केवल आदेश पारित होने से समाप्त नहीं होगी धारा 24 की कार्यवाही, मौके पर सीमांकन और कब्जा दिलाना अनिवार्य; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जारी किए दिशा-निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 24 के तहत सीमा विवाद (मेड़बंदी) की कार्यवाही को केवल सीमांकन आदेश पारित होने पर “निस्तारित” या “समाप्त” नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यह कार्यवाही तब ही पूर्ण मानी जाएगी जब मौके पर वास्तविक रूप से पत्थरगड्डी (boundary marks) लगाई जाए और यदि आवश्यक हो, तो वादी को कब्जा दिलाया जाए।

राजस्व अधिकारियों की निष्क्रियता के खिलाफ दायर याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई करते हुए, हाईकोर्ट ने सीमांकन आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए 11 विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की पीठ कई रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मीना देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (रिट-सी संख्या 35470/2025) प्रमुख याचिका थी। याचिकाकर्ताओं की सामान्य शिकायत यह थी कि राजस्व संहिता की धारा 24 के तहत सक्षम अधिकारियों द्वारा अंतिम सीमांकन आदेश पारित किए जाने के बावजूद, उनका पालन नहीं किया जा रहा है।

मुख्य मामले में, प्रयागराज जिले की एक भूमिधर, मीना देवी के पक्ष में 2 जनवरी, 2024 को सीमांकन का अंतिम आदेश पारित किया गया था। राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट की पुष्टि के बाद यह आदेश अंतिम हो चुका था, लेकिन पुलिस बल की अनुपलब्धता का हवाला देकर अधिकारी इसे लागू करने में विफल रहे। इसी तरह अन्य जुड़ी याचिकाओं में भी, अपील की अवधि समाप्त होने के बावजूद अंतिम आदेशों का अनुपालन नहीं हो सका था।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि यद्यपि धारा 24 के तहत संक्षिप्त कार्यवाही उनके पक्ष में अंतिम आदेशों के साथ समाप्त हो चुकी है, लेकिन राजस्व अधिकारी उन्हें निष्पादित करने में विफल रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिवादी “अवरोधक रणनीति” अपना रहे हैं और अपने वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर रहे हैं, जिससे पूरी न्यायिक प्रक्रिया निष्प्रभावी हो गई है। याचिकाकर्ताओं ने इसे मनमाना और अवैध बताते हुए कहा कि इससे उन्हें “गंभीर कठिनाई और अपूरणीय क्षति” हो रही है।

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राज्य सरकार की ओर से पेश अपर महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि संहिता की धारा 24 और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के नियम 22 में एक विस्तृत प्रक्रिया दी गई है। उन्होंने कोर्ट को सूचित किया कि आदेशों के निष्पादन न होने की समस्या को संज्ञान में लेते हुए, राज्य सरकार ने 16 दिसंबर, 2025 को एक परिपत्र (Circular) जारी किया है। यह परिपत्र सीमांकन के भौतिक सत्यापन को अनिवार्य बनाता है और उन अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान करता है जो मौके पर वास्तविक सीमांकन सुनिश्चित किए बिना फाइलों को रिकॉर्ड रूम में दाखिल कर देते हैं।

कोर्ट का विश्लेषण

न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने राजस्व संहिता की धारा 24 और नियमावली 2016 के नियम 22 की वैधानिक योजना का गहन विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा कि धारा 24 सीमा विवादों के लिए एक त्वरित उपचार प्रदान करती है और स्पष्ट रूप से उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) को यह शक्ति देती है कि वह गलत तरीके से कब्जा करने वाले व्यक्ति को बेदखल करें और कानूनी रूप से हकदार व्यक्ति को कब्जा दिलाएं, जिसके लिए यदि आवश्यक हो तो बल का प्रयोग भी किया जा सकता है।

कोर्ट ने नोट किया कि एसडीएम अर्द्ध-न्यायिक (quasi-judicial) और प्रशासनिक दोनों तरह के कार्य करता है। पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

“प्रशासनिक कानून के संदर्भ में, अर्द्ध-न्यायिक शक्ति के प्रयोग के लिए प्रभावी प्रवर्तन (enforcement) अभिन्न अंग है। एक आदेश जो मौके पर लागू नहीं होता, वह पूरी कार्यवाही को केवल एक कागजी कसरत तक सीमित कर देता है और विधायी मंशा को विफल करता है।”

