आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अदालत की अवमानना का मामला लंबित होने के बावजूद सरकार किसी न्यायिक आदेश के खिलाफ अपील सहित उपलब्ध कानूनी उपाय अपना सकती है। कोर्ट ने कहा कि अवमानना की कार्यवाही शुरू हो जाने मात्र से सरकार का अपील करने का अधिकार समाप्त नहीं होता। यदि देरी के पर्याप्त कारण मौजूद हैं, तो अपीलीय अदालत अपील दाखिल करने में हुई देरी को माफ कर सकती है।
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर की डिवीजन बेंच ने तिरुपति में वैकल्पिक जमीन आवंटित करने के विवाद से जुड़ी आंध्र प्रदेश सरकार की दो रिट अपीलों को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।
हाईकोर्ट ने वर्ष 2022 में सिंगल जज द्वारा पारित आदेश और उसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही, मूल रिट याचिका को नए सिरे से सुनवाई के लिए बहाल कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद आंध्र प्रदेश के तिरुपति में टाउन क्लब जंक्शन से अलीपिरी तक सड़क चौड़ीकरण परियोजना से जुड़ा है।
टी. वैजयंतीमाला और टी. विश्वनाथमचेट्टी ने वर्ष 1994 में हाईकोर्ट में रिट याचिका संख्या 10304/1994 दाखिल की थी।
वर्ष 1995 में उनके वकील ने अदालत को बताया कि संबंधित अधिकारी वैकल्पिक आवास उपलब्ध करा रहे हैं। इसके बाद याचिका वापस ले ली गई और हाईकोर्ट ने उसे वापस लिए जाने के आधार पर खारिज कर दिया।
हालांकि, उस समय नई याचिका दाखिल करने की कोई अनुमति नहीं दी गई थी।
बाद में दोनों व्यक्तियों के निर्माण गिरा दिए गए। इसके बदले उन्हें क्रमशः ₹40,999 और ₹1,37,140 का मुआवजा दिया गया।
इसके बाद उन्होंने वर्ष 2010 में एक और रिट याचिका दाखिल की।
इस याचिका में हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 23 सितंबर 2009 को दिए गए उनके कानूनी नोटिस पर विचार करें। साथ ही, वर्ष 2001 में विस्थापित हुए सात अन्य व्यक्तियों के पक्ष में पारित आदेश को भी ध्यान में रखा जाए।
कलेक्टर ने वैकल्पिक जमीन देने की मांग खारिज की
जिला कलेक्टर ने 8 अप्रैल 2015 को दोनों व्यक्तियों की वैकल्पिक आवासीय भूखंड देने की मांग खारिज कर दी।
कलेक्टर ने पाया कि विवादित जमीन सरकारी थी और संबंधित व्यक्ति उस पर अतिक्रमण करके रह रहे थे।
कलेक्टर के अनुसार, दोनों व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर की श्रेणी में आते थे, जबकि जिन सात अन्य विस्थापित व्यक्तियों को आवासीय भूखंड दिए गए थे, वे गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों से संबंधित थे।
इसलिए कलेक्टर ने माना कि दोनों पक्षों की परिस्थितियां समान नहीं थीं।
हालांकि, 14 नवंबर 2022 को हाईकोर्ट के सिंगल जज ने कलेक्टर का आदेश रद्द कर दिया।
सिंगल जज ने अपने आदेश में कहा कि पंजीकृत बिक्री विलेख के आधार पर संबंधित व्यक्तियों का जमीन पर मालिकाना हक एक स्वीकार किया गया तथ्य है।
इसके बाद मामले पर दोबारा विचार करते हुए कलेक्टर ने 28 नवंबर 2023 को उनकी मांग फिर खारिज कर दी।
इस बार कलेक्टर ने यह भी पाया कि जिन आवासीय भूखंडों के पट्टों पर संबंधित व्यक्ति भरोसा कर रहे थे, वे वास्तव में मौजूद ही नहीं थे और फर्जी थे।
कलेक्टर के इस नए आदेश को चुनौती नहीं दी गई।
इसके बाद संबंधित व्यक्तियों ने अवमानना की कार्यवाही शुरू कर दी।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने सिंगल जज के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की। यह याचिका खारिज कर दी गई, लेकिन सरकार को रिट अपील दाखिल करने की स्वतंत्रता दी गई।
सरकार ने कहा, आदेश का पालन करने के बाद भी अवमानना की कार्यवाही जारी रखी गई
राज्य सरकार की ओर से विशेष सरकारी अधिवक्ता टी. विष्णु तेजा ने दलील दी कि सिंगल जज के आदेश का पालन किया जा चुका था।
उन्होंने बताया कि संबंधित अधिकारियों ने मामले पर दोबारा विचार करके कारणों सहित नया आदेश पारित किया था।
सरकार का कहना था कि इसके बावजूद संबंधित व्यक्तियों ने अवमानना की कार्यवाही जारी रखी। इसी कारण सरकार को अपील दाखिल करनी पड़ी।
राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया कि संबंधित व्यक्ति सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वाले थे, न कि सरकार द्वारा आवंटित जमीन के वैध पट्टाधारक।
इसलिए वे उन सात व्यक्तियों के समान लाभ का दावा नहीं कर सकते, जिन्हें पहले आवासीय भूखंड दिए गए थे।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता पुलिपति राधिका ने अपील का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने निर्धारित समयसीमा के बाद अपील दाखिल की है। इसलिए अपील सुनवाई योग्य नहीं है।
उन्होंने इसरार अहमद खान बनाम अमरनाथ प्रसाद मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अवमानना की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान अपील दाखिल करने में हुई देरी माफ नहीं की जानी चाहिए।
इसके अलावा सतीश वी.के. बनाम फेडरल बैंक लिमिटेड मामले के आधार पर कहा गया कि पुनर्विचार याचिका खारिज करने वाले आदेश के खिलाफ अपील नहीं की जा सकती।
