सिविल संपत्ति विवादों को निपटाने के लिए आपराधिक कार्यवाही का उपयोग नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समनिंग ऑर्डर रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने संपत्ति विवाद से जुड़े धोखाधड़ी के एक मामले में बेटे, उसके ससुर और एक बैंक मैनेजर के खिलाफ जारी समनिंग ऑर्डर (तलब करने का आदेश) को रद्द कर दिया है। कोर्ट नंबर 14 की अध्यक्षता कर रहे न्यायूमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने टिप्पणी की कि यह मामला अनिवार्य रूप से दीवानी (सिविल) प्रकृति का था और आपराधिक कार्यवाही का उपयोग उत्पीड़न के उपकरण के रूप में किया जा रहा था।

हाईकोर्ट ने धारा 482 Cr.P.C. के तहत दायर दो आवेदनों (केस संख्या 4460/2022 और 3270/2022) को स्वीकार करते हुए अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-V, लखनऊ द्वारा 8 अप्रैल, 2022 को पारित उस आदेश को दरकिनार कर दिया, जिसमें आवेदकों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 के तहत तलब किया गया था।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला रामेश्वर दयाल सक्सेना (विपक्षी संख्या 2) द्वारा धारा 156(3) Cr.P.C. के तहत दायर एक आवेदन से शुरू हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बेटे रजत सक्सेना और दिवंगत पत्नी राज लक्ष्मी सक्सेना ने एक घर खरीदा था और एचडीएफसी लिमिटेड से कुल ₹29 लाख का ऋण लिया था। 2013 में पत्नी की मृत्यु के बाद, शिकायतकर्ता ने दावा किया कि उन्होंने जून 2014 से ऋण की किस्तों का भुगतान करना जारी रखा।

शिकायतकर्ता के अनुसार, उनके बेटे, ससुर (अनिल सक्सेना) और एचडीएफसी लिमिटेड के तत्कालीन वरिष्ठ प्रबंधक (अंशुल श्रीवास्तव) के बीच एक साजिश रची गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि बैंक मैनेजर ने शुरू में किस्तें लेने से इनकार कर दिया ताकि ऋण को एनपीए (NPA) घोषित किया जा सके, लेकिन बाद में ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) के आदेश के बाद उनसे ₹45,95,000 स्वीकार कर लिए। शिकायतकर्ता की शिकायत यह थी कि घर के हस्तांतरण के लिए एक “प्राइवेट ट्रीटी” की उम्मीद में बकाया राशि का भुगतान करने के बावजूद, बैंक ने घर के मूल दस्तावेज (टाइटल डीड) उनके बेटे रजत सक्सेना को सौंप दिए।

पक्षकारों के तर्क

आवेदकों ने तर्क दिया कि रजत सक्सेना संपत्ति के पंजीकृत मालिक और एकमात्र जीवित गिरवी रखने वाले (Mortgagor) थे। उन्होंने दलील दी कि पिता द्वारा ऋण की किस्तों का भुगतान करने मात्र से गिरवी रखने वाले या संपत्ति के पंजीकृत मालिक की कानूनी स्थिति नहीं बदल जाती। उन्होंने आगे कहा कि शिकायत दर्ज करना चल रहे सिविल विवाद के दौरान आवेदकों पर अनुचित दबाव बनाने के लिए “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” है।

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बैंक मैनेजर अंशुल श्रीवास्तव ने तर्क दिया कि वे बैंक के बकाया की वसूली के लिए कर्तव्यबद्ध थे और पैसा स्वीकार करके उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। इसके विपरीत, शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पिता के पक्ष में हस्तांतरण विलेख (Transfer Deed) निष्पादित न करना धोखाधड़ी के समान है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

न्यायूमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने मितेश कुमार जे. शाह बनाम कर्नाटक राज्य (2022) और दिनेश गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024) सहित सर्वोच्च न्यायालय के कई मिसालों के आलोक में तथ्यों की जांच की। हाईकोर्ट ने नोट किया कि व्यावसायिक या सिविल विवादों को आपराधिक रंग देने की बढ़ती प्रवृत्ति देखी जा रही है ताकि दबाव के माध्यम से “त्वरित राहत” या समझौता हासिल किया जा सके।

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IPC की धारा 415 के तहत धोखाधड़ी के आरोपों के संबंध में, हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“धोखाधड़ी (Cheating) का तत्व… अनुबंध के गठन की शुरुआत से ही, प्रारंभिक वादा या प्रतिनिधित्व करने के पीछे एक कपटपूर्ण या बेईमान इरादे का अस्तित्व होना आवश्यक है।”

हाईकोर्ट ने पाया कि:

  1. कोई प्रलोभन नहीं: बैंक मैनेजर ने पैसे की मांग नहीं की थी; शिकायतकर्ता स्वयं पुनर्भुगतान के लिए बैंक के पास गया था।
  2. स्वामित्व अधिकार: घर बेटे और मृतक माँ के नाम था। शिकायतकर्ता द्वारा किस्तों का भुगतान उन्हें मालिक नहीं बनाता। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता ने यह तथ्य छिपाया था कि उन्होंने विभाजन (Partition) के लिए पहले से ही एक सिविल सूट दायर कर रखा था।
  3. ‘प्राइवेट ट्रीटी’ की कानूनी स्थिति: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि “बैंक और अपने बेटे और पत्नी द्वारा लिए गए ऋण को चुकाने के इच्छुक व्यक्ति के बीच कोई ट्रीटी (संधि) नहीं हो सकती” और स्वामित्व के दस्तावेज सौंपने से वास्तविक मालिक अपने अधिकारों से वंचित नहीं हो जाते।

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इन तथ्यों पर विचार किए बिना “यांत्रिक तरीके से” समनिंग ऑर्डर जारी किया था।

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हाईकोर्ट का निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि तथ्य प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी का मामला नहीं बनाते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि शिकायतकर्ता ने बैंक को कुछ पैसे देकर पूरे घर को हड़पने और अपने बेटे और बेटियों को उनके हिस्से से वंचित करने के लिए एक “दुर्भावनापूर्ण योजना” तैयार की थी।

हाईकोर्ट ने कहा:

“criminal proceedings must not be used as instruments of harassment… शिकायत में आपराधिक अपराध का खुलासा होता है या नहीं, यह आरोपों की प्रकृति पर निर्भर करता है और क्या आपराधिक अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद हैं या नहीं, इसका निर्णय हाईकोर्ट द्वारा किया जाना चाहिए।”

नतीजतन, दोनों आवेदनों को स्वीकार कर लिया गया, समनिंग ऑर्डर रद्द कर दिया गया और मूल शिकायत को खारिज कर दिया गया।

केस विवरण

केस टाइटल: रजत सक्सेना और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (संबद्ध मामले के साथ)

केस नंबर: APPLICATION U/s 482 No. 4460 of 2022 and 3270 of 2022

पीठ: न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी

तारीख: 03 अप्रैल, 2026

आवेदकों के वकील: चंद्र शेखर सिन्हा, नदीम मुर्तजा, विवेक पांडे, अक्षत सिन्हा, गौरव सिन्हा।

विपक्षी दलों के वकील: जी.ए. (राज्य), जी.डी. भट्ट (AGA-I), अभिषेक खरे, प्रमेन्द्र कुमार सिंह, मोहित शर्मा, पूजा मिश्रा।

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