ऑपरेशन रक्षक के दौरान कारगिल में तैनात सैनिक को वॉर इंजरी पेंशन का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपील खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने ऑपरेशन रक्षक के तहत कारगिल में तैनाती के दौरान रूमेटॉइड आर्थराइटिस से पीड़ित हुए पूर्व सैनिक को वॉर इंजरी पेंशन (युद्ध में चोट संबंधी पेंशन) देने का फैसला बरकरार रखा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार की यह दलील खारिज कर दी कि ऑपरेशन रक्षक रक्षा मंत्रालय की पेंशन नीति के तहत विशेष रूप से अधिसूचित अभियान नहीं है।

जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) और हाईकोर्ट के फैसलों के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब किसी नीति की भाषा में कोई प्रतिबंध नहीं है, तो अदालतें उसकी व्याख्या करके उसका दायरा सीमित नहीं कर सकतीं, विशेषकर जब मामला पेंशन संबंधी लाभों का हो।

क्या था मामला?

नरेंद्र कुमार 30 दिसंबर 1996 को भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। उनकी तैनाती 13 जुलाई 2003 से 6 जुलाई 2005 तक कारगिल में रही। इसी दौरान उन्हें रूमेटॉइड आर्थराइटिस (सेरोपॉजिटिव) होने का पता चला।

बाद में पश्चिम बंगाल में तैनाती के दौरान उनकी रीढ़ की हड्डी से संबंधित दो अन्य बीमारियों का भी पता चला।

31 जनवरी 2013 को अपने आवेदन पर सेना से सेवामुक्त होने के समय रिलीज मेडिकल बोर्ड ने पाया कि तीनों बीमारियां सैन्य सेवा के कारण बढ़ी थीं। बोर्ड ने जीवनभर के लिए उनकी दिव्यांगता 70 प्रतिशत निर्धारित की, जिसे राउंड ऑफ करके 75 प्रतिशत किया गया। इसके आधार पर उन्हें दिव्यांगता पेंशन दी गई।

करीब छह साल बाद नरेंद्र कुमार ने 31 जनवरी 2001 के रक्षा मंत्रालय के नीति पत्र के पैरा 4.1, श्रेणी E(i), भाग II के तहत वॉर इंजरी पेंशन की मांग करते हुए AFT का रुख किया।

इस प्रावधान में सरकार द्वारा समय-समय पर विशेष रूप से अधिसूचित अभियानों को शामिल किया गया है।

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AFT ने 8 अप्रैल 2024 को उनका आवेदन स्वीकार करते हुए कहा कि पूरा जम्मू-कश्मीर क्षेत्र ऑपरेशनल एरिया है। केंद्र सरकार की चुनौती को हाईकोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को खारिज कर दिया था।

केंद्र सरकार ने ऑपरेशन रक्षक को विशेष अधिसूचित अभियान मानने से इनकार किया

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने दलील दी कि श्रेणी E(i) केवल ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन स्नो लेपर्ड जैसे विशेष रूप से अधिसूचित अभियानों पर लागू होती है।

उन्होंने कहा कि ऑपरेशन रक्षक जैसे लगातार चलने वाले अभियान, जो पूरे जम्मू-कश्मीर क्षेत्र को कवर करते हैं, इस श्रेणी में नहीं आते।

केंद्र का तर्क था कि व्यापक व्याख्या करने से श्रेणी E के अन्य प्रावधान निरर्थक हो जाएंगे और जम्मू-कश्मीर में तैनात प्रत्येक सैनिक वॉर इंजरी पेंशन का पात्र बन जाएगा।

सरकार ने आर्मी ऑर्डर 01 ऑफ 2003 के पैरा 44 का भी हवाला दिया।

वहीं, नरेंद्र कुमार की ओर से कहा गया कि ऑपरेशन रक्षक श्रेणी E(i) के तहत विशेष रूप से अधिसूचित अभियान है। उसी आर्मी ऑर्डर के परिशिष्ट ‘A’ में नियंत्रण रेखा पर जलवायु परिस्थितियों के कारण हुई बीमारी को बैटल कैजुअल्टी माना गया है।

