किरायेदार के पास पहले से कब्जा होने मात्र से, ‘एग्रीमेंट टू सेल’ को ‘बिक्री’ नहीं माना जा सकता जब तक कि किरायेदारी परित्याग न किया गया हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई मकान मालिक अपने मौजूदा किरायेदार के साथ संपत्ति बेचने का समझौता (Agreement to Sell) करता है, और किरायेदार पहले से ही उस संपत्ति पर काबिज है, तो ऐसे समझौते को स्टांप शुल्क के उद्देश्य से “डीम्ड कन्वेयंस” (Deemed Conveyance) या “बिक्री” नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि यह तभी लागू होगा जब समझौते के हिस्से के रूप में कब्जा सौंपा गया हो या किरायेदारी का समर्पण (Surrender of Tenancy) किया गया हो।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने वायेती श्रीनिवासराव बनाम गनेदी जगज्योती के मामले में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट और निचली अदालत के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें एग्रीमेंट टू सेल को “कन्वेयंस डीड” मानते हुए उसे जब्त (impound) कर लिया गया था और भारी स्टांप शुल्क व जुर्माने की मांग की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, वायेती श्रीनिवासराव, आंध्र प्रदेश के डौलेश्वरम गांव स्थित एक संपत्ति में 50 वर्षों से अधिक समय से प्रतिवादी गनेदी जगज्योती के किरायेदार थे। 14 अक्टूबर 2009 को, दोनों पक्षों ने उस संपत्ति को 9,00,000 रुपये में खरीदने/बेचने के लिए एक समझौता (Agreement to Sell) किया, जिसके तहत 6,50,000 रुपये अग्रिम राशि के रूप में दिए गए।

जब मकान मालिकन ने कथित तौर पर सेल डीड निष्पादित करने से इनकार कर दिया, तो अपीलकर्ता ने ‘विशिष्ट पालन’ (Specific Performance) के लिए मुकदमा (O.S. No. 188/2013) दायर किया। सुनवाई के दौरान, जब अपीलकर्ता ने एग्रीमेंट टू सेल को सबूत के तौर पर पेश करना चाहा, तो प्रतिवादी ने आपत्ति जताई। प्रतिवादी का तर्क था कि चूंकि किरायेदार पहले से ही कब्जे में है, इसलिए स्टांप (आंध्र प्रदेश संशोधन) अधिनियम, 1922 के तहत यह दस्तावेज “कन्वेयंस डीड” (बिक्री विलेख) की श्रेणी में आता है और इस पर पूरा स्टांप शुल्क और जुर्माना लगना चाहिए।

निचली अदालत ने 21 दिसंबर 2016 को इस आपत्ति को सही ठहराया। बाद में, 2022 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने भी बी. रत्नमाला बनाम जी. रुद्रम्मा के फैसले का हवाला देते हुए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि समझौता कब्जे के हस्तांतरण का प्रमाण है।

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महत्वपूर्ण बात यह है कि इन कार्यवाहियों के समानांतर, मकान मालिकन ने आंध्र प्रदेश भवन (किराया और बेदखली) नियंत्रण अधिनियम, 1960 के तहत अपीलकर्ता को बेदखल करने के लिए भी एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्हें 3 जनवरी 2017 को सफलता मिली थी और बेदखली का आदेश पारित हुआ था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता दशकों से किरायेदार के रूप में संपत्ति पर काबिज था और उसने एग्रीमेंट टू सेल के तहत खरीदार (Vendee) के रूप में कब्जा प्राप्त नहीं किया था। यह दलील दी गई कि किरायेदारी कभी समाप्त नहीं हुई थी, जिसका प्रमाण यह है कि उसके खिलाफ बाद में बेदखली का आदेश (Eviction Decree) पारित किया गया था। इसलिए, एग्रीमेंट को एपी स्टांप अधिनियम की अनुसूची I-A के अनुच्छेद 47A के स्पष्टीकरण I के अर्थ के भीतर “बिक्री” के रूप में नहीं देखा जा सकता।

वहीं, प्रतिवादी ने तर्क दिया कि एग्रीमेंट टू सेल प्रभावी रूप से एक सेल डीड ही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले रमेश मिश्रीमल जैन बनाम अविनाश विश्वनाथ पाटणे (2025) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि कब्जे का हस्तांतरण होता है या सहमति होती है, तो एग्रीमेंट टू सेल को डीम्ड कन्वेयंस माना जा सकता है।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने एपी स्टांप अधिनियम की अनुसूची I-A के अनुच्छेद 47A के स्पष्टीकरण I का विश्लेषण किया। यह प्रावधान कहता है: “बेची जाने वाली संपत्ति के कब्जे के वितरण के बाद या उसका साक्ष्य देने वाला बिक्री का समझौता (Agreement to Sell) इस अनुच्छेद के तहत ‘बिक्री’ के रूप में प्रभार्य होगा।”

कोर्ट ने वर्तमान मामले को रमेश मिश्रीमल जैन मामले से अलग पाया। पीठ ने कहा कि उस मामले में कोर्ट ने संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 53A (पार्ट परफॉरमेंस) का इस्तेमाल किया था क्योंकि किरायेदार ने खरीदार के रूप में कब्जा हासिल कर लिया था।

हालांकि, वर्तमान मामले में, पीठ ने पाया कि एग्रीमेंट के निष्पादन के बाद भी किरायेदारी जारी थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

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“इस मामले में, 14.10.2009 को एग्रीमेंट टू सेल के निष्पादन की तारीख पर अपीलकर्ता प्रतिवादी-मकान मालिकन का किरायेदार था… सवाल यह है कि क्या एग्रीमेंट टू सेल के निष्पादन पर यह कानूनी रिश्ता विक्रेता और खरीदार के रिश्ते में बदल गया? यदि एग्रीमेंट टू सेल के निष्पादन के बाद भी वाद संपत्ति का कब्जा अपीलकर्ता के पास एक किरायेदार के रूप में ही बना रहा, तो एपी स्टांप अधिनियम के तहत कोई हस्तांतरण/बिक्री नहीं मानी जाएगी।”

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 111 के अनुसार पट्टे (Lease) का कोई “स्पष्ट समर्पण” (Express Surrender) या “निहित समर्पण” (Implied Surrender) नहीं हुआ था। तथ्य यह है कि एग्रीमेंट के बाद मकान मालिकन ने अपीलकर्ता के खिलाफ बेदखली का आदेश प्राप्त किया, यह साबित करता है कि रिश्ता मकान मालिक और किरायेदार का ही बना रहा।

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फैसले में कहा गया:

“प्रतिवादी-मकान मालिक ने एग्रीमेंट टू सेल के बाद अपीलकर्ता-किरायेदार के कब्जे को खरीदार (Vendee) के रूप में नहीं माना… इस प्रकार, अपीलकर्ता द्वारा मकान मालिक के पक्ष में किरायेदारी का कोई समर्पण नहीं किया गया था।”

कोर्ट ने एपी स्टांप अधिनियम के अनुप्रयोग को स्पष्ट करते हुए कहा:

“दूसरे शब्दों में, अपीलकर्ता के पास संपत्ति का कब्जा एग्रीमेंट टू सेल के कारण नहीं आया था और न ही एग्रीमेंट के निष्पादन के अनुसरण में कब्जा सौंपा गया था। इसे ‘डीम्ड कन्वेयंस’ (Deemed Conveyance) केवल तभी माना जाएगा और कन्वेयंस के रूप में स्टांप शुल्क तभी लगाया जाएगा जब कब्जा एग्रीमेंट टू सेल के निष्पादन के संबंध में प्राप्त किया गया हो।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार कर लिया और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट तथा निचली अदालत के आदेशों को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

“अपीलकर्ता उक्त दस्तावेज पर कोई अतिरिक्त शुल्क और जुर्माना देने के लिए उत्तरदायी नहीं है और न ही उक्त दस्तावेज शुल्क और जुर्माने के भुगतान के उद्देश्य से जब्त किए जाने योग्य है।”

निचली अदालत को निर्देश दिया गया कि वह 14.10.2009 के एग्रीमेंट टू सेल को साक्ष्य (Exhibit) के रूप में चिह्नित करे और मुकदमे का निपटारा छह महीने के भीतर करने का प्रयास करे।

केस डिटेल्स:

  • केस का नाम: वायेती श्रीनिवासराव बनाम गनेदी जगज्योती
  • कोरम: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन
  • अपील संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 21976-21977/2023 से उद्भूत)

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