कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास किए बिना वकालत करने वाले अधिवक्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कोई निजी व्यक्ति भी आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है। केवल इस आधार पर आपराधिक कार्यवाही को नहीं रोका जा सकता कि अधिवक्ताओं के पेशेवर कदाचार की जांच करने का अधिकार राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति के पास है।
जस्टिस एच.पी. संदेश ने करीब दस साल तक AIBE पास किए बिना वकालत करने वाले एक अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज निजी शिकायत रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए कर्नाटक राज्य बार काउंसिल को ऐसे अधिवक्ताओं की पहचान करने और उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश दिया।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता एम. प्रसन्न कुमार ने वर्ष 2011 में कर्नाटक राज्य बार काउंसिल में अपना नामांकन कराया था।
शिकायतकर्ता, जो बंगारपेट, केजीएफ और कोलार जिले की अदालतों में वकालत करता है, ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने AIBE पास किए बिना इन अदालतों में वकालत की।
शिकायतकर्ता ने अपने आरोप के समर्थन में राज्य बार काउंसिल द्वारा जारी एक पत्र का हवाला दिया, जिसमें बताया गया था कि याचिकाकर्ता का नाम AIBE पास करने वाले अधिवक्ताओं की सूची में शामिल नहीं था।
शिकायत मिलने पर बंगारपेट पुलिस ने केवल असंज्ञेय अपराध की रिपोर्ट दर्ज की।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 419, 420, 120B और 511 के साथ अधिवक्ता अधिनियम की धारा 45 के तहत निजी शिकायत दाखिल की।
मजिस्ट्रेट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत मामले को पुलिस जांच के लिए भेज दिया।
इस आदेश के खिलाफ दाखिल पुनरीक्षण याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने CrPC की धारा 482 के तहत कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता ने कहा, कार्रवाई का अधिकार केवल बार काउंसिल को
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता डी. प्रभाकर ने दलील दी कि शिकायत में लगाए गए आरोप अधिक से अधिक पेशेवर कदाचार का मामला बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 35 के तहत ऐसे मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति को है।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उसके नामांकन प्रमाणपत्र में यह उल्लेख नहीं था कि उसका नामांकन अस्थायी है। इसलिए वह इस विश्वास के साथ वकालत करता रहा कि उसे ऐसा करने का अधिकार है।
उसकी ओर से बताया गया कि उसने बाद में AIBE पास कर लिया था और बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने 30 मार्च 2021 को उसे प्रमाणपत्र जारी कर दिया था।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसका किसी को धोखा देने का इरादा नहीं था और मामले में आपराधिक मंशा का अभाव है।
दूसरी ओर, कर्नाटक राज्य बार काउंसिल की ओर से अधिवक्ता जी. नटराज ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अनिवार्य परीक्षा पास किए बिना करीब दस साल तक वकालत की।
उन्होंने तर्क दिया कि वर्ष 2021 में परीक्षा पास कर लेने से उससे पहले की गई वकालत को पिछली तारीख से वैध नहीं माना जा सकता। इससे संभावित आपराधिक जिम्मेदारी भी समाप्त नहीं होती।
बार काउंसिल ने कहा कि उसकी अनुशासनात्मक शक्तियां आपराधिक अदालतों के अधिकार क्षेत्र को समाप्त नहीं करतीं।
राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट सरकारी अधिवक्ता सुहास गौड़ा एम. ने कहा कि आरोप व्यापक रूप से धोखाधड़ी से जुड़े हैं और जांच एजेंसी को मामले की जांच करने का अधिकार है।
बार काउंसिल की अनुशासनात्मक कार्रवाई से आपराधिक कार्यवाही पर रोक नहीं: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने पाया कि मामले के महत्वपूर्ण तथ्यों को लेकर कोई विवाद नहीं था।
याचिकाकर्ता ने AIBE नियम, 2010 लागू होने के बाद वर्ष 2011 में नामांकन कराया था। इसके बावजूद उसने लगभग दस वर्षों तक परीक्षा नहीं दी और 2021 में परीक्षा पास करने तक वकालत जारी रखी।
कोर्ट ने पहले मजिस्ट्रेट के आदेश में प्रक्रियात्मक गलती का उल्लेख किया।
जस्टिस संदेश ने कहा, “CrPC की धारा 156(3) के तहत किसी मामले को जांच के लिए भेजते समय अपराध का संज्ञान नहीं लिया जा सकता।”
हालांकि, कोर्ट ने यह भी पाया कि अंततः मामले को पुलिस जांच के लिए ही भेजा गया था।
