पंजाब राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कहा है कि यदि बीमा कंपनी पॉलिसी में मौजूद किसी अपवाद संबंधी शर्त (Exclusion Clause) को रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं करती है, तो केवल इस आधार पर डबल एक्सीडेंट बेनिफिट देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि पॉलिसीधारक की हत्या पहले से बनाई गई योजना के तहत की गई थी।
आयोग ने मोगा जिला उपभोक्ता आयोग का आदेश रद्द करते हुए भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) को गैंगस्टरों द्वारा मारे गए एक दुकानदार के परिवार को चार बीमा पॉलिसियों के तहत डबल एक्सीडेंट बेनिफिट देने का निर्देश दिया।
यह फैसला पीठासीन न्यायिक सदस्य एच.पी.एस. महल और सदस्य किरण सिब्बल की बेंच ने सुनाया। फैसला सदस्य किरण सिब्बल ने लिखा।
क्या था मामला?
तजिंदर सिंह ने LIC की चार बीमा पॉलिसियां ले रखी थीं, जिनमें डबल एक्सीडेंट बेनिफिट का प्रावधान था। इन पॉलिसियों की बीमित राशि क्रमशः 10 लाख रुपये, 5 लाख रुपये, 10 लाख रुपये और 1.6 लाख रुपये थी।
14 जुलाई 2020 को पंजाब के मोगा स्थित न्यू टाउन इलाके में अपनी दुकान पर बैठे तजिंदर सिंह की अज्ञात व्यक्तियों ने हत्या कर दी। इस घटना के संबंध में FIR दर्ज की गई।
मृतक के परिवार ने बीमा पॉलिसियों के तहत दावा किया। LIC ने सामान्य मृत्यु लाभ का भुगतान कर दिया, लेकिन अपर दुर्घटना लाभ का भुगतान रोक दिया।
30 अप्रैल 2021 को LIC ने पत्र जारी कर डबल एक्सीडेंट बेनिफिट का दावा खारिज कर दिया।
बीमा कंपनी ने सोशल मीडिया पर उपलब्ध सामग्री और पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि गैंगस्टर सुखप्रीत सिंह उर्फ सुखा गिल लम्मे ने इलाके में आतंक फैलाने के उद्देश्य से सुनियोजित तरीके से हत्या कराई थी। इसलिए इस मृत्यु को दुर्घटनात्मक नहीं माना जा सकता।
इसके बाद मृतक की पत्नी रिपनदीप कौर कम्बो, उनके नाबालिग बेटे और मां ने मोगा जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दाखिल की।
उन्होंने 26.6 लाख रुपये ब्याज सहित दिलाने की मांग की।
जिला आयोग ने 29 नवंबर 2022 को शिकायत खारिज कर दी। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के श्रीमती रीता देवी बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के पृथ्वी राज भंडारी बनाम LIC फैसलों पर भरोसा किया था।
इस आदेश को राज्य उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी गई।
परिवार ने कहा, मृतक की गैंगस्टरों से कोई दुश्मनी नहीं थी
अपीलकर्ताओं की ओर से एडवोकेट लिजा बंसल ने दलील दी कि LIC के अपने मामले के अनुसार, तजिंदर सिंह की हत्या गैंगस्टर समूह ने इलाके में आतंक फैलाने के उद्देश्य से की थी।
उन्होंने कहा कि पुलिस उपाधीक्षक (DSP) की रिपोर्ट में स्पष्ट था कि मृतक का गैंगस्टरों की गतिविधियों से कोई संबंध नहीं था।
गैंगस्टरों का उद्देश्य शहर के किसी भी जाने-पहचाने व्यक्ति की हत्या करके लोगों में डर पैदा करना और फिरौती वसूलना था।
उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी और मृतक के बीच किसी व्यक्तिगत दुश्मनी का कोई साक्ष्य नहीं था।
अपीलकर्ताओं ने LIC के 15 अक्टूबर 2007 के सर्कुलर का भी हवाला दिया।
LIC ने हत्या को दुर्घटना मानने से इनकार किया
LIC की ओर से एडवोकेट संदीप भारद्वाज ने जिला आयोग के फैसले का समर्थन किया।
उन्होंने ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘दुर्घटना’ शब्द के अर्थ का हवाला देते हुए कहा कि आतंक फैलाने के उद्देश्य से पहले से योजना बनाकर की गई हत्या को अप्रत्याशित घटना नहीं माना जा सकता।
LIC ने DSP की रिपोर्ट का उल्लेख किया, जिसमें दर्ज था कि सुखा गिल लम्मे ने अपने एक सहयोगी के साथ मिलकर हत्या की जिम्मेदारी ली थी।
बीमा कंपनी का कहना था कि जब हत्या सुनियोजित थी, तो उसे दुर्घटनात्मक मृत्यु मानकर अतिरिक्त बीमा लाभ नहीं दिया जा सकता।
हत्या की मंशा और दुर्घटनात्मक मृत्यु का सवाल अलग-अलग: आयोग
राज्य उपभोक्ता आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के रीता देवी और राष्ट्रीय आयोग के पृथ्वी राज भंडारी मामलों में निर्धारित कानूनी सिद्धांतों से सहमति जताई। हालांकि, आयोग ने कहा कि वे फैसले वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होते।
