दिल्ली हाईकोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए अपने पहले के फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया था कि किसी कर्मचारी के रिटायर होने मात्र से बैंक को उसके लोन खाते समय से पहले बंद करने का अधिकार नहीं मिल जाता, जब तक संबंधित लोन की शर्तों में इसकी अनुमति न हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में बैंक को सेवानिवृत्त अधिकारी के लोन खातों को निर्धारित अवधि से पहले बंद करने का अधिकार नहीं था।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस तेजस कारिया की डिवीजन बेंच ने 16 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि बैंक की पुनर्विचार याचिका में ऐसी कोई स्पष्ट कानूनी या तथ्यात्मक गलती नहीं बताई गई है, जिसके आधार पर पहले के आदेश की दोबारा समीक्षा की जाए।
कोर्ट ने पाया कि बैंक उन मुद्दों पर फिर से बहस करना चाहता है, जिन पर पहले ही विचार किया जा चुका है।
रिटायरमेंट के बाद पीएफ और ग्रेच्युटी से वसूली का विवाद
यह मामला स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सेवानिवृत्त अधिकारी सुरेश पुरी से संबंधित है।
नौकरी के दौरान उन्होंने बैंक से तीन अलग-अलग लोन लिए थे। इनमें ₹2.5 लाख का वाहन लोन, ₹7.5 लाख का एजुकेशन लोन और ₹20 लाख का हाउसिंग लोन शामिल था।
एजुकेशन और हाउसिंग लोन की सुरक्षा के लिए उनके प्रोविडेंट फंड (PF) पर बैंक का लियन (राशि पर दावा बनाए रखने का अधिकार) था।
इसी बीच बैंक ने 11 सितंबर 2015 को अधिकारी के खिलाफ बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित रहने और हाउसिंग लोन से संबंधित कथित अनियमितताओं को लेकर विभागीय कार्यवाही शुरू की।
16 मार्च 2017 को अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर (ऑफिसर्स) सर्विस रेगुलेशंस, 1979 के रेगुलेशन 67(a) के तहत उन्हें निंदा (Censure) की सजा दी।
इसके साथ ही निर्देश दिया गया कि अधिकारी रिटायरमेंट तक हाउसिंग लोन का भुगतान करते रहें और शेष राशि का समायोजन उनके रिटायरमेंट पर मिलने वाले लाभों से किया जाए।
बैंक ने 30 जून 2017 को एजुकेशन लोन खाते को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित कर दिया। उस समय इस खाते में ₹9.05 लाख बकाया थे।
अधिकारी 30 नवंबर 2017 को रिटायर हुए।
इसके बाद 22 दिसंबर 2017 को उनकी पीएफ राशि ओवरड्राफ्ट खाते में और 1 जनवरी 2018 को ग्रेच्युटी की राशि पेंशन खाते में जमा हुई।
बैंक ने इन रिटायरमेंट लाभों की रकम का समायोजन करते हुए 15 फरवरी 2018 को एजुकेशन लोन खाता और 23 फरवरी 2018 को हाउसिंग तथा वाहन लोन खाते बंद कर दिए।
सिंगल जज ने बैंक की कार्रवाई को गलत ठहराया था
सेवानिवृत्त अधिकारी ने बैंक द्वारा पीएफ और ग्रेच्युटी की रकम से लोन वसूलने की कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
5 जनवरी 2023 को हाईकोर्ट के सिंगल जज ने बैंक की कार्रवाई को कानूनी रूप से अनुचित माना।
कोर्ट ने कहा कि बैंक लोन की निर्धारित अवधि समाप्त होने तक पीएफ की राशि पर अपना लियन बनाए रख सकता था। इसके बजाय लोन खातों को समय से पहले बंद करने के लिए रिटायरमेंट लाभों की रकम का इस्तेमाल करना उचित नहीं था।
बैंक ने इस आदेश के खिलाफ अपील की, लेकिन डिवीजन बेंच ने 23 जुलाई 2026 को अपील खारिज कर दी।
