सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रिश्वत मांगने के आरोपी सरकारी कर्मचारी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि इस धारा के तहत किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सक्षम अधिकारी की मंजूरी लेने की शर्त रिश्वत मांगने जैसे आपराधिक कृत्य पर लागू नहीं होती।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल की अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। कांस्टेबल ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत अपने खिलाफ आरोप तय किए जाने को चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के 26 मार्च 2025 के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें हाईकोर्ट ने कांस्टेबल की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB), पाली की विशेष अदालत द्वारा तय किए गए आरोप को सही ठहराया था।
क्या है पूरा मामला?
अपीलकर्ता तेजाराम राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल था और सिरोही स्थित पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय में तैनात था।
तेजाराम के अनुसार, उसने शिकायतकर्ता कांस्टेबल देवेंद्र कुमार पर आरोप लगाया था कि मदुरै में जांच के लिए जाने के दौरान उसने कुछ आरोपियों से रिश्वत लेकर उन्हें भागने में मदद की थी।
तेजाराम का दावा था कि इसी शिकायत का बदला लेने के लिए देवेंद्र कुमार ने 22 अप्रैल 2021 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को ईमेल भेजकर उसके खिलाफ रिश्वत मांगने की शिकायत कर दी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि तेजाराम ने पुलिस अधीक्षक की ओर से ₹1.5 लाख की रिश्वत मांगी थी।
इस शिकायत के आधार पर 4 जून 2021 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7A और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120B के तहत एफआईआर संख्या 174/2021 दर्ज की गई।
इसके बाद 1 सितंबर 2021 को तेजाराम को गिरफ्तार कर लिया गया।
8 दिसंबर 2023 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत अभियोजन की मंजूरी दी गई और 19 जनवरी 2024 को चार्जशीट दाखिल की गई।
12 सितंबर 2024 को ट्रायल कोर्ट ने तेजाराम के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत आरोप तय किए।
इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन हाईकोर्ट ने 26 मार्च 2025 को उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
धारा 17A के तहत पूर्व मंजूरी को लेकर दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिमन्यु भंडारी ने दलील दी कि तेजाराम एक सरकारी कर्मचारी था। इसलिए उसके खिलाफ किसी भी तरह की जांच शुरू करने से पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत सक्षम अधिकारी की मंजूरी लेना अनिवार्य था।
उन्होंने कहा कि बिना पूर्व मंजूरी के शुरू की गई जांच में मौजूद इस कानूनी कमी को बाद में मंजूरी लेकर दूर नहीं किया जा सकता।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राजस्थान हाईकोर्ट ने नारा चंद्रबाबू नायडू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले पर भरोसा किया, लेकिन यशवंत सिन्हा बनाम सीबीआई मामले में दिए गए फैसले को नजरअंदाज कर दिया।
अपीलकर्ता ने यह भी बताया कि धारा 17A और धारा 19 प्रक्रियात्मक प्रावधान हैं या मूल अधिकारों से जुड़े प्रावधान, यह सवाल बी.एस. येदियुरप्पा बनाम ए. आलम पाशा मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है।
दूसरी ओर, राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता संसृति पाठक ने इन दलीलों का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि धारा 17A सरकारी कर्मचारियों को हर तरह के आपराधिक कृत्य से संरक्षण नहीं देती।
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि रिश्वत मांगना किसी सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्यों का हिस्सा नहीं हो सकता। इसे उसके द्वारा सरकारी पद पर रहते हुए की गई किसी सिफारिश या लिए गए निर्णय से भी नहीं जोड़ा जा सकता।
राज्य सरकार ने यह भी बताया कि अपीलकर्ता ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को कभी चुनौती नहीं दी थी।
रिश्वत मांगना पूरी तरह आपराधिक कृत्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 17A के दायरे की जांच करते हुए सीबीआई बनाम संतोष करनानी, सुरेंद्र धारीवाल बनाम राजस्थान राज्य और अनिल दायमा बनाम राजस्थान राज्य के फैसलों का उल्लेख किया।
बेंच ने कहा कि इस कानूनी सवाल पर अदालतों का रुख लगातार एक जैसा और स्पष्ट रहा है।
कोर्ट ने समझाया कि धारा 17A केवल उन्हीं मामलों में लागू होती है, जहां सरकारी कर्मचारी पर लगाया गया आरोप उसके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान की गई किसी सिफारिश या लिए गए निर्णय से जुड़ा हो।
बेंच ने स्पष्ट कहा, “इस धारा को हर तरह के मामले में लागू होने वाला प्रावधान नहीं माना जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिश्वत मांगने का आरोप सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कार्यों से संबंधित नहीं माना जा सकता।
बेंच ने अपने फैसले में कहा,
“रिश्वत मांगना पूरी तरह से एक आपराधिक कृत्य है। इसका आधिकारिक कर्तव्यों से कोई संबंध नहीं है और न ही इसका सरकारी कर्मचारी के रूप में अपीलकर्ता द्वारा की गई किसी सिफारिश या लिए गए निर्णय से कोई जुड़ाव है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल सरकारी कर्मचारी होने के आधार पर कोई व्यक्ति धारा 17A के तहत पूर्व मंजूरी की सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता।
इसके लिए जरूरी है कि संबंधित आरोप उसके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान की गई किसी सिफारिश या निर्णय से जुड़ा हो।
धारा 17A की वैधता का सवाल लंबित होने से मामले पर असर नहीं
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह भी दलील रखी गई कि सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन बनाम भारत संघ मामले में धारा 17A की संवैधानिक वैधता का सवाल बड़ी बेंच को भेजा गया है।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इसका मौजूदा मामले से कोई संबंध नहीं है।
बेंच ने स्पष्ट किया कि जब धारा 17A इस मामले में लागू ही नहीं होती, तब उसकी संवैधानिक वैधता से जुड़ा लंबित सवाल इस अपील के फैसले को प्रभावित नहीं कर सकता।
अभियोजन की मंजूरी में देरी से कार्यवाही अमान्य नहीं होगी
अपीलकर्ता ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत अभियोजन की मंजूरी देर से मिलने का मुद्दा भी उठाया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
बेंच ने कहा कि अभियोजन की मंजूरी में देरी महज एक प्रक्रियात्मक अनियमितता होगी और इसके आधार पर पूरी आपराधिक कार्यवाही को अमान्य नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया,
“मुकदमे की सुनवाई उसके गुण-दोष के आधार पर होगी, जