महिला की विवाह पसंद पर पारिवारिक आपत्ति को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बताया “घृणित”, कहा – यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक वयस्क महिला की विवाह की स्वतंत्र पसंद पर उसके परिवार द्वारा जताई गई आपत्ति को सख्त शब्दों में निंदा करते हुए उसे “घृणित” करार दिया और कहा कि यह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी वयस्क को अपनी मर्जी से विवाह करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार — के तहत सुरक्षित है।

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनिर और न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसे महिला के पिता और भाई ने दाखिल किया था। वे मिर्जापुर के चिल्ह थाना क्षेत्र में उनके विरुद्ध दर्ज एफआईआर को रद्द कराने की मांग कर रहे थे। यह एफआईआर 27 वर्षीय महिला ने दर्ज कराई थी, जिसमें उसने आरोप लगाया कि उसके परिवार के लोग उसे अगवा करने और उसकी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने से रोकने की धमकी दे रहे हैं। महिला ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 140(3) (अपहरण) और धारा 352 (शांति भंग करने की नीयत से जानबूझकर अपमान) समेत कई धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया था।

13 जून को पारित आदेश में न्यायालय ने कहा:
“यह अत्यंत घृणित है कि याचिकाकर्ता परिवार के एक वयस्क सदस्य, एक 27 वर्षीय महिला, द्वारा अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने के निर्णय का विरोध कर रहे हैं। यह कम से कम वह अधिकार है जो संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक वयस्क को प्राप्त है।”

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि वह यह नहीं कह रही है कि याचिकाकर्ताओं ने महिला के अपहरण का सच में प्रयास किया, लेकिन उसने इस प्रकरण को व्यापक सामाजिक समस्या के रूप में चिन्हित किया — संविधानिक मूल्यों और समाज में प्रचलित मान्यताओं के बीच टकराव।

अदालत ने कहा:
“यह तथ्य कि ऐसे अधिकारों के प्रयोग पर सामाजिक और पारिवारिक प्रतिरोध होता है, यह स्पष्ट रूप से संविधानिक आदर्शों और सामाजिक मूल्यों के बीच ‘मूल्य विरोधाभास’ को दर्शाता है। जब तक संविधान और समाज द्वारा पोषित मूल्यों के बीच यह अंतर रहेगा, इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी।”

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अदालत ने महिला को सुरक्षा प्रदान की और उसके पिता व भाई को आदेश दिया कि वे न तो उससे, न उसके इच्छित जीवनसाथी से कोई संपर्क करें — न फोन के माध्यम से, न इंटरनेट से और न किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से। पुलिस को भी निर्देश दिया गया कि महिला की स्वतंत्रता में किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप न किया जाए।

हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी, लेकिन अगली सुनवाई की तारीख 18 जुलाई तय की और राज्य के अधिवक्ता व महिला को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय दिया।

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