इसके बाद बैंक ने आदेश के पुनर्विचार के लिए याचिका दाखिल की।
बैंक ने कहा: लोन समझौते में रिटायरमेंट पर वसूली का प्रावधान था
एसबीआई की ओर से स्थायी अधिवक्ता राजीव कपूर के साथ एडवोकेट अक्षित कपूर और एडवोकेट रिया सूद पेश हुए।
बैंक ने दलील दी कि पहले के आदेश में हाउसिंग लोन समझौते की कई महत्वपूर्ण शर्तों पर विचार नहीं किया गया।
बैंक के अनुसार, समझौते की शर्त संख्या 3(c), 3(f), 3(h) और 3(j) के तहत कर्मचारी के रिटायर होने पर तत्काल लोन चुकाने और पीएफ, ग्रेच्युटी तथा बैंक खातों में उपलब्ध रकम से बकाया समायोजित करने का अधिकार दिया गया था।
बैंक ने एजुकेशन लोन समझौते की शर्त संख्या 9(a), स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर एम्प्लॉइज पेंशन रेगुलेशंस, 1995 के रेगुलेशन 49 और भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 171 का भी हवाला दिया।
बैंक ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी, ओएनजीसी लिमिटेड बनाम वी.यू. वारियर और महानदी कोल फील्ड्स लिमिटेड बनाम रवींद्रनाथ चौबे मामलों के फैसलों का उल्लेख किया।
सेवानिवृत्त अधिकारी ने पुनर्विचार याचिका का विरोध किया
सुरेश पुरी की ओर से एडवोकेट माधवी खरे और एडवोकेट अपूर्वा भूमेश ने बैंक की पुनर्विचार याचिका का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि बैंक उन्हीं मुद्दों पर दोबारा बहस करना चाहता है, जिन पर पहले ही सुनवाई हो चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट के कमलेश वर्मा बनाम मायावती और सुनील गुप्ता बनाम पंजाब नेशनल बैंक के फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने दलील दी कि पुनर्विचार की अनुमति केवल तभी दी जा सकती है, जब आदेश में कोई स्पष्ट गलती हो।
उन्होंने यह भी कहा कि पेंशन रेगुलेशंस का रेगुलेशन 49 केवल पेंशन के कम्यूटेड मूल्य से वसूली की अनुमति देता है। इसके आधार पर पीएफ या ग्रेच्युटी की राशि से वसूली नहीं की जा सकती।
एजुकेशन लोन के संबंध में उन्होंने दलील दी कि बैंक ने खाते को गलत तरीके से एनपीए घोषित किया था, क्योंकि अधिकारी की बेटी पोस्टग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही थी और उस दौरान लोन की अदायगी स्थगित थी।
पुनर्विचार के नाम पर मामले की दोबारा सुनवाई नहीं हो सकती: हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका की सीमाओं पर विचार करते हुए कहा कि किसी फैसले की समीक्षा केवल इसलिए नहीं की जा सकती कि कोई पक्ष उसके निष्कर्षों से असहमत है।
बेंच ने टिप्पणी की,
“यह स्थापित कानून है कि रिकॉर्ड में स्पष्ट गलती ऐसी होनी चाहिए, जो आदेश को मात्र देखने से ही सामने आ जाए।”
कोर्ट ने पाया कि पहले के आदेश में लोन समझौते की संबंधित शर्तों पर विचार किया गया था।
डिवीजन बेंच ने कहा,
“लोन सुविधाओं को नियंत्रित करने वाली शर्तें बैंक को केवल इस आधार पर लोन खाते समय से पहले बंद करने का अधिकार नहीं देती थीं कि संबंधित अधिकारी सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त कर चुका था।”
हाईकोर्ट ने एजुकेशन लोन समझौते की शर्त संख्या 9(a) पर भी विचार किया।
बेंच ने कहा कि सिंगल जज पहले ही यह निष्कर्ष दे चुके थे कि बैंक ने ओवरड्राफ्ट खाते से ₹9,68,027 की वसूली की थी, जबकि ऐसा करने की अनुमति देने वाला कोई समझौता, नियम या विनियमन मौजूद नहीं था।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि एजुकेशन लोन की निर्धारित अवधि वर्ष 2021 तक थी।
