सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि एयर फोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (AFGIS) संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की श्रेणी में आती है, क्योंकि इसका कार्य सशस्त्र बलों के कर्मियों और उनके परिवारों के कल्याण से जुड़ा सार्वजनिक दायित्व निभाना है। अदालत ने इस निष्कर्ष के साथ दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें एएफजीआईएस को ‘राज्य’ नहीं माना गया था।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने 12 मार्च को यह फैसला सुनाते हुए एएफजीआईएस कर्मचारियों की छठे वेतन आयोग से संबंधित मांग वाली याचिका को पुनः दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष बहाल कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने एएफजीआईएस की स्थापना और संचालन से जुड़े दस्तावेजों की समीक्षा करते हुए कहा कि इस संस्था पर सरकार का गहरा और व्यापक नियंत्रण दिखाई देता है। अदालत ने उल्लेख किया कि एएफजीआईएस की स्थापना के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति दी गई थी और इसके लिए बनाए गए प्रतिनियुक्ति नियमों को भी राष्ट्रपति ने मंजूरी दी थी।
पीठ ने यह भी बताया कि एएफजीआईएस के प्रधान निदेशक को हर महीने सोसाइटी की नकदी प्रवाह से जुड़ी जानकारी सहायक वायु स्टाफ प्रमुख को देनी होती है, जिससे भारतीय वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा इसकी गतिविधियों की निगरानी सुनिश्चित होती है।
अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि एएफजीआईएस की सदस्यता भारतीय वायु सेना में सेवा का अनिवार्य हिस्सा है। सेवा के दौरान अधिकारियों के वेतन से स्वतः अंशदान काटा जाता है और इसमें शामिल होना व्यक्तिगत विकल्प नहीं बल्कि सेवा शर्तों का हिस्सा है।
पीठ ने आगे कहा कि एएफजीआईएस के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी और प्रबंध समिति के सभी सदस्य भारतीय वायु सेना के कार्यरत अधिकारी होते हैं, जिन्हें निश्चित अवधि के लिए इस संस्था में प्रतिनियुक्त किया जाता है। अदालत के अनुसार, इससे स्पष्ट है कि इस संस्था का प्रशासन पूरी तरह सरकारी कर्मचारियों के हाथों में है, भले ही यह औपचारिक रूप से एक स्वतंत्र सोसाइटी के रूप में स्थापित हो।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सशस्त्र बलों के कर्मियों की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करना सरकार का मूल कर्तव्य है। ऐसे में उनके लिए बीमा और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराना भी उसी दायित्व का हिस्सा है।
अदालत ने कहा कि सैन्य सेवा से जुड़े लोगों को अक्सर कठिन और जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में कार्य करना पड़ता है। ऐसे में बीमा सुविधा उनके शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है।
पीठ ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था से सैनिकों को यह भरोसा मिलता है कि उनके परिवारों की देखभाल सुनिश्चित है, जिससे वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन बिना चिंता के कर पाते हैं।
सुनवाई के दौरान कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने दलील दी कि 15 मार्च 2016 के एक पत्र में एएफजीआईएस ने स्वयं को सरकारी संस्था बताया था। उन्होंने यह भी कहा कि संस्था की दैनिक गतिविधियां भारतीय वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारी संचालित करते हैं और इसके कार्यालय के लिए भूमि रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रदान की गई है। इसके अलावा संस्था को कई करों में छूट भी प्राप्त है।
न्यायमूर्ति करोल ने इस संदर्भ में कहा कि एएफजीआईएस ने सेवा कर में छूट मांगते समय स्वयं को रक्षा मंत्रालय के अधीन सरकारी संस्था बताया था। अदालत ने कहा कि किसी संस्था का एक उद्देश्य के लिए ‘सरकार’ होना और दूसरे उद्देश्य के लिए इससे इंकार करना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकालते हुए कि एएफजीआईएस अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ है, कर्मचारियों की याचिका को सुनवाई योग्य माना। इसके साथ ही अदालत ने कर्मचारियों की छठे वेतन आयोग से संबंधित याचिका को पुनः दिल्ली हाईकोर्ट में बहाल कर दिया।
पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह इस मामले का शीघ्र निपटारा करे, क्योंकि यह याचिका वर्ष 2017 से लंबित है।