हाईकोर्ट ने ए.आर. अंतुले बनाम रामदास श्रीनिवास नायक मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब तक किसी कानून में इसके विपरीत प्रावधान न हो, कोई भी व्यक्ति आपराधिक कानून के तहत कार्यवाही शुरू करा सकता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ और बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम बॉनी फोई लॉ कॉलेज के फैसलों का भी उल्लेख किया। इसके अलावा मध्य प्रदेश, केरल और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसलों पर भी विचार किया गया।
जस्टिस संदेश ने कहा, “केवल किसी अनुशासनात्मक व्यवस्था का अस्तित्व अपने आप में सक्षम आपराधिक अदालत के उस आचरण की जांच करने के अधिकार को समाप्त नहीं करता, जो स्वतंत्र रूप से किसी आपराधिक अपराध के आवश्यक तत्वों को पूरा करता हो।”
इस प्रकार हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर किसी अधिवक्ता का आचरण आपराधिक अपराध की श्रेणी में आता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की जा सकती है, भले ही बार काउंसिल के पास अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अलग अधिकार मौजूद हो।
निजी व्यक्ति भी दर्ज करा सकता है आपराधिक शिकायत
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि शिकायतकर्ता को पहले राज्य बार काउंसिल के पास जाना चाहिए था।
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता को निजी आपराधिक शिकायत दाखिल करने का कानूनी अधिकार है।
इसके लिए पहले बार काउंसिल में शिकायत करना अनिवार्य नहीं है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस स्तर पर यह तय नहीं किया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ IPC की विभिन्न धाराओं और अधिवक्ता अधिनियम की धारा 45 के तहत अपराध वास्तव में बनता है या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि यह जांच अधिकारी को निर्धारित करना होगा कि मामले में लगाए गए आरोप संबंधित अपराधों के आवश्यक कानूनी तत्वों को पूरा करते हैं या नहीं।
बार काउंसिल का काम सिर्फ अधिवक्ताओं का नामांकन करना नहीं
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य बार काउंसिल की जिम्मेदारियों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
जस्टिस संदेश ने कहा, “कर्नाटक राज्य बार काउंसिल का कर्तव्य केवल अधिवक्ताओं का नामांकन करना नहीं है, बल्कि उसे ऐसे अधिवक्ताओं का रिकॉर्ड भी बनाए रखना चाहिए जो वकालत करने के पात्र हैं और जो पात्र नहीं हैं।”
कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल को यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी चाहिए कि अनिवार्य परीक्षा पास किए बिना कोई अधिवक्ता निर्धारित अवधि के बाद भी वकालत जारी न रख सके।
कर्नाटक राज्य बार काउंसिल को दिए महत्वपूर्ण निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य बार काउंसिल को अधिवक्ताओं की पात्रता की निगरानी के लिए निम्नलिखित कदम उठाने का निर्देश दिया:
- डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना: प्रत्येक अधिवक्ता के नामांकन की तारीख और दो वर्ष की निर्धारित अवधि समाप्त होने की तारीख का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाए।
- परीक्षा पास नहीं करने वालों की पहचान: उन अधिवक्ताओं की नियमित निगरानी की जाए जिन्होंने AIBE पास नहीं किया है। साथ ही, निलंबित अधिवक्ताओं की सूची तैयार की जाए।
- ऑटोमैटिक अलर्ट सिस्टम: नामांकन के बाद दो वर्ष की अवधि समाप्त होते ही स्वतः सूचना देने वाली व्यवस्था विकसित की जाए।
- AIBE परिणामों का सत्यापन: बार काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ मिलकर परीक्षा परिणामों का सत्यापन किया जाए और समय-समय पर रिकॉर्ड की समीक्षा की जाए।
- कार्रवाई से पहले सुनवाई का अवसर: रिकॉर्ड में किसी तरह की गड़बड़ी या विसंगति मिलने पर संबंधित अधिवक्ता को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।
45 दिनों में अनुपालन रिपोर्ट देने का निर्देश
कर्नाटक हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका खारिज करते हुए पुलिस को मामले की जांच आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी।
कोर्ट ने जांच एजेंसी को शीघ्र जांच पूरी कर अपनी रिपोर्ट ट्रायल कोर्ट के समक्ष दाखिल करने का निर्देश दिया।
इसके साथ ही कर्नाटक राज्य बार काउंसिल को आदेश दिया गया कि वह हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन कर 45 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट पेश करे।
मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: एम. प्रसन्न कुमार बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य
केस नंबर: आपराधिक याचिका संख्या 633/2020
बेंच: जस्टिस एच.पी. संदेश
फैसले की तारीख: 17 अक्टूबर 2026

