बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सक्षम अदालत द्वारा संज्ञान लिए बिना और वैध रिमांड वारंट जारी किए बिना किसी भी आरोपी को हिरासत में रखना पूरी तरह गैरकानूनी है। जस्टिस सारंग वी. कोतवाल और जस्टिस रणजीतसिंह राजा भोंसले की खंडपीठ ने कहा कि आरोपों की गंभीरता चाहे जितनी भी हो, कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया और वैधानिक सुरक्षा उपायों की अनदेखी नहीं की जा सकती। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी मामले में आरोपी दो व्यक्तियों को रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की आर्थिक अपराध शाखा (मुंबई) द्वारा 8 अगस्त 2025 को दर्ज की गई एक प्राथमिकी से जुड़ा है। इसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) और दूरसंचार अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए थे।
अभियोजन के अनुसार, आरोपी नासिक के इगतपुरी स्थित रेन फॉरेस्ट रिसॉर्ट से एक अवैध कॉल सेंटर चला रहे थे। आरोपी अमेजन सपोर्ट सर्विसेज के नाम से अमेरिकी और कनाडाई नागरिकों को वॉयस मेल भेजते थे। कॉल आने पर वे पीड़ितों को विश्वास में लेकर उनकी वित्तीय जानकारी हासिल करते थे और क्रिप्टोकरेंसी व गिफ्ट कार्ड के जरिए ठगी की रकम ऐंठते थे।
सीबीआई ने 9 अगस्त 2025 को छापेमारी कर समीर सिरोहा (आरोपी संख्या 3) और शैबाज कैसर अतीक शेख (आरोपी संख्या 5) सहित अन्य लोगों को गिरफ्तार किया। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (जेएमएफसी), इगतपुरी से ट्रांजिट रिमांड मिलने के बाद उन्हें पुणे की विशेष सीबीआई अदालत में पेश किया गया, जिसने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
सीबीआई ने 3 नवंबर 2025 को विशेष अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया, लेकिन इसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं शामिल नहीं थीं और न ही किसी लोक सेवक पर आरोप था। इस पर विशेष न्यायाधीश ने 12 फरवरी 2026 को माना कि चूंकि आरोप पत्र में पीसी एक्ट के तहत कोई अपराध नहीं बनता, इसलिए उनकी अदालत संज्ञान लेने के लिए अधिकृत नहीं है। इसके बाद अदालत ने बीएनएसएस की धारा 361 के तहत संज्ञान लेने और मुकदमे के लिए मामला जेएमएफसी, इगतपुरी को स्थानांतरित कर दिया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील मिलान देसाई ने तर्क दिया कि आरोप पत्र दाखिल होने के बाद किसी भी अदालत ने मामले पर संज्ञान नहीं लिया, इसलिए आरोपियों की लगातार हिरासत अवैध है। उन्होंने सीबीआई बनाम जितेंद्र कुमार सिंह मामले का हवाला देते हुए कहा कि पीसी एक्ट के तहत अपराध का होना विशेष अदालत के अधिकार क्षेत्र के लिए अनिवार्य शर्त है। उन्होंने यह भी दलील दी कि मामला स्थानांतरित होने के बाद जेएमएफसी, इगतपुरी ने न तो बीएनएसएस की धारा 232 या 346 के तहत संज्ञान लिया और न ही कोई वैध रिमांड वारंट जारी किया।
दूसरी ओर, सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह और विशेष लोक अभियोजक कुलदीप पाटिल ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध में शामिल हैं और निचली अदालतें उनकी जमानत अर्जियां खारिज कर चुकी हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एस. के. सिन्हा बनाम वीडियोकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड और कल्लू नट बनाम उत्तर प्रदेश राज्य जैसे फैसलों का हवाला देकर तर्क दिया कि संज्ञान लेने के लिए किसी औपचारिक आदेश की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने कहा कि जब मजिस्ट्रेट ने जांच एजेंसी को आरोपियों से पूछताछ और बीएनएसएस की धारा 193(9) के तहत आगे की जांच की अनुमति दी, तो यह स्वतः संज्ञान लेने के समान था। साथ ही, गुजरात हाईकोर्ट के विनोदभाई तिलकधारी तिवारी बनाम गुजरात राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि आरोपी पहले से हिरासत में है, तो बार-बार औपचारिक रिमांड आदेश की जरूरत नहीं होती।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने सीबीआई की प्रारंभिक आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि बिना अधिकार क्षेत्र और बिना आदेश के हिरासत में रखना सीधे तौर पर स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
