इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक याचिकाकर्ता और संबंधित ग्राम पंचायत अधिकारियों के खिलाफ फर्जी जन्म प्रमाणपत्र जारी करने के आरोप में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ता ने पासपोर्ट में अपनी जन्मतिथि बदलवाने के लिए यह प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था। कोर्ट ने इस फर्जीवाड़े को “चौंकाने वाला” बताते हुए कड़ी टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ शिव शंकर पाल द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को यह निर्देश देने की मांग की थी कि उनकी नई जन्मतिथि (11 जुलाई 2005) को पासपोर्ट में अपडेट किया जाए। यह जन्मतिथि 4 नवंबर 2025 को जारी किए गए एक नए जन्म प्रमाणपत्र पर आधारित थी।
कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि याचिकाकर्ता का यह दावा अत्यंत हास्यास्पद है, क्योंकि उन्हें माध्यमिक शिक्षा परिषद से वर्ष 2011 में हाईस्कूल प्रमाणपत्र मिला था। यदि नई जन्मतिथि को सही माना जाए तो याचिकाकर्ता ने मात्र 6 वर्ष की उम्र में हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण कर ली होती।
कोर्ट ने टिप्पणी की, “यह स्थिति न केवल हास्यास्पद है बल्कि यह दर्शाती है कि सिस्टम में भ्रष्टाचार किस हद तक व्याप्त है।”
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ:
- नया जन्म प्रमाणपत्र 2025 में जारी हुआ, जबकि शैक्षणिक दस्तावेज पहले से उपलब्ध हैं
- हाईस्कूल प्रमाणपत्र में जन्मतिथि स्पष्ट रूप से 11 जुलाई 1994 दर्ज है
- पासपोर्ट आवेदन के समय जमा किया गया आधार कार्ड भी 1994 की जन्मतिथि दिखाता है
- लेकिन याचिका के साथ लगाए गए आधार कार्ड में जन्मतिथि 2005 कर दी गई थी
- यह विरोधाभास “जानबूझकर धोखाधड़ी” को दर्शाता है
कोर्ट ने प्रयागराज पुलिस आयुक्त को आदेश दिया है कि वे याचिकाकर्ता और संबंधित ग्राम पंचायत अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की उपयुक्त धाराओं के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप में प्राथमिकी दर्ज करें। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि यदि आदेश का पालन नहीं हुआ, तो आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
मामले की अगली सुनवाई 27 जनवरी 2026 को निर्धारित की गई है।

