा सकता।

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राज्य के वकील: अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता (Additional CSC) ने तर्क दिया कि प्रारंभिक नियमितीकरण एक “फर्जी और मनगढ़ंत रिपोर्ट” पर आधारित था और वह भूमि 1995 से ही सार्वजनिक उद्देश्य (स्कूल) के लिए आरक्षित थी। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता का बहाली आवेदन काफी देरी से दिया गया था और याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट के बजाय राजस्व परिषद (Board of Revenue) जाना चाहिए था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने पाया कि 25 सितंबर 2003 के आदेश ने गुण-दोष के आधार पर पक्षों के अधिकारों का फैसला नहीं किया था, बल्कि केवल कार्यवाही को बहाल किया था ताकि पूर्व प्रधान के आवेदन पर याचिकाकर्ता को सुनने के बाद निर्णय लिया जा सके।

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प्राकृतिक न्याय के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा:

“यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया गया कोई भी आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है और उसे बरकरार नहीं रखा जा सकता। ऐसे एकतरफा आदेश को बहाल करके, पुनरीक्षण अधिकारी ने याचिकाकर्ता को कार्यवाही का विरोध करने और 09.01.1998 के आदेश का बचाव करने के उसके बहुमूल्य अधिकार से वंचित कर दिया है।”

हाईकोर्ट ने मनोरे उर्फ ​​मनोहर बनाम बोर्ड ऑफ रेवेन्यू, यूपी और अन्य (2003) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए कहा:

“धारा 122-B की उप-धारा (4-F) न केवल अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के पात्र कृषि मजदूर के कब्जे की रक्षा करती है, बल्कि वैधानिक प्रावधान के बल पर ऐसे व्यक्ति को गैर-हस्तांतरणीय अधिकारों के साथ भूमिधर का दर्जा भी प्रदान करती है।”

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अधिकार क्षेत्र के बिंदु पर हाईकोर्ट ने सुशीला और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2015) और गंगा रमन शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2016) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया:

“चूंकि धारा 122-B (4-F) के तहत दिया गया आदेश स्वयं पुनरीक्षण योग्य नहीं है, इसलिए ऐसे आदेश से उत्पन्न कार्यवाही में पारित कोई भी आदेश, जिसमें बहाली आवेदन को स्वीकार करने वाला आदेश भी शामिल है, पुनरीक्षण योग्य नहीं है और पुनरीक्षण अदालत द्वारा ऐसे मामलों में कोई भी हस्तक्षेप पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र के बिना होगा।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पुनरीक्षण अधिकारी का आदेश स्पष्ट अवैधता और अधिकार क्षेत्र की त्रुटि से ग्रस्त है। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए 10 अगस्त 2004 के आदेश को रद्द कर दिया और परगना अधिकारी के 25 सितंबर 2003 के आदेश को बहाल कर दिया। संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया गया है कि वह संबंधित पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद कानून के अनुसार मामले का नए सिरे से निर्णय करें।

केस का विवरण:

  • केस का शीर्षक: साहब दास बनाम एडिशनल कमिश्नर (जुडिशियल) लखनऊ मंडल और अन्य
  • केस संख्या: रिट-सी संख्या – 2005 का 1000273
  • पीठ: न्यायमूर्ति इरशाद अली
  • दिनांक: 12 मार्च, 2026

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