इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने शादी के झूठे वादे के आधार पर बलात्कार के आरोपों वाली आपराधिक कार्यवाही और समनिंग ऑर्डर को रद्द कर दिया है। माननीय न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने धारा 482 Cr.P.C. के तहत आवेदकों की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि यह मामला “आपसी सहमति के संबंधों में आई कटुता का एक क्लासिक उदाहरण” है। हाईकोर्ट ने पाया कि यह कार्यवाही केवल “निजी प्रतिशोध लेने और बदला लेने के उद्देश्य” से शुरू की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) में कार्यरत इंजीनियर और उनके माता-पिता द्वारा दायर की गई थी। मामले के तथ्यों के अनुसार, युवक और शिकायतकर्ता की मुलाकात एक वैवाहिक वेबसाइट के माध्यम से हुई थी। अक्टूबर 2021 में दोनों की सगाई हुई और नवंबर 2022 के लिए विवाह की तारीखें तय की गईं।
तय विवाह से पहले, फरवरी 2022 में युवक को शिकायतकर्ता के पिछले संबंधों से जुड़ी कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें प्राप्त हुईं। हालांकि शिकायतकर्ता ने शुरुआत में इन संबंधों से इनकार किया, लेकिन बाद में उसने युवक को ब्लॉक कर दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने उसी तिथि पर किसी अन्य व्यक्ति के साथ अपनी शादी तय कर ली, जो पहले आवेदक के साथ निर्धारित थी। रिश्ता टूटने के बाद, उसने युवक और उसके माता-पिता के खिलाफ बलात्कार और धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज कराई।
पक्षों की दलीलें
आवेदकों के वकील श्री नदीम मुर्तजा ने तर्क दिया कि युवक और शिकायतकर्ता के बीच शारीरिक संबंध पूरी तरह सहमतिपूर्ण थे। उन्होंने दलील दी कि विवाह युवक की ओर से नहीं तोड़ा गया, बल्कि शिकायतकर्ता के आचरण और उसकी दूसरी जगह शादी तय होने के कारण संभव नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि यह “बलात्कार” नहीं बल्कि “सहमतिपूर्ण यौन संबंध” का मामला है।
राज्य की ओर से विद्वान एजीए-I श्री राव नरेंद्र सिंह ने दलील दी कि पीड़िता का बयान प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त है और अपराध की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
न्यायिक विश्लेषण: फोर-स्टेप वेरासिटी टेस्ट (चार-चरणीय सत्यता परीक्षण)
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रदीप कुमार केशरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) में निर्धारित “फोर-स्टेप टेस्ट” को आधार बनाया। निर्णय के पैराग्राफ 19 के अनुसार, कोर्ट ने कार्यवाही को रद्द करने के लिए निम्नलिखित चार चरणों पर तथ्यों को परखा:
- प्रमाणों की गुणवत्ता: क्या अभियुक्त द्वारा प्रस्तुत सामग्री विश्वसनीय और “स्टर्लिंग क्वालिटी” (बेहतरीन गुणवत्ता) की है।
- तथ्यों का खंडन: क्या वह सामग्री शिकायत के आरोपों को पूरी तरह खारिज करने और यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि आरोप झूठे हैं।
- अभियोजन की स्थिति: क्या यह सामग्री ऐसी है जिसे अभियोजन पक्ष द्वारा चुनौती देना या झुठलाना संभव नहीं है।
- न्याय की रक्षा: क्या मुकदमा जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे न्याय का उद्देश्य विफल हो जाएगा।
इन चरणों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि युवक शुरू से ही विवाह के लिए तैयार था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आईपीसी की धारा 376 के तहत अपराध तभी बनता है जब शादी का वादा शुरू से ही “झूठा” हो और केवल यौन संबंध बनाने के इरादे से किया गया हो। इस मामले में, कोर्ट ने माना कि संबंध आपसी सहमति से थे जो बाद में कटुतापूर्ण मोड़ पर पहुँच गए।
अदालत का फैसला
हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने स्वयं “वादा खिलाफी” की और आवेदक के साथ तय तारीख पर ही किसी और से विवाह तय कर लिया। हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992) के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने कहा कि ऐसी कार्यवाही जो स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण और निजी रंजिश निकालने के लिए हो, उसे जारी रखना न्यायसंगत नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा:
“कानून और कानूनी प्रक्रियाएं न्याय प्रदान करने और अधिकारों की रक्षा के लिए हैं, न कि व्यक्तिगत प्रतिशोध या निजी हिसाब चुकता करने के हथियार के रूप में उपयोग करने के लिए।”
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए शिकायत केस संख्या 53786/2022 और समनिंग ऑर्डर को पूरी तरह रद्द कर दिया।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: फातिमा बेगम और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
- केस संख्या: APPLICATION U/S 482 No. 9282 of 2022
- बेंच: न्यायमूर्ति बृज राज सिंह
- दिनांक: 7 अप्रैल, 2026

