इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि पुलिस जांच में केवल कमियों या खामियों के आधार पर किसी आरोपी को डिस्चार्ज (मुक्त) या बरी नहीं किया जा सकता। जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने कहा कि अदालत को अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए अन्य साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करना चाहिए ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अमीर उर्फ जमीर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (आवेदन संख्या 528 बीएनएसएस संख्या 44853 वर्ष 2024) से संबंधित है। इसकी शुरुआत 12 दिसंबर, 2019 को हुई थी। प्रयागराज के थाना शंकरगढ़ में दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, गश्ती दल को सूचना मिली थी कि चित्रकूट से बिहार तक सांडों को अवैध रूप से ले जाया जा रहा है।
पुलिस का आरोप था कि ट्रक चालक ने पुलिस दल पर वाहन चढ़ाने की कोशिश की और बाद में नियंत्रण खो दिया। मौके से अमीर सहित पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया और 19 सांड बरामद किए गए। आवेदक के खिलाफ आईपीसी की धारा 307, उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 की धारा 3/5ए/8 और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 11 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
पक्षों की दलीलें
आवेदक के वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अमीर को गलत तरीके से फंसाया गया है और उसे घटनास्थल से गिरफ्तार नहीं किया गया था। यह दावा किया गया कि घूरपुर के थाना प्रभारी ने उसे मोबाइल पर फोन करके थाने बुलाया था, जहां उसे अवैध रूप से हिरासत में ले लिया गया।
बचाव पक्ष ने केस डायरी (पर्चा संख्या SCD-9) में विसंगतियों का मुद्दा उठाया, जिसमें कथित तौर पर आवेदक के गनर का बयान था कि घटना के समय आवेदक कानपुर में था। आरोप लगाया गया कि जांच अधिकारी ने निष्पक्ष जांच न करते हुए इस पर्चे को डायरी से हटा दिया और मामले को “दूषित और दोषपूर्ण” बना दिया।
वहीं, राज्य की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) ने दलील दी कि आवेदक पहले भी इन्हीं आधारों पर चार्जशीट को चुनौती दे चुका है, जिसे 2023 में हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। केस डायरी के लापता हिस्से के संबंध में राज्य ने बताया कि विभागीय जांच में एक उप-निरीक्षक को दोषी पाया गया था, लेकिन गनर का बयान सितंबर 2019 की तारीख का था, जिसका दिसंबर की घटना से कोई संबंध नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने इस कानूनी प्रश्न पर ध्यान केंद्रित किया कि क्या दोषपूर्ण जांच के आधार पर डिस्चार्ज संभव है। जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने टिप्पणी की:
“कानून का यह सिद्धांत पूरी तरह स्पष्ट है कि केवल दोषपूर्ण जांच के आधार पर आरोपी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। यह पूरी तरह से अदालतों के अधिकार क्षेत्र में है कि वे अभियोजन द्वारा एकत्र किए गए शेष साक्ष्यों पर विचार करें।”
सुप्रीम कोर्ट के राम बली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2004) मामले का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि यदि दोषपूर्ण जांच को प्राथमिकता दी गई, तो न केवल कानून प्रवर्तन एजेंसियों बल्कि न्याय व्यवस्था में भी लोगों का विश्वास डगमगा जाएगा।
डिस्चार्ज के चरण (B.N.S.S. की धारा 250/251) पर अदालत ने जोर दिया कि इस स्तर पर “मिनी-ट्रायल” की आवश्यकता नहीं है। सज्जन कुमार बनाम सी.बी.आई. (2010) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश को केवल यह देखना चाहिए कि क्या आरोपी के खिलाफ कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार हैं।
हाईकोर्ट ने आगे कहा:
“आरोप तय करने के प्रारंभिक चरण में, अदालत का सरोकार सबूतों से नहीं बल्कि इस मजबूत संदेह से है कि आरोपी ने अपराध किया है, जो मुकदमे के दौरान उसे दोषी साबित कर सकता है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने 14 अगस्त, 2024 को डिस्चार्ज अर्जी खारिज करते हुए और 12 सितंबर, 2024 को आरोप तय करते हुए एक तर्कसंगत आदेश पारित किया था। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आवेदक द्वारा उठाए गए आधार “तथ्यों के विवादित प्रश्न” हैं, जिनका फैसला केवल ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।
निचली अदालत के आदेशों में कोई “अवैधता या अनियमितता” न पाते हुए, हाईकोर्ट ने आवेदन को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण:
- केस शीर्षक: अमीर उर्फ जमीर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: APPLICATION U/S 528 BNSS No. 44853 of 2024
- पीठ: जस्टिस विवेक कुमार सिंह
- निर्णय की तिथि: 1 अप्रैल, 2026

