इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अब ट्रायल कोर्ट के लिए कानूनी मुद्दों को प्रारंभिक मुद्दे (Preliminary Issues) के रूप में तय करना अनिवार्य नहीं रह गया है। कोर्ट के अनुसार, सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के संशोधित प्रावधानों के तहत यह पूरी तरह से अदालत का विवेकाधिकार है। न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर एक याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि कानून की मंशा मुकदमों को लंबा खींचने से बचाने के लिए सभी मुद्दों पर एक साथ फैसला सुनाने की है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला (पारस बनाम राम चरित्र और अन्य) सिविल जज (जूनियर डिवीजन), बस्ती की अदालत में विचाराधीन मूल वाद संख्या 859/2006 से जुड़ा है। वादी ने 21 मई 1988 को राम आसरे द्वारा प्रतिवादी (याचिकाकर्ता) के पक्ष में निष्पादित एक वसीयत को रद्द करने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था।
ट्रायल कोर्ट ने 1 दिसंबर 2008 को इस मामले में आठ मुद्दे तय किए थे। इनमें मुद्दा संख्या 3 परिसीमा (Limitation) से संबंधित था और मुद्दा संख्या 6 इस पर था कि क्या यह वाद U.P.Z.A. & L.R. अधिनियम, 1950 की धारा 331 के तहत वर्जित है। लगभग 18 साल बाद और वादी के साक्ष्य दर्ज होने के बाद, प्रतिवादी ने 2 जुलाई 2025 को एक आवेदन देकर इन दोनों मुद्दों को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करने की मांग की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि आदेश XIV नियम 2 CPC के तहत, अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) या कानूनी बाधाओं से संबंधित मुद्दों को प्रारंभिक रूप में तय करना अदालत के लिए अनिवार्य है। उन्होंने दलील दी कि चूंकि मुद्दा संख्या 3 और 6 परिसीमा और सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से संबंधित हैं, इसलिए उन पर पहले फैसला होना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी प्रावधान
हाईकोर्ट ने आदेश XIV नियम 2 CPC के ऐतिहासिक विकास और 1976 के संशोधन के प्रभाव का विश्लेषण किया।
1976 के संशोधन से पहले: कोर्ट ने गौर किया कि पुराने नियम के तहत कानूनी मुद्दों को प्रारंभिक मानकर तय करना अदालत के लिए “बाध्यकारी” था।
1976 के संशोधन के बाद: कोर्ट ने कहा कि अब उप-नियम (1) यह निर्देश देता है कि अदालत उप-नियम (2) के अधीन रहते हुए “सभी मुद्दों पर निर्णय सुनाएगी।” सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड बनाम गोपाल सिंह विशारद (AIR 1991 इलाहाबाद 89) के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया:
“पुराने आदेश 14 नियम 2 में इस्तेमाल किए गए ‘Shall’ (होगा) शब्द को अब ‘May’ (सकती है) से बदल दिया गया है। इसलिए अब यह अदालत का विवेकाधिकार है कि वह कानून के मुद्दे को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करे या अन्य मुद्दों के साथ। अब यह अनिवार्य नहीं है।”
अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि भले ही मुद्दा अधिकार क्षेत्र या कानूनी रोक से संबंधित हो, फिर भी ट्रायल कोर्ट उसे प्रारंभिक मुद्दा मानने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। इस संबंध में मिथिलेश कुमारी बनाम ग्राम सभा (1999 AIR इलाहाबाद 304) और सिद्ध नाथ बनाम जिला जज, मिर्जापुर (AIR 2002 इलाहाबाद 356) के फैसलों का भी उल्लेख किया गया।
तथ्य और कानून के मिश्रित प्रश्न
परिसीमा (Limitation) के सवाल पर न्यायमूर्ति निगम ने रमेश डी. देसाई बनाम बिपिन वाडीलाल मेहता (2006 5 SCC 638) का हवाला देते हुए कहा:
“परिसीमा की दलील को तथ्यों से अलग कानून के एक अमूर्त सिद्धांत के रूप में तय नहीं किया जा सकता, क्योंकि हर मामले में परिसीमा की शुरुआत का पता लगाना पूरी तरह से तथ्य का प्रश्न है।”
कोर्ट ने मेजर एस.एस. खन्ना बनाम ब्रिगेडियर एफ.जे. डिलन (AIR 1964 SC 497) के सिद्धांत को दोहराया कि कानून और तथ्य के “मिश्रित मुद्दों” को प्रारंभिक रूप में तय करने का अधिकार क्षेत्र संहिता में नहीं है, क्योंकि इससे मुकदमे की सुनवाई “एकतरफा” (Lopsided) हो सकती है।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के आवेदन को सद्भावनापूर्ण (Bona fide) नहीं माना, क्योंकि मुकदमा 2006 से लंबित था और प्रतिवादी ने 18 वर्षों तक इन मुद्दों को प्रारंभिक रूप में तय करने की मांग नहीं की थी।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“मेरी सुविचारित राय में, मुद्दों के निर्धारण के 18 साल बाद प्रतिवादी द्वारा दिए गए आवेदन पर उन मुद्दों को प्रारंभिक रूप में तय करने का निर्देश देने का कोई औचित्य नहीं है… यह उचित होगा कि निचली अदालत सभी पक्षों के साक्ष्य पर विचार करने के बाद सभी मुद्दों पर एक साथ फैसला सुनाए।”
अदालत ने निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार एक वर्ष के भीतर वाद का शीघ्र निस्तारण करने का हर संभव प्रयास करे।
केस विवरण:
- केस का नाम: पारस @ राम पारस बनाम राम चरित्र और अन्य
- केस संख्या: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 नंबर 13103/2025
- पीठ: न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम
- दिनांक: 20 मार्च 2026

