बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई के एक कारोबारी की 2017 में जबरन वसूली के मामले में हुई गिरफ्तारी को अवैध घोषित करते हुए महाराष्ट्र सरकार को ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने पाया कि एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने रियल एस्टेट डेवलपर के साथ मिलीभगत करके कारोबारी को झूठे मामले में फंसाया और अपने पद तथा पुलिस तंत्र का दुरुपयोग किया।
जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता की डिवीजन बेंच ने संबंधित पुलिस अधिकारी के तत्काल निलंबन सहित सख्त कार्रवाई का निर्देश दिया। इसके अलावा कोर्ट ने कारोबारी को पुलिस और न्यायिक हिरासत में भेजने वाले मजिस्ट्रेटों के आचरण की जांच के लिए मामला हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के समक्ष रखने का आदेश दिया।
फ्लैट की बिक्री के दौरान हुई थी गिरफ्तारी
याचिकाकर्ता बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल अपनी 70 वर्षीय सास के अधिकृत प्रतिनिधि थे। उनकी सास का मुंबई के अंधेरी ईस्ट स्थित एक हाउसिंग सोसायटी में फ्लैट था, जिसका पुनर्विकास मेसर्स सेठ एंड सोनल डेवलपर्स कर रहा था।
अग्रवाल डेवलपर्स के साथ फ्लैट बेचने या पुनर्विकास के बाद अधिक क्षेत्रफल वाला फ्लैट प्राप्त करने के संबंध में बातचीत कर रहे थे।
4 अगस्त 2017 को डेवलपर्स के कार्यालय में हुई बैठक के दौरान लगभग ₹1.64 करोड़ में फ्लैट बेचने की बातचीत हुई। डेवलपर्स ने उन्हें ₹2 लाख अग्रिम राशि के रूप में दिए।
जैसे ही अग्रवाल ने यह रकम प्राप्त की, पुलिस वहां पहुंच गई। पुलिस ने उन्हें हथकड़ी लगाई और आजाद मैदान पुलिस स्टेशन ले गई।
डेवलपर्स की शिकायत पर उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 384 के तहत जबरन वसूली की एफआईआर दर्ज की गई। उसी दिन रात लगभग 8:20 बजे उन्हें CrPC की धारा 41A के तहत नोटिस दिया गया।
अग्रवाल 10 अगस्त 2017 तक पुलिस हिरासत में रहे। इसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। आखिरकार 28 अगस्त 2017 को सेशन कोर्ट ने उन्हें जमानत दी।
याचिकाकर्ता ने पुलिस और बिल्डर की मिलीभगत का आरोप लगाया
हाईकोर्ट में स्वयं अपना पक्ष रखते हुए अग्रवाल ने कहा कि उनकी गिरफ्तारी पूरी तरह अवैध थी और पुलिस सब-इंस्पेक्टर महेश लामखड़े तथा डेवलपर्स की मिलीभगत का परिणाम थी।
उन्होंने दलील दी कि धारा 41A का नोटिस गिरफ्तारी के बाद दिया गया, जबकि कथित अपराध में अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान था। उन्होंने पुलिस रिकॉर्ड में कई गंभीर विरोधाभास होने की भी बात कही।
अपने पक्ष में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य, (2014) 8 SCC 273 फैसले का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने इस बात का भी उल्लेख किया कि अग्रवाल ने पूरी सुनवाई के दौरान गरिमा बनाए रखी और शांत एवं संयमित तरीके से अपना पक्ष रखा।
राज्य सरकार की ओर से अपर लोक अभियोजक जे.पी. याग्निक ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि गिरफ्तारी के आधार और गिरफ्तारी के कारण अलग-अलग अवधारणाएं हैं। CrPC में गिरफ्तारी के आधार बताने का कोई विशेष तरीका या समयसीमा निर्धारित नहीं है।
वहीं, सब-इंस्पेक्टर की ओर से अधिवक्ता अन्वय पवार और अधिवक्ता युवराज तिड़के ने बॉम्बे पुलिस मैनुअल, 1956 के नियम 35 का हवाला दिया।
उनका कहना था कि अधिकारी ने अपने कानूनी कर्तव्य का पालन किया और मजिस्ट्रेट के रिमांड आदेश से गिरफ्तारी को वैधता मिल गई थी। उन्होंने सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई, अर्नेश कुमार और सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस, सीबीआई बनाम तपन कुमार सिंह फैसलों पर भरोसा किया।
पुलिस अधिकारी ने बिल्डर के हित में पुलिस तंत्र का इस्तेमाल किया: हाईकोर्ट
डिवीजन बेंच की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस कमल खाता ने कहा कि याचिकाकर्ता की बात सुनने के बाद कोर्ट को गहरी पीड़ा हुई।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की,
