इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें एक व्यक्ति को बच्चे के भरण-पोषण के लिए भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि “विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों” में पिता और संतान दोनों को डीएनए (DNA) परीक्षण के माध्यम से अपने जैविक संबंधों की सच्चाई जानने का अधिकार है।
जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने एक क्रिमिनल रिवीजन पर सुनवाई करते हुए प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, सोनभद्र को निर्देश दिया कि वे रिवीजनिस्ट और बच्चे (विपक्षी संख्या 2) का डीएनए टेस्ट कराने के बाद भरण-पोषण के आवेदन पर नए सिरे से निर्णय लें।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, रिवीजनिस्ट का विवाह 23 जून, 1994 को विपक्षी संख्या 2 की मां के साथ हुआ था। रिवीजनिस्ट का आरोप है कि उसकी पत्नी फरवरी 2000 में बिना किसी कारण के ससुराल छोड़कर चली गई और किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने लगी। रिवीजनिस्ट ने दावा किया कि विपक्षी संख्या 2 का जन्म 1 जनवरी, 2011 को हुआ था, जो उसकी पत्नी के उस व्यक्ति के साथ “अवैध संबंधों” का परिणाम है।
2019 में, बच्चे ने अपनी मां के माध्यम से धारा 125 Cr.P.C. के तहत आवेदन दायर कर भरण-पोषण की मांग की, जिसमें दावा किया गया कि रिवीजनिस्ट ही उसका वास्तविक पिता है। फैमिली कोर्ट ने 1 मार्च, 2025 को आवेदन स्वीकार करते हुए रिवीजनिस्ट को आवेदन की तारीख से ₹3,000 प्रति माह और निर्णय की तारीख से शादी होने तक ₹6,000 प्रति माह भुगतान करने का निर्देश दिया था।
पक्षों की दलीलें
रिवीजनिस्ट के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि मां फरवरी 2000 से अलग रह रही थी और दूसरे व्यक्ति के साथ विवाहेतर संबंध में थी, इसलिए रिवीजनिस्ट जैविक पिता नहीं हो सकता। कोर्ट को बताया गया कि पितृत्व सुनिश्चित करने के लिए डीएनए टेस्ट एक “बहुत महत्वपूर्ण कारक” है। रिवीजनिस्ट ने यह भी बताया कि ट्रायल कोर्ट ने पहले 1 फरवरी, 2025 को डीएनए टेस्ट के उसके आवेदन को खारिज कर दिया था।
दूसरी ओर, विपक्षी संख्या 2 के वकील और सरकारी वकील (A.G.A.) ने फैमिली कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। हालांकि, हाईकोर्ट की पूछताछ के दौरान, विपक्षी संख्या 2 के वकील ने स्वीकार किया कि मां 2011 से दूसरे व्यक्ति के साथ रह रही थी और उनसे उनकी एक दूसरी संतान भी है, लेकिन उन्होंने यह बनाए रखा कि पहली संतान (विपक्षी संख्या 2) का पिता रिवीजनिस्ट ही है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
कोर्ट ने घटनाक्रम की समयरेखा (Timeline) के संबंध में कई “परेशान करने वाले तथ्यों” पर गौर किया। जहां मां ने दावा किया कि वह 2009 और 2010 में कुछ समय के लिए ससुराल में रुकी थी और तभी गर्भधारण हुआ था, वहीं रिवीजनिस्ट ने जन्म रिकॉर्ड पेश किए जिसमें जन्म की तारीखों (20 नवंबर, 2009 बनाम 1 जनवरी, 2011) और दर्ज पितृत्व में विरोधाभास था।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नंदलाल वासुदेव बदवाइक बनाम लता नंदलाल बदवाइक एवं अन्य (2014) मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 पितृत्व का अनुमान तो लगाती है, लेकिन यह खंडन योग्य है। हाईकोर्ट ने उद्धृत किया:
“हमारी राय में, जब कानून के तहत परिकल्पित निर्णायक प्रमाण और विश्व समुदाय द्वारा सही स्वीकार किए गए वैज्ञानिक विकास पर आधारित प्रमाण के बीच संघर्ष होता है, तो बाद वाला (वैज्ञानिक प्रमाण) पहले वाले पर प्रभावी होना चाहिए।”
कोर्ट ने आर. राजेंद्रन बनाम कमर निशा और अन्य (2025) और सचिन अग्रवाल बनाम यूपी राज्य (2024) के निर्णयों पर भी चर्चा की, जिसमें जोर दिया गया था कि डीएनए टेस्ट नियमित रूप से नहीं, बल्कि न्याय के लिए सत्य की आवश्यकता होने पर अनिवार्य है।
जस्टिस मदन पाल सिंह ने अवलोकन किया:
“कोर्ट की दृष्टि में, वर्तमान मामले में ऐसे विशिष्ट तथ्य और परिस्थितियाँ शामिल हैं जिनमें एक पिता (रिवीजनिस्ट) को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वह विपक्षी संख्या 2 का जैविक पिता है या नहीं। इसी तरह, एक बेटी (विपक्षी संख्या 2) को भी यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसका जैविक पिता कौन है, क्योंकि यदि यह नहीं पता चलता है, तो यह जीवन भर दोनों को परेशान करता रहेगा…”
निर्णय
हाईकोर्ट ने क्रिमिनल रिवीजन को स्वीकार करते हुए 1 मार्च, 2025 के विवादित फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया:
- रिवीजनिस्ट और विपक्षी संख्या 2 का डीएनए टेस्ट कराया जाए।
- ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार, दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देते हुए, गुण-दोष के आधार पर मामले का नए सिरे से निर्णय ले।
- इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत होने के तीन महीने के भीतर कार्यवाही अधिमानतः पूरी की जाए।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: जवाहर लाल जायसवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 1428 ऑफ 2025
- बेंच: जस्टिस मदन पाल सिंह
- दिनांक: 17 मार्च, 2026

