हिरासत के खिलाफ आवेदन पर फैसले में देरी का उचित कारण हो तो निवारक हिरासत अवैध नहीं होगी: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि निवारक हिरासत में रखे गए व्यक्ति के अभ्यावेदन पर निर्णय लेने में देरी होने मात्र से हिरासत आदेश अवैध नहीं हो जाता, यदि अधिकारी देरी का संतोषजनक कारण बताते हैं। कोर्ट ने जनगणना और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े कार्यों को 52 दिनों की देरी का स्वीकार्य कारण माना।

जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर की डिवीजन बेंच ने लाल चंदन की कथित तस्करी के आरोपी बी. राजशेखर की निवारक हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी।

बेंच ने पाया कि अधिकारियों ने अभ्यावेदन पर निर्णय लेने में लगे समय का पर्याप्त स्पष्टीकरण दिया था और हिरासत आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं था।

छह आपराधिक मामलों के आधार पर निवारक हिरासत

तिरुपति जिले के कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट ने 12 फरवरी 2026 को बी. राजशेखर के खिलाफ निवारक हिरासत का आदेश जारी किया था।

यह आदेश आंध्र प्रदेश प्रिवेंशन ऑफ बूटलेगर्स, डकैत्स, ड्रग ऑफेंडर्स, गुंडाज, इम्मोरल ट्रैफिक ऑफेंडर्स एंड लैंड ग्रैबर्स एक्ट, 1986 की धारा 3(1) और 3(2) के तहत पारित हुआ था।

सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट के बाद राज्य सरकार ने 31 मार्च 2026 को हिरासत की पुष्टि की। हिरासत की अवधि 14 फरवरी 2026 से 12 महीने निर्धारित की गई थी।

आदेश में वर्ष 2024 और 2025 के दौरान दर्ज छह आपराधिक मामलों का उल्लेख था, जो लाल चंदन की कथित अवैध कटाई और तस्करी से संबंधित थे।

इनमें पांच मामले तिरुपति के रेड सैंडर्स एंटी-स्मगलिंग टास्क फोर्स पुलिस स्टेशन और एक मामला चित्तूर के बंगारुपालेम पुलिस स्टेशन में दर्ज था।

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राजशेखर की पत्नी एस. प्रीति ने उसकी रिहाई के लिए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की।

जमानत आवेदन पेश नहीं करने और 52 दिन की देरी पर आपत्ति

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता डी. पूर्णचंद्र रेड्डी ने हिरासत आदेश को दो प्रमुख आधारों पर चुनौती दी।

पहला, छह मामलों में से एक में आरोपी को 6 मार्च 2025 को अग्रिम जमानत मिल चुकी थी, लेकिन उसका जमानत आवेदन हिरासत का आदेश जारी करने वाले अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।

दूसरा, 17 अप्रैल 2026 को भेजे गए अभ्यावेदन को सरकार ने 15 जून 2026 को खारिज किया।

याचिकाकर्ता ने कहा कि सरकार द्वारा टिप्पणियां मांगे जाने के बाद कलेक्टर ने उन्हें भेजने में 38 दिन लगाए। इसके बाद सरकार ने निर्णय लेने में 14 दिन और लगाए। इस प्रकार कुल 52 दिनों की देरी हुई।

राज्य सरकार की ओर से सहायक सरकारी अधिवक्ता अकुला वेंकट साई जगदीश ने इन तारीखों पर विवाद नहीं किया।

हालांकि, उन्होंने कहा कि जवाबी हलफनामे में देरी के कारण स्पष्ट किए गए हैं। साथ ही हिरासत का आदेश जारी करने वाले अधिकारी के सामने प्रत्येक जमानत आवेदन रखना अनिवार्य नहीं है।

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राज्य ने आरोपी को आदतन अपराधी बताते हुए कहा कि उसकी गतिविधियों से वन संपदा को भारी नुकसान पहुंचा और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई।

जमानत आदेश की जानकारी थी, आवेदन की प्रति आवश्यक नहीं

हाईकोर्ट ने पाया कि निवारक हिरासत के आदेश में हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई अग्रिम जमानत का स्पष्ट उल्लेख था।

बेंच ने कहा:

“जब जमानत आदेश पर विचार किया जा चुका था, तब जमानत आवेदन की प्रति प्रासंगिक सामग्री नहीं रह जाती।”

इस आधार पर कोर्ट ने जमानत आवेदन की प्रति प्रस्तुत नहीं किए जाने संबंधी आपत्ति स्वीकार नहीं की।

जनगणना और SIR के कार्यों के कारण हुई देरी स्वीकार

अभ्यावेदन पर निर्णय लेने में देरी के संबंध में अधिकारियों के हलफनामों में बताया गया कि 16 अप्रैल से 15 जून 2026 के बीच जिला अधिकारी और कलेक्ट्रेट कर्मचारी जनगणना संबंधी कार्यों में व्यापक रूप से व्यस्त थे।

इसके बाद निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की तैयारियों से जुड़े कार्य भी किए जा रहे थे।

इन जिम्मेदारियों के कारण कार्यालय के नियमित कामकाज और अभ्यावेदन की प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ा।

हाईकोर्ट ने प्रत्येक चरण में टिप्पणियां प्राप्त करने और अभ्यावेदन पर निर्णय लेने के लिए उठाए गए कदमों की जांच की।

बेंच ने कहा:

“हम संतुष्ट हैं कि अभ्यावेदन पर विचार करने में हुई देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण दिया गया है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि उस अवधि में अधिकारियों द्वारा किए जा रहे सरकारी कार्यों सहित दिया गया स्पष्टीकरण “अस्वीकार्य या अनुचित नहीं कहा जा सकता।”

बेंच ने निष्कर्ष निकाला:

“अभ्यावेदन पर विचार करने और उसे खारिज करने में ऐसी कोई अस्पष्ट या अत्यधिक देरी नहीं हुई है, जिसके आधार पर निवारक हिरासत का आदेश या हिरासत जारी रखना अवैध ठहराया जा सके।”

हिरासत अधिकारी के निर्णय पर अपीलीय अदालत की तरह विचार नहीं कर सकता हाईकोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के Ameena Begum v. State of Telangana फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने निवारक हिरासत के मामलों में न्यायिक समीक्षा की सीमा भी स्पष्ट की।

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बेंच ने कहा कि अदालत “हिरासत का आदेश जारी करने वाले अधिकारी की व्यक्तिपरक संतुष्टि पर अपीलीय अदालत की तरह विचार नहीं करती।”

हाईकोर्ट ने पाया कि हिरासत आदेश पर्याप्त कारणों पर आधारित था और उसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं थी।

इसके साथ ही एस. प्रीति की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी गई। कोर्ट ने मुकदमे के खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: S. Preethi v. State of Andhra Pradesh and Others

केस नंबर: Writ Petition No. 14966 of 2026

पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर

फैसले की तारीख: 13 अक्टूबर 2026

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