अवमानना की कार्यवाही शुरू होने से अपील का रास्ता बंद नहीं होता
हाईकोर्ट ने माना कि सरकार को किसी आदेश के खिलाफ अपील करने के लिए अवमानना की कार्यवाही शुरू होने का इंतजार नहीं करना चाहिए।
हालांकि, बेंच ने स्पष्ट किया कि इस आधार पर सरकार को उपलब्ध कानूनी उपायों से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
“अवमानना का मामला दाखिल होने से सरकार अपील दाखिल करने सहित अन्य कानूनी उपाय अपनाने से वंचित नहीं हो जाती।”
बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि अपील दाखिल करने में देरी के पर्याप्त कारण मौजूद हैं, तो अवमानना की कार्यवाही शुरू हो जाने के बाद भी अपीलीय अदालत देरी माफ कर सकती है।
कोर्ट ने इसरार अहमद खान मामले पर विचार करते हुए कहा कि मौजूदा विवाद असाधारण परिस्थितियों की श्रेणी में आता है, क्योंकि इसमें सरकारी जमीन और सार्वजनिक हित का सवाल शामिल है।
सार्वजनिक हित की कीमत पर किसी व्यक्ति को लाभ नहीं मिल सकता
हाईकोर्ट ने अपील दाखिल करने में सरकारी देरी के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख किया।
इनमें जी. रामेगौड़ा, हरियाणा राज्य बनाम चंद्रमणि और अंतियूर टाउन पंचायत बनाम जी. अरुमुगम के फैसले शामिल थे।
बेंच ने कहा,
“यदि किसी व्यक्ति के पास अन्यथा कोई कानूनी अधिकार, हित या मालिकाना हक नहीं है, तो केवल सरकार द्वारा अपील दाखिल करने में हुई देरी के कारण उसे सार्वजनिक हित की कीमत पर लाभ प्राप्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में अपील दाखिल करने में हुई देरी पर विचार करते समय सार्वजनिक हित को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
पहले की याचिका बिना अनुमति वापस लेने का भी महत्व
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए पाया कि संबंधित व्यक्तियों ने वर्ष 1994 में दाखिल अपनी पहली रिट याचिका वर्ष 1995 में वापस ले ली थी।
उस समय उन्हें उसी विषय पर नई याचिका दाखिल करने की अनुमति नहीं दी गई थी।
बेंच ने सरगुजा ट्रांसपोर्ट सर्विस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करते हुए इस तथ्य का संज्ञान लिया।
कोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसी कोई सामग्री नहीं थी जिससे यह साबित हो कि अधिकारियों ने संबंधित व्यक्तियों को वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का कोई वचन दिया था।
इसके अतिरिक्त, जिला कलेक्टर ने संबंधित व्यक्तियों के दावे के खिलाफ जो निष्कर्ष दर्ज किए थे, उन्हें सिंगल जज ने पलटा नहीं था।
जमीन पर मालिकाना हक सरकार ने स्वीकार नहीं किया था
हाईकोर्ट ने सिंगल जज के उस निष्कर्ष पर भी विचार किया जिसमें संबंधित व्यक्तियों को जमीन का मालिक बताया गया था।
बेंच ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ने उनके पूर्ण मालिकाना हक को स्वीकार नहीं किया था।
कोर्ट ने कहा,
“राज्य सरकार की ओर से यह स्वीकार नहीं किया गया था कि याचिकाकर्ता जमीन के पूर्ण मालिक थे।”
हाईकोर्ट ने पाया कि सिंगल जज द्वारा मालिकाना हक को निर्विवाद तथ्य मानना रिकॉर्ड के अनुरूप नहीं था।
पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद भी रिट अपील सुनवाई योग्य
हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद अपील नहीं की जा सकती।
बेंच ने सतीश वी.के. बनाम फेडरल बैंक लिमिटेड मामले को मौजूदा विवाद से अलग बताया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिट अपीलों पर सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 47 नियम 7(1) के प्रावधान लागू नहीं होते।
इसके अलावा, राज्य सरकार ने केवल पुनर्विचार याचिका खारिज करने वाले आदेश को ही नहीं, बल्कि सिंगल जज के मूल आदेश को भी चुनौती दी थी।
इसलिए हाईकोर्ट ने अपीलों को सुनवाई योग्य माना।
दोनों रिट अपीलें मंजूर, मामले की नए सिरे से होगी सुनवाई
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से अपील दाखिल करने में हुई देरी माफ कर दी।
बेंच ने दोनों रिट अपीलों को स्वीकार करते हुए सिंगल जज के 14 नवंबर 2022 के आदेश और पुनर्विचार याचिका खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया।
इसके साथ ही रिट याचिका संख्या 15895/2015 को बहाल कर दिया गया, ताकि उस पर नए सिरे से सुनवाई हो सके।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मूल रिट याचिका में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
साथ ही, प्रतिवादियों को यह स्वतंत्रता दी कि वे जिला कलेक्टर के 28 नवंबर 2023 के आदेश को उचित कानूनी कार्यवाही में चुनौती दे सकते हैं।
कोर्ट ने किसी भी पक्ष पर मुकदमे का खर्च नहीं लगाया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य बनाम टी. वैजयंतीमाला एवं अन्य
केस नंबर: रिट अपील संख्या 1011 और 1064/2026
बेंच: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर
फैसले की तारीख: 10 अक्टूबर 2026
