दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा को शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का बॉन्ड भरने संबंधी पुलिस नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद 23 अक्टूबर को शाम 6 बजे फैसला सुनाएंगे।
गुरुवार को हाईकोर्ट ने करीब तीन घंटे तक बोरा की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन और दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा की दलीलें सुनीं।
बोरा ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 के तहत जारी नोटिस को रद्द करने और पुलिस को उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न करने का निर्देश देने की मांग की है।
दिल्ली पुलिस ने नोटिस का बचाव किया
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने याचिका की सुनवाई योग्य होने पर सवाल उठाया। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने दलील दी कि नोटिस जारी करते समय विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पर्याप्त सामग्री मौजूद थी और उन्होंने सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद ही कार्रवाई की थी।
वहीं, नेहा बोरा की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने बिना तथ्यों पर विचार किए यांत्रिक तरीके से नोटिस जारी कर दिया।
उन्होंने नोटिस में लगाए गए इस आरोप पर भी आपत्ति जताई कि बोरा ने बिना अनुमति राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। शंकरनारायणन ने कहा कि नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं है।
16 अक्टूबर को हिरासत में लिए जाने के बाद जारी हुआ नोटिस
यह मामला 16 अक्टूबर को नेहा बोरा को एहतियातन हिरासत में लिए जाने से जुड़ा है। वह कॉकरोच जनता पार्टी के ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने जा रही थीं, तभी उन्हें हिरासत में ले लिया गया। अगले दिन 17 अक्टूबर को उन्हें रिहा कर दिया गया।
इसके बाद पुलिस ने 17 अक्टूबर को नोटिस जारी कर उन्हें 19 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने और यह बताने को कहा कि जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने के लिए उनसे ₹10,000 का निजी बॉन्ड और एक जमानतदार क्यों न लिया जाए।
BNSS की धारा 126 के तहत विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड मांग सकता है, यदि उसके पास विश्वसनीय जानकारी हो कि संबंधित व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा डाल सकता है या ऐसा कोई कार्य कर सकता है जिससे अशांति फैलने की आशंका हो।
बोरा के खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में नारेबाजी की, BNSS की धारा 163 के तहत लागू प्रतिबंधों के बावजूद जंतर-मंतर के आसपास बार-बार प्रदर्शन किया और लोगों को कनॉट प्लेस में आयोजित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया।
नेहा बोरा ने पुलिस के आरोपों को गलत बताया
एडवोकेट अभिक चिमनी द्वारा तैयार की गई याचिका में बोरा ने कहा कि पुलिस का नोटिस अस्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से गलत है। इसमें ऐसी कोई ठोस सामग्री नहीं दी गई है जिससे यह साबित हो कि उनके कारण शांति भंग होने की आशंका थी।
याचिका में कहा गया कि नोटिस में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि किस अवधि, अवसर या घटना के दौरान शांति भंग होने की आशंका जताई जा रही है।
बोरा ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के लिए पुलिस ने निवारक शक्तियों का दुरुपयोग किया है। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) और 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन बताया।
चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रहीं बोरा ने पुलिस के इस आरोप को भी चुनौती दी कि उन्होंने 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में प्रदर्शन के लिए लोगों को उकसाया था।
याचिका के अनुसार, उन्होंने उस दिन शाम 5 बजे मंडी हाउस में शांतिपूर्ण सभा का आह्वान किया था और उन्हें वहीं से हिरासत में लिया गया था।
याचिका में BNSS की धारा 163 के तहत लागू प्रतिबंधात्मक आदेशों के उल्लंघन के आरोप पर भी सवाल उठाया गया है। बोरा ने कहा कि नोटिस में किसी विशेष आदेश या उसके उल्लंघन की घटना का उल्लेख नहीं है।
उनके अनुसार, रिकॉर्ड पर मौजूद 23 अगस्त 2026 का एकमात्र प्रतिबंधात्मक आदेश मंडी हाउस पर लागू नहीं होता और उसमें जंतर-मंतर रोड को प्रतिबंधों से छूट दी गई है।
अब दिल्ली हाईकोर्ट 23 अक्टूबर को यह तय करेगा कि नेहा बोरा को शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने संबंधी जारी नोटिस और उसके आधार पर शुरू की गई कार्यवाही को चुनौती देने वाली याचिका पर क्या आदेश दिया जाए।