पीसी एक्ट की धारा 3 और 4 की व्याख्या करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि जब आरोप पत्र में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम का कोई अपराध ही नहीं था, तो विशेष अदालत के पास संज्ञान लेने का कोई अधिकार नहीं था:
“पीसी एक्ट के तहत किसी अपराध से जुड़े मामले की सुनवाई करते समय, विद्वान विशेष न्यायाधीश के पास उसी विचारण में किसी अन्य अपराध की सुनवाई का अधिकार होता है। हालांकि, जब पीसी एक्ट के तहत कोई अपराध ही नहीं था, तब पीसी एक्ट की धारा 3 के तहत नियुक्त विद्वान विशेष न्यायाधीश के पास मामले की सुनवाई करने या संज्ञान लेने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था। वर्तमान मामले में यह और भी स्पष्ट है क्योंकि कोई भी आरोपी लोक सेवक नहीं है और आरोप पत्र पीसी एक्ट के तहत किसी भी अपराध के लिए दाखिल नहीं किया गया है।”
जेएमएफसी, इगतपुरी के रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने न तो कानूनी रूप से अपना विवेक इस्तेमाल कर संज्ञान लिया और न ही कोई रिमांड आदेश जारी किया:
“इस प्रकार, यह ऐसा मामला नहीं है जहां रिमांड आदेश अमान्य हैं, बल्कि यह ऐसा मामला है जहां विद्वान मजिस्ट्रेट ने संज्ञान ही नहीं लिया और उसके बाद रिमांड आदेश पारित नहीं किए।”
अदालत ने सीबीआई के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि जांच या पूछताछ की अनुमति देना ‘संज्ञान लेना’ माना जाएगा। बीएनएसएस की धारा 346(2) का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:
“बीएनएसएस की धारा 346 की उपधारा (2) दो भागों में है। पहला भाग मुकदमे को स्थगित करने के संबंध में है और दूसरा महत्वपूर्ण भाग आरोपी को रिमांड पर भेजने के बारे में है। प्रयुक्त सटीक शब्द हैं ‘और यदि आरोपी हिरासत में है तो वारंट द्वारा उसे रिमांड पर भेज सकती है’। वर्तमान मामले में, हमारे समक्ष ऐसा कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो कि विद्वान मजिस्ट्रेट ने वारंट जारी करके आरोपियों को रिमांड पर भेजा था। यहां तक कि जेल अधीक्षक को भी आरोपियों को हिरासत में रखने के निर्देश जारी नहीं किए गए। याचिकाकर्ताओं की हिरासत विद्वान मजिस्ट्रेट के किसी भी प्राधिकार के बिना है, क्योंकि उन्होंने न तो संज्ञान लिया और न ही बाद के रिमांड आदेश पारित किए।”
गुजरात हाईकोर्ट के विनोदभाई तिवारी फैसले पर अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही हिरासत में मौजूद व्यक्ति के लिए 15 दिनों की समय सीमा की बाध्यता न हो, लेकिन अदालत के लिए वारंट जारी करके रिमांड देना अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया है।
हाईकोर्ट का निर्णय
प्रक्रियात्मक नियमों का पूरी तरह उल्लंघन पाते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“उपर्युक्त चर्चा के परिणामस्वरूप, हम पाते हैं कि जेल में याचिकाकर्ताओं की हिरासत किसी सक्षम अदालत के प्राधिकार के बिना है और इसलिए, उनकी हिरासत गैरकानूनी है। नतीजतन, उन्हें अपनी हिरासत से रिहा करना होगा।”
हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों की निरंतर हिरासत को अवैध घोषित करते हुए उन्हें एक-एक लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने उन पर पासपोर्ट जमा करने और हर शनिवार सीबीआई कार्यालय में हाजिरी लगाने जैसी शर्तें लगाईं। इसके साथ ही पीठ ने स्पष्ट किया कि सीबीआई कानून द्वारा स्थापित उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए याचिकाकर्ताओं को दोबारा गिरफ्तार करने के लिए स्वतंत्र है।
अंत में अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यदि संज्ञान लेने वाली अदालत के समक्ष पहले से हिरासत में मौजूद आरोपी को आगे हिरासत में रखने का कोई रिमांड आदेश नहीं है, तो यह अभियोजकों, जांच एजेंसियों और जेल अधीक्षकों का कर्तव्य है कि वे इस कानूनी चूक की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित करें।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: शैबाज कैसर अतीक शेख एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिट पिटीशन संख्या 1100/2026
पीठ: जस्टिस सारंग वी. कोतवाल एवं जस्टिस रणजीतसिंह राजा भोंसले
निर्णय की तिथि: 21 अक्टूबर 2026