इसलिए बैंक द्वारा उससे पहले ही खाते से रकम वसूलने की कार्रवाई को उचित नहीं माना गया था।
बैंक की दलील पहले के आदेश को अधूरा पढ़ने पर आधारित
हाईकोर्ट ने बैंक के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि लोन समझौते की शर्तों पर विचार नहीं किया गया था।
बेंच ने कहा,
“लोन सुविधाओं से संबंधित अनुबंध की शर्तों पर विचार नहीं किए जाने की बैंक की दलील आदेश को अधूरा पढ़ने पर आधारित है।”
कोर्ट ने पेंशन रेगुलेशंस के रेगुलेशन 49 से संबंधित बैंक की दलील पर भी विचार किया।
हाईकोर्ट ने कहा,
“रेगुलेशन 49 पर विचार नहीं किए जाने की दलील केवल मामले के गुण-दोष के आधार पर दोबारा विचार कराने का प्रयास है। इससे रिकॉर्ड में कोई स्पष्ट गलती सामने नहीं आती।”
सुप्रीम कोर्ट के जिन फैसलों का हवाला दिया गया, वे इस मामले में लागू नहीं
हाईकोर्ट ने बैंक की ओर से उद्धृत सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी विचार किया।
बेंच ने पाया कि ओएनजीसी बनाम वी.यू. वारियर मामले की परिस्थितियां वर्तमान मामले से अलग थीं।
उस मामले में संबंधित नियम के तहत भुगतान से पहले ही रकम की वसूली की स्पष्ट अनुमति थी।
इसके विपरीत वर्तमान मामले में बैंक ने ऐसी रकम का समायोजन किया था, जो पहले ही सेवानिवृत्त अधिकारी के खातों में जमा हो चुकी थी।
इसी तरह महानदी कोल फील्ड्स बनाम रवींद्रनाथ चौबे का फैसला भी तथ्यों के आधार पर अलग पाया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही रिटायरमेंट से पहले ही समाप्त हो चुकी थी और अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने केवल निंदा की सजा दी थी।
इसलिए इन फैसलों के आधार पर बैंक को पुनर्विचार की राहत नहीं दी जा सकती।
बैंक का बकाया वसूलने का अधिकार बरकरार रहेगा
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला बैंक के बकाया रकम वसूलने के कानूनी अधिकार को समाप्त नहीं करता।
कोर्ट ने कहा कि पहले का आदेश केवल इस बात तक सीमित था कि बैंक ने रिटायरमेंट के बाद अधिकारी को मिलने वाली पीएफ और ग्रेच्युटी जैसी रकम का किस तरीके से समायोजन किया था।
यदि बैंक की कोई बकाया राशि है, तो वह कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपना सकता है।
पुनर्विचार याचिका खारिज
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस तेजस कारिया की डिवीजन बेंच ने पाया कि बैंक अपने पहले से प्रस्तुत तर्कों पर दोबारा विचार कराने का प्रयास कर रहा है।
कोर्ट ने कहा कि पुनर्विचार याचिका में रिकॉर्ड से स्पष्ट होने वाली ऐसी कोई गलती नहीं बताई गई है, जिसके आधार पर 23 जुलाई 2026 के आदेश में हस्तक्षेप किया जा सके।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने एसबीआई की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने किसी भी पक्ष पर मुकदमे का खर्च नहीं लगाया।
केस डिटेल्स
- केस टाइटल: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एवं अन्य बनाम सुरेश पुरी
- केस नंबर: पुनर्विचार याचिका संख्या 489/2026, एलपीए संख्या 217/2023 में
- बेंच: जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस तेजस कारिया
- फैसले की तारीख: 16 अक्टूबर 2026
