हाईकोर्ट ने एक पति द्वारा भरण-पोषण के आदेशों को रद्द करने के लिए दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी के अलग रहने के “पर्याप्त कारण” का मुद्दा पिछले अदालती फैसलों में पहले ही तय हो चुका है।
जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि निचली अदालत द्वारा पति के आवेदन (धारा 125 (4) और (5) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत) को खारिज करने के निर्णय में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता मनोज कुमार यादव और विपक्षी संख्या 2, श्रीमती सीता का विवाह 5 फरवरी 2005 को हुआ था। वैवाहिक विवादों के बाद, 31 अगस्त 2010 को पत्नी के पक्ष में भरण-पोषण का आदेश दिया गया था। बाद में 17 दिसंबर 2016 को धारा 127 Cr.P.C. के तहत इस राशि को बढ़ा दिया गया था।
पति ने साल 2023 में ललितपुर के प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय के समक्ष धारा 125 (4) (5) Cr.P.C. के तहत इन आदेशों को रद्द करने की मांग की। उसने दावा किया कि उसकी पत्नी बिना किसी उचित कारण के अलग रह रही है और वह स्वयं एक वकील के रूप में कार्यरत है। पति का यह भी तर्क था कि जून 2005 से ही वैवाहिक संबंधों का पालन नहीं हुआ है। परिवार न्यायालय ने 18 दिसंबर 2024 को उसके इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ यह पुनरीक्षण याचिका दायर की गई थी।
पक्षकारों के तर्क
पति के वकील ने दलील दी कि निचली अदालत ने उन सबूतों पर गौर नहीं किया जो दिखाते हैं कि पत्नी 2005 से बिना किसी पर्याप्त कारण के अलग रह रही है। यह भी तर्क दिया गया कि पत्नी द्वारा वैवाहिक कर्तव्यों को पूरा न करना क्रूरता (Cruelty) की श्रेणी में आता है, जिससे पति “वैवाहिक सुख” से वंचित रहा। याचिकाकर्ता ने यह भी उल्लेख किया कि उसे धारा 498-A IPC के मामले में 8 दिसंबर 2022 को बरी कर दिया गया है, इसलिए अब भरण-पोषण का आदेश रद्द होना चाहिए।
दूसरी ओर, ए.जी.ए. (A.G.A.) और पत्नी के वकील ने पुनरीक्षण याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि “अलग रहने” का कारण 2010 में ही तय हो चुका था। उन्होंने बताया कि पति ने 13 साल से अधिक समय तक 2010 के आदेश को चुनौती नहीं दी और भरण-पोषण का भुगतान भी करता रहा। उनके अनुसार, पक्षकारों के बीच चल रही लंबी मुकदमेबाजी अपने आप में पत्नी के लिए अलग रहने का एक “पर्याप्त कारण” है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के निष्कर्षों का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि पति के आवेदन पर ‘विबंधन का सिद्धांत’ (Law of Estoppel) लागू होता है क्योंकि 2010 के आदेश को उसने लंबे समय तक स्वीकार किया था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पति ने पत्नी पर व्यभिचार (Adultery) का कोई आरोप नहीं लगाया है।
अलग रहने के कारण पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा:
“याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच के बाद, निचली अदालत ने पाया है कि कोई भी दस्तावेज यह संकेत नहीं देता है कि विपक्षी संख्या 2 बिना किसी उचित कारण के याचिकाकर्ता से अलग रह रही है। ये दस्तावेज स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि पक्षकारों के बीच काफी मुकदमेबाजी चल रही है। इसलिए, यदि विपक्षी संख्या 2 याचिकाकर्ता से अलग रह रही है, तो वह निश्चित रूप से पर्याप्त कारण से ही अलग रह रही होगी।”
अदालत ने अपनी पुनरीक्षण शक्तियों की सीमाओं को रेखांकित करते हुए कहा:
“चूंकि यह अदालत पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (Revisional Jurisdiction) के तहत सुनवाई कर रही है, इसलिए यह साक्ष्यों का पुनः मूल्यांकन (Re-appreciation of evidence) नहीं कर सकती जैसा कि याचिकाकर्ता के वकील ने सुझाव दिया है… इस अदालत का विचार है कि अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह अदालत अपने निष्कर्षों को प्रतिस्थापित (Substitute) नहीं कर सकती।”
अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता भरण-पोषण के आदेशों को रद्द करने के लिए उठाए गए आधारों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। कोर्ट ने याचिका को योग्यताहीन पाते हुए खारिज कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत के आदेश में कोई खामी नहीं है। मुकदमे के खर्च (Costs) के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया है।
केस विवरण:
- केस टाइटल: मनोज कुमार यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल रिवीज़न नंबर 1298 ऑफ 2025
- पीठ: जस्टिस मदन पाल सिंह
- आदेश की तिथि: 10 मार्च 2026