आयोग ने पाया कि FIR और DSP की क्लोजर रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि तजिंदर सिंह की हत्या गैंगस्टरों की आपराधिक गतिविधियों के तहत की गई थी।
LIC ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी जिससे मृतक की इस घटना में किसी तरह की संलिप्तता साबित होती हो।
बीमा कंपनी ने आरोपी की एक सोशल मीडिया पोस्ट का भी हवाला दिया था, जिसमें मृतक के साथ विवाद होने का दावा किया गया था।
लेकिन आयोग ने पाया कि न तो FIR और न ही DSP की रिपोर्ट में इस कथित विवाद की पुष्टि हुई थी। आयोग ने कहा कि बिना प्रमाणित किए सोशल मीडिया पोस्ट का कोई साक्ष्यात्मक महत्व नहीं है।
आयोग ने टिप्पणी की,
“हमलावरों की हत्या करने की मंशा और यह प्रश्न कि उसके परिणामस्वरूप हुई मृत्यु बीमा पॉलिसियों के तहत दुर्घटनात्मक मृत्यु की परिभाषा में आती है या नहीं, दो अलग-अलग विषय हैं।”
आयोग ने आगे कहा,
“केवल इसलिए कि मृत्यु पहले से योजनाबद्ध आपराधिक कृत्य के कारण हुई थी, यह स्वतः निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पॉलिसियों के तहत दावा भुगतान योग्य नहीं है, विशेष रूप से तब जब कोई नियम और शर्तें प्रस्तुत नहीं की गई हों।”
डबल एक्सीडेंट बेनिफिट रोकने के लिए LIC ने अत्यधिक तकनीकी रवैया अपनाया
आयोग ने पाया कि मृतक की बीमा पॉलिसियों में डबल एक्सीडेंट बेनिफिट शामिल था और उसके लिए बीमा सुरक्षा उपलब्ध थी।
इसके बावजूद LIC ने दावा खारिज करने के लिए अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाया।
आयोग ने कहा,
“ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिवादियों/विपक्षी पक्षों ने डबल एक्सीडेंट बेनिफिट देने से इनकार करने के लिए अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाया है, जबकि मृतक बीमाधारक को पॉलिसी के तहत यह लाभ विधिवत प्राप्त था और यह पॉलिसी की शर्तों का हिस्सा था।”
आयोग ने LIC के 15 अक्टूबर 2007 के सर्कुलर की धारा 6 का भी उल्लेख किया।
इस प्रावधान के अनुसार, यदि पुलिस रिपोर्ट और चार्जशीट में ऐसा कोई संदेह नहीं है कि हत्या मृतक के स्वयं के उकसावे के कारण हुई थी या दावा करने वाले व्यक्ति की उसमें कोई भूमिका थी, तो दुर्घटना लाभ का दावा रोका नहीं जाना चाहिए।
आयोग ने अपीलकर्ताओं द्वारा उद्धृत राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के रॉयल सुंदरम एलायंस इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम पवन बलराम मूलचंदानी फैसले का भी उल्लेख किया।
बीमा पॉलिसी की अपवाद संबंधी शर्त साबित किए बिना दावा खारिज करना सेवा में कमी
राज्य आयोग ने कहा कि LIC यह साबित नहीं कर सकी कि मृतक की हत्या जिन परिस्थितियों में हुई थी, वे बीमा पॉलिसियों के कवरेज से बाहर थीं।
बीमा कंपनी ने ऐसी कोई पॉलिसी शर्त या अपवाद संबंधी प्रावधान भी रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया था, जिसके आधार पर डबल एक्सीडेंट बेनिफिट देने से इनकार किया जा सकता।
आयोग ने स्पष्ट किया,
“यह स्थापित किए बिना कि मृत्यु की परिस्थितियां पॉलिसियों के कवरेज से बाहर थीं, और इस संबंध में कोई नियम, शर्त या अपवाद संबंधी प्रावधान रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किए बिना दावा खारिज करना सेवा में कमी है।”
LIC को चारों पॉलिसियों के तहत डबल एक्सीडेंट बेनिफिट देने का आदेश
इन निष्कर्षों के आधार पर पंजाब राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने मोगा जिला आयोग का 29 नवंबर 2022 का आदेश रद्द कर दिया और अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली।
आयोग ने LIC को निर्देश दिया कि वह मृतक की चारों बीमा पॉलिसियों के तहत डबल एक्सीडेंट बेनिफिट का भुगतान करे।
इस राशि पर 30 अप्रैल 2021 से वास्तविक भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। यह राशि सभी अपीलकर्ताओं को बराबर हिस्सों में दी जाएगी।
इसके अतिरिक्त, आयोग ने मुआवजे और मुकदमे के खर्च के लिए कुल 50,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया।
LIC को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 60 दिनों के भीतर भुगतान करना होगा।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: रिपनदीप कौर कम्बो एवं अन्य बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम एवं अन्य
केस नंबर: प्रथम अपील संख्या 58/2023
बेंच: एच.पी.एस. महल (पीठासीन न्यायिक सदस्य) और किरण सिब्बल (सदस्य)
फैसले की तारीख: 13 अक्टूबर 2026