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हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि धारा 24 के तहत शक्ति केवल न्यायनिर्णयन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रवर्तन की शक्तियां भी शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि अनुपालन सुनिश्चित किए बिना केवल आदेश पारित करने तक क्षेत्राधिकार को सीमित करना वैधानिक तंत्र को “व्यर्थ” बना देगा।

निर्णय और दिशा-निर्देश

याचिकाओं का निस्तारण करते हुए, हाईकोर्ट ने धारा 24 के आदेशों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए 11 व्यापक दिशा-निर्देश तैयार किए। मुख्य दिशा-निर्देश निम्नलिखित हैं:

  1. न्यायनिर्णयन से पूर्व: कार्यवाही शुरू करने से पहले आवेदनों को नियम 22 (अद्यतन खतौनी, आस-पास के गाटा का विवरण आदि) का सख्ती से पालन करना चाहिए। एसडीएम को उसी दिन या अगले कार्य दिवस पर राजस्व न्यायालय कम्प्यूटरीकृत प्रबंधन प्रणाली (RCCMS) में मामला दर्ज करना होगा।
  2. सीमांकन और जांच: आदेश की तारीख से एक महीने के भीतर सीमांकन पूरा किया जाना चाहिए। रिपोर्ट तैयार होने के एक सप्ताह के भीतर एसडीएम को प्रस्तुत की जानी चाहिए।
  3. निष्पादन और कब्जा: एसडीएम को “सर्वाधिक हकदार” व्यक्ति को कब्जा दिलाना होगा या गलत तरीके से बेदखल किए गए व्यक्ति को कब्जा वापस दिलाना होगा। जहां विरोध की आशंका हो, वहां पुलिस बल के लिए लिखित मांग अनिवार्य है।
  4. निष्पादन के बाद अनुपालन: पिलर (सीमा चिन्ह) के स्थान और कब्जे की स्थिति का विवरण देते हुए एक अनुपालन रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए, जिसके साथ जियो-टैग्ड तस्वीरें (GPS-enabled) होनी चाहिए। इस सत्यापन रिपोर्ट को RCCMS पोर्टल पर अपलोड किया जाना अनिवार्य है।
  5. अपीलों का शीघ्र निस्तारण: कमिश्नर के समक्ष अपील दायर करने मात्र से स्वत: स्थगन (automatic stay) नहीं होगा। जब तक कोई स्पष्ट अंतरिम स्थगन आदेश नहीं दिया जाता, निष्पादन जारी रहना चाहिए।
  6. अंतरिम सुरक्षा: जांच लंबित रहने के दौरान, एसडीएम यथास्थिति बनाए रखने या अवैध निर्माण को रोकने के लिए अंतरिम आदेश पारित कर सकते हैं।
  7. कार्यवाही का समापन:
    “धारा 24 के तहत किसी आवेदन को तब तक ‘निस्तारित’ और कार्यवाही को ‘समाप्त’ नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि आदेश के परिणामस्वरूप मौके पर सीमा चिन्हों (पत्थरगड्डी) को लगा नहीं दिया जाता। जब तक जियो-टैग्ड तस्वीर के साथ भौतिक सत्यापन रिपोर्ट अपलोड नहीं की जाती, तब तक फाइल को रिकॉर्ड रूम में दाखिल नहीं किया जाएगा।”
  8. जवाबदेही: वैधानिक समयसीमा से परे लगातार देरी या आदेशों को निष्पादित करने में जानबूझकर विफलता अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई को आमंत्रित करेगी।
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निर्देश

हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य के राजस्व सचिव को निर्देश दिया कि वे इन दिशा-निर्देशों को राज्य भर के सभी राजस्व अधिकारियों को परिचालित करें।

याचिकाकर्ताओं के संबंध में, कोर्ट ने संबंधित एसडीएम को निर्देश दिया:

“इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने की तिथि से चार सप्ताह के भीतर, अनुमोदित साइट मेमो/सीमांकन रिपोर्ट के अनुसार सख्ती से, सीमा चिन्हों (पत्थरगड्डी) को लगाकर और जहां भी आवश्यक हो, कब्जा बहाली सुनिश्चित करके, तत्काल सभी विषयगत आदेशों को निष्पादित करें।”

केस विवरण:

  • केस टाइटल: मीना देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 5 अन्य (और संबद्ध मामले)
  • केस संख्या: रिट-सी संख्या 35470 ऑफ 2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव
  • याचिकाकर्ताओं के वकील: रोहित पांडेय, आजाद राय, व अन्य
  • प्रतिवादियों के वकील: मनीष गोयल (अपर महाधिवक्ता), जे.एन. मौर्य (सीएससी), अभिषेक शुक्ला (एसीएससी)

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