हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जब एक बार तलाक की डिक्री के जरिए वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाते हैं, तो उसके बाद स्त्रीधन को अपने पास रोके रखना ‘निरंतर अपराध’ (कंटीन्यूइंग ऑफेंस) की श्रेणी में नहीं माना जा सकता। ऐसे में स्त्रीधन की वापसी के लिए कोई भी आपराधिक शिकायत दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 468 के तहत निर्धारित तीन साल की वैधानिक समयसीमा के भीतर ही दर्ज कराई जानी चाहिए। जस्टिस चिराग भानु सिंह की एकल पीठ ने CrPC की धारा 482 के तहत पूर्व पति द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ अमानत में खयानत और आपराधिक धमकी के आरोपों में चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि अलग रह रही पत्नी द्वारा तलाक की डिक्री पारित होने के लगभग पांच साल बाद दर्ज कराई गई शिकायत वैधानिक रूप से समय-बाधित (टाइम-बार्ड) थी।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षों का विवाह 7 फरवरी 2007 को हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न हुआ था। विवाह के शुरुआत से ही दहेज को लेकर विवाद पैदा हो गया, जिसके चलते पुलिस में शिकायतें दर्ज हुईं और पत्नी अपने मायके जाकर रहने लगी। दोनों पक्ष लगभग 2008 से अलग-अलग रह रहे थे।
इसके बाद, एक सक्षम न्यायालय ने 9 अक्टूबर 2012 को पति के पक्ष में क्रूरता और परित्याग के आधार पर एकतरफा तलाक की डिक्री पारित करते हुए विवाह विच्छेद कर दिया। विवाह टूटने से पहले और बाद में दोनों पक्षों के बीच भरण-पोषण को लेकर कई कानूनी विवाद चले। CrPC की धारा 125 के तहत शुरू हुई कार्यवाही हाईकोर्ट तक पहुंची, जहां 21 सितंबर 2016 को पत्नी को भरण-पोषण की हकदार नहीं माना गया। इसके अलावा, स्थाई गुजारा भत्ते के लिए पत्नी द्वारा दायर दीवानी मुकदमा भी फैमिली कोर्ट द्वारा 13 मई 2022 को खारिज कर दिया गया। भरण-पोषण से जुड़ी इनमें से किसी भी कार्यवाही के दौरान पत्नी ने अपने स्त्रीधन की वापसी की कोई मांग नहीं उठाई थी।
बाद में, पत्नी ने 19 जुलाई 2017 को शिमला के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (कोर्ट नंबर VII) के समक्ष CrPC की धारा 190 के तहत एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। इसमें पूर्व पति पर स्त्रीधन हड़पने और उसे रोके रखने के संबंध में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 (अमानत में खयानत) और धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत अपराध का आरोप लगाया गया। मजिस्ट्रेट ने 1 जून 2018 को पति को तलब किया और 3 सितंबर 2022 को उसके खिलाफ आरोप तय किए। इन कार्यवाहियों की वैधानिकता को चुनौती देते हुए पति ने शिकायत और संबंधित आदेशों को रद्द कराने के लिए CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता पति के वकील ने दलील दी कि यह आपराधिक शिकायत न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और दुर्भावनापूर्ण है। इसे 2012 के तलाक के फैसले सहित कई अहम तथ्यों को छिपाकर दाखिल किया गया है। यह तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता भले ही 2011 से स्त्रीधन वापस मांगने का दावा कर रही हो, लेकिन आपराधिक शिकायत 19 जुलाई 2017 को दर्ज कराई गई। चूंकि IPC की धारा 406 और 506 के तहत अधिकतम सजा तीन साल तक की हो सकती है, इसलिए CrPC की धारा 468 के तहत संज्ञान लेने की समयसीमा तीन वर्ष निर्धारित है, जिसके चलते यह शिकायत पूरी तरह से समय-बाधित हो चुकी थी। इस दलील के समर्थन में स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम तारा दत्त एवं अन्य (AIR 2000 SC 297) के फैसले का हवाला दिया गया।