“यह एक ऐसा स्पष्ट उदाहरण है, जिसमें एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया और अपने नियंत्रण में मौजूद पुलिस तंत्र को याचिकाकर्ता के खिलाफ डेवलपर के हितों को आगे बढ़ाने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया, जिससे याचिकाकर्ता के जीवन में भारी तबाही मची।”
कोर्ट ने पुलिस रिकॉर्ड की जांच में पाया कि एफआईआर गिरफ्तारी के बाद दर्ज की गई थी।
इसके अलावा पुलिस द्वारा आरटीआई के जवाब में दी गई जानकारी 23 जून 2017 की कथित लिखित शिकायत के दावे से मेल नहीं खाती थी।
गिरफ्तारी फॉर्म की जांच में कोर्ट ने पाया कि तीन स्थानों पर दर्ज ‘5 अगस्त 2017’ की तारीख को बदलकर ‘4 अगस्त 2017’ कर दिया गया था।
इस पर बेंच ने कहा,
“निस्संदेह, यह कानून के तहत रखे जाने वाले दस्तावेज के साथ छेड़छाड़ है।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि गिरफ्तारी फॉर्म में गिरफ्तारी के आधार, कानूनी अधिकारों और मेडिकल परीक्षण से संबंधित कॉलम खाली थे।
इतना ही नहीं, किसी भी सामग्री के बिना याचिकाकर्ता को बार-बार अपराध करने वाला व्यक्ति बताया गया था।
गिरफ्तारी के बाद दिया गया धारा 41A का नोटिस
हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस ने पहले अग्रवाल को गिरफ्तार किया और उसके बाद CrPC की धारा 41A का नोटिस दिया।
कोर्ट ने कहा,
“स्पष्ट है कि गिरफ्तारी नोटिस दिए जाने से पहले हुई थी और इसलिए स्थापित कानून के अनुसार यह निस्संदेह अवैध थी।”
बेंच ने आवाज के नमूने की फॉरेंसिक जांच का परिणाम उसी दिन प्राप्त होने और फॉरेंसिक रिपोर्ट को चार्जशीट के साथ संलग्न नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने इन परिस्थितियों को दुर्भावनापूर्ण मंशा का संकेत माना।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सतेंद्र कुमार अंतिल, अर्नेश कुमार और तपन कुमार सिंह के फैसले प्रतिवादियों की दलीलों का समर्थन नहीं करते।
बेंच ने निष्कर्ष निकाला,
“गिरफ्तारी दुर्भावनापूर्ण थी और याचिकाकर्ता को परेशान करने, उस पर दबाव डालने तथा समाज में उसकी प्रतिष्ठा धूमिल करने के छिपे उद्देश्य से की गई थी।”
रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट के रवैये पर भी नाराजगी
हाईकोर्ट ने 64वीं कोर्ट के मजिस्ट्रेट को भी याचिकाकर्ता की गलत तरीके से हुई हिरासत के लिए जिम्मेदार पाया।
बेंच ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने हिरासत की अवधि बढ़ाने के लिए कोई कारण दर्ज नहीं किया था।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“विद्वान मजिस्ट्रेट स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल करने में विफल रहे और उन्होंने बेहद लापरवाह रवैया अपनाया।”
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेटों द्वारा दिए गए रिमांड आदेशों पर सवाल उठाते हुए उनके आचरण के संबंध में उचित कार्रवाई के लिए मामला प्रशासनिक समिति के समक्ष रखने का निर्देश दिया।
₹5 लाख मुआवजा और पुलिस अधिकारी के तत्काल निलंबन का आदेश
बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 4 अगस्त 2017 को हुई अग्रवाल की गिरफ्तारी को गैरकानूनी और अवैध घोषित कर दिया।
कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि हाईकोर्ट की वेबसाइट पर फैसला अपलोड होने के दो सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को ₹5 लाख मुआवजा दिया जाए।
बेंच ने पुलिस सब-इंस्पेक्टर महेश लामखड़े और अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ तत्काल निलंबन सहित सख्त कार्रवाई करने का भी निर्देश दिया।
कोर्ट ने राज्य सरकार को यह छूट दी कि यदि वह उचित समझे तो मुआवजे की आनुपातिक रकम संबंधित अधिकारियों के वेतन से वसूल कर सकती है।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि रिमांड मंजूर करने वाले मजिस्ट्रेटों के खिलाफ उचित कार्रवाई के लिए फैसले को हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा जाए।
डेवलपर की ओर से दाखिल हस्तक्षेप आवेदन को भी कोर्ट ने निष्प्रभावी हो जाने के कारण निस्तारित कर दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य
केस नंबर: रिट याचिका संख्या 4458/2017, साथ में क्रिमिनल एप्लीकेशन संख्या 32/2018
बेंच: जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता
फैसले की तारीख: 22 अक्टूबर 2026
