इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘जो कानून ही नहीं है’ उसके तहत दिए गए मुस्लिम तलाक के आदेश को किया रद्द; फैमिली कोर्ट को फिर से फैसला सुनाने का निर्देश

हाईकोर्ट ने बांदा की फैमिली कोर्ट द्वारा एक मुस्लिम महिला को दिए गए तलाक के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि वह फैसला एक ऐसे कानून के तहत पारित किया गया था, जो अस्तित्व में ही नहीं है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने पाया कि निचली अदालत ने बार-बार “मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986” का हवाला दिया, जबकि मुस्लिम विवाह के विघटन के लिए प्रभावी कानून “मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939” (Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939) है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बांदा के प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट द्वारा 28 जनवरी 2026 को पारित एक आदेश के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा है। उस आदेश के माध्यम से प्रतिवादी-पत्नी को तलाक की मंजूरी दी गई थी। अपीलकर्ता ने इस आधार पर फैसले को चुनौती दी कि जिस कानून के तहत यह कार्यवाही की गई और फैसला सुनाया गया, वह कानूनी रूप से मौजूद ही नहीं है।

पक्षकारों के तर्क

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि निचली अदालत ने प्रतिवादी-पत्नी द्वारा दायर वाद (plaint) को स्वीकार करने में गंभीर चूक की है। पत्नी ने अपना वाद “मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986” (अन्तर्गत धारा मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986) के तहत दायर किया था। अपीलकर्ता का तर्क था कि भारत के किसी भी संविधि में इस नाम का कोई कानून नहीं है।

अदालत ने पाया कि वर्ष 1986 का जो कानून मौजूद है, वह “मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986” है, जो तलाकशुदा महिलाओं की संपत्ति और अधिकारों के संरक्षण के लिए है। वहीं, निकाह के विघटन के लिए “मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939” के तहत कार्यवाही होनी चाहिए थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल वाद में गलत प्रावधान का उल्लेख होने से फैसला अवैध नहीं हो जाता, बशर्ते कि अदालत ने सही कानून के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया हो। हालांकि, वर्तमान मामले में ट्रायल कोर्ट ने न केवल उस गलती को अपनाया, बल्कि पूरे फैसले में बार-बार उसका उल्लेख किया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

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“सीनियर डिस्ट्रिक्ट जज के रैंक के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली निचली अदालत ने फैसला लिखते समय काफी लापरवाही भरा रवैया अपनाया है। यह सुनिश्चित करना अदालत का कर्तव्य है कि जिस कानून का वह हवाला दे रही है, वह वास्तव में अस्तित्व में हो। केवल वाद या कार्यवाही में हुई गलती, निचली अदालत द्वारा अंतिम निर्णय में उसी गलती को दोहराने को न्यायसंगत नहीं ठहराती।”

कोर्ट ने आगे कहा कि यदि यह किसी एक स्थान पर टाइपिंग की सामान्य गलती होती, तो इसे नजरअंदाज किया जा सकता था। लेकिन बार-बार एक ऐसे कानून का उल्लेख करना जो है ही नहीं, और उसी के तहत राहत प्रदान करना, फैसले को कानून और तथ्यों की दृष्टि में दोषपूर्ण बनाता है।

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अदालत का निर्णय

इन परिस्थितियों को देखते हुए, हाईकोर्ट ने 28 जनवरी 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया और मामले को वापस फैमिली कोर्ट भेज दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट कानून के सही प्रावधानों का उल्लेख करते हुए नए सिरे से फैसला पारित करे।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह नए सिरे से मुकदमे (de novo trial) का निर्देश नहीं दे रही है। फैमिली कोर्ट रिकॉर्ड पर पहले से मौजूद सामग्री और साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय ले सकती है। साथ ही, निचली अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह इस आदेश की प्राप्ति के तीन महीने के भीतर अंतिम फैसला सुनाए।

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केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: हाफिज बनाम श्रीमती परवीन खातून
  • केस संख्या: फर्स्ट अपील संख्या 178/2026 (2026:AHC:68880-DB)
  • पीठ: जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन
  • दिनांक: 1 अप्रैल, 2026

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