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि स्त्रीधन के दावे से जुड़ा अपराध एक निरंतर चलने वाला अपराध है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों कृष्णा भट्टाचार्जी बनाम सारथी चौधरी एवं अन्य (2016) 2 SCC 705 तथा कामाक्षी बनाम लक्ष्मी नारायणन (2022) पर भरोसा जताते हुए यह कहा गया कि जब तक संपत्ति पति के कब्जे में रहती है, तब तक पत्नी उस पर अपना दावा कर सकती है और ऐसे में समयसीमा का सवाल पैदा नहीं होता। इसके अलावा प्रतिभा रानी बनाम सूरज कुमार एवं अन्य (1985) 2 SCC 370 का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट को शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर ही आगे बढ़ना चाहिए और शुरुआती स्तर पर उनकी सत्यता की जांच नहीं करनी चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस चिराग भानु सिंह ने उल्लेख किया कि जहां अपराधों के लिए सजा एक से तीन वर्ष के बीच होती है, वहां CrPC की धारा 468 के तहत संज्ञान लेने के लिए तीन साल की परिसीमा अवधि तय की गई है, जिसकी गणना मुख्य अपराध के आधार पर की जाती है। अतः IPC की धारा 406 और 506 के तहत आने वाले अपराधों के लिए तीन वर्ष की समयसीमा लागू होती है।
सुप्रीम कोर्ट के कृष्णा भट्टाचार्जी फैसले का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने न्यायिक अलगाव (ज्यूडिशियल सेपरेशन) और तलाक की डिक्री के बीच के महत्वपूर्ण कानूनी अंतर को रेखांकित किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक अलगाव में वैवाहिक बंधन कानूनी रूप से बना रहता है, जबकि तलाक में पति-पत्नी का दर्जा पूरी तरह समाप्त हो जाता है:
“कृष्णा भट्टाचार्जी के मामले (उपरोक्त) में यह माना गया था कि यदि केवल न्यायिक अलगाव की डिक्री है, तो पति और पत्नी के बीच का संबंध बना रहता है और कानूनी रिश्ता इस प्रकार जारी रहता है मानो वह टूटा ही न हो। इस अर्थ में, ‘स्त्रीधन’ की मांग एक निरंतर चलने वाला अपराध बनी रहेगी। विवाह विच्छेद के बाद यह स्थिति समान नहीं रह सकती। यह अंतर भले ही सूक्ष्म हो, लेकिन यह पूरी तरह से स्पष्ट है, और पूर्वोक्त निर्णय में भी यही माना गया है। पति और पत्नी के बीच संबंध समाप्त हो जाने के बाद, धारा 498-ए और ‘स्त्रीधन’ की मांग से जुड़े अपराध अब ‘निरंतर अपराध’ के रूप में नहीं रह सकते।”
हाईकोर्ट ने माना कि दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक दर्जा 9 अक्टूबर 2012 को ही समाप्त हो चुका था:
“वर्तमान मामले में, निश्चित रूप से 09.10.2012 से दोनों पक्षों के बीच पति-पत्नी के रूप में संबंध समाप्त हो चुके थे। यदि प्रतिवादी/शिकायतकर्ता ‘स्त्रीधन’ का दावा करना भूल भी गई थी, चाहे वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत याचिका दायर करते समय हो या हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम की धारा 28 के तहत भरण-पोषण का वाद दायर करते समय, तो भी वह निर्धारित समयसीमा के भीतर यानी तीन साल के अंदर ऐसा कर सकती थी। यदि विवाह समाप्त नहीं हुआ होता और उनका संबंध अलग रहने के बावजूद जारी रहता, तो ‘स्त्रीधन’ को रोके रखने के अपराध को एक निरंतर चलने वाला अपराध कहा जा सकता था।”
समयसीमा के पहलू पर निष्कर्ष निकालते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“ऊपर चर्चा की गई समग्र परिस्थितियों को देखते हुए, यह सुरक्षित रूप से माना जा सकता है कि वर्तमान मामले की तथ्यात्मक परिस्थितियों में इस अपराध को निरंतर अपराध नहीं कहा जा सकता। प्रतिवादी/शिकायतकर्ता ‘स्त्रीधन’ पर अपना दावा अधिक से अधिक तलाक की डिक्री के तीन साल के भीतर, यानी 09.10.2012 से तीन साल के भीतर कर सकती थी। शिकायत उसके काफी समय बाद दर्ज की गई थी, इसलिए यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 468 द्वारा निर्धारित समयसीमा से बाधित थी।”
कोर्ट का निर्णय
तलाक की डिक्री की तारीख से तीन साल की वैधानिक समयसीमा बीत जाने के काफी समय बाद शिकायत दर्ज किए जाने के आधार पर, हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 482 के तहत दायर याचिका को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने शिमला स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (कोर्ट नंबर VII) की अदालत में लंबित केस संख्या 1/2017, 1 जून 2018 के समन आदेश, 3 सितंबर 2022 के आरोप नोटिस और उससे जुड़ी तमाम कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: तोता राम बनाम कंचन लता एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल एमएमओ संख्या 901/2022
पीठ: जस्टिस चिराग भानु सिंह
निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर 2026