नीति में प्रतिबंध नहीं तो अदालत उसका दायरा सीमित नहीं कर सकती

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि श्रेणी E के उपखंड (a) से (h) युद्ध या अत्यधिक हिंसा जैसी परिस्थितियों से संबंधित हैं। वहीं उपखंड (i) सरकार को अन्य अभियानों को अधिसूचित करने की सुविधा देता है।

बेंच ने स्पष्ट किया कि एक बार कोई अभियान अधिसूचित हो जाने पर श्रेणी E(i) लागू होगी, जब तक नीति या अधिसूचना में इसके विपरीत कोई प्रावधान न हो।

कोर्ट ने कहा:

“विद्वान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के मौखिक कथन के अलावा कि ऑपरेशन रक्षक को श्रेणी E(i) के अंतर्गत शामिल करने का इरादा नहीं था, हमारे सामने व्याख्या का कोई अन्य आधार नहीं है, जिसके जरिए ऑपरेशन रक्षक को श्रेणी E(i) के दायरे से बाहर किया जा सके।”

बेंच ने कहा कि नीति बनाना और लागू करना रक्षा प्रशासन का अधिकार है, लेकिन यह स्पष्ट करने की प्राथमिक जिम्मेदारी भी नीति निर्माता की है कि किसी लाभ का अधिकार कब उत्पन्न होता है और कब नहीं।

कोर्ट ने कहा कि यदि नीति निर्माता की व्याख्या नीति की स्पष्ट भाषा के विपरीत हो या मनमानी, भेदभावपूर्ण अथवा अतार्किक हो, तो अदालत उसे स्वीकार नहीं करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

“नीति वही है जो उसमें लिखा है, न कि वह जो नीति निर्माता की कल्पना में है।”

बेंच ने आगे कहा:

“जब नीति की भाषा प्रतिबंधात्मक नहीं है, तो व्याख्या की प्रक्रिया के जरिए उसके लागू होने के दायरे को सीमित करना अदालत की जिम्मेदारी नहीं है, विशेषकर जब नीति पेंशन संबंधी लाभ देने से जुड़ी हो।”

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सुप्रीम कोर्ट ने आर्मी ऑर्डर 01 ऑफ 2003 पर निर्भर करने से भी इनकार किया। कोर्ट के अनुसार, इससे स्पष्टता मिलने के बजाय अधिक भ्रम पैदा होता है।

रक्षा मंत्रालय को स्पष्ट नियम बनाने की आवश्यकता

सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय के विभिन्न नियमों की लागू होने की स्थिति को लेकर बनी अनिश्चितता पर भी टिप्पणी की।

बेंच ने कहा:

“अब समय आ गया है कि रक्षा मंत्रालय सेवाओं को नियंत्रित करने वाला व्यापक और स्पष्ट रूप से पहचाने जा सकने वाला अधीनस्थ कानून जारी करे।”

कोर्ट ने कहा कि पेंशन लाभों से संबंधित नीतियों की व्याख्या करते समय उनके स्पष्ट शब्दों को महत्व दिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने वॉर इंजरी पेंशन का फैसला बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए नरेंद्र कुमार को वॉर इंजरी पेंशन देने संबंधी फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

इसके साथ ही बेंच ने निर्देश दिया कि भविष्य में श्रेणी E(i) के तहत किसी अभियान को अधिसूचित करते समय सरकार स्पष्ट रूप से बताए कि उस अधिसूचना पर नीति के पैरा 4.1 के पेंशन संबंधी लाभ लागू होंगे या नहीं।

केस डिटेल्स

केस का नाम: Union of India & Ors. v. Narender Kumar

केस नंबर: Civil Appeal arising out of SLP (C) Diary No. 27220 of 2026

पीठ: जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे

फैसले की तारीख: 28 अक्टूबर 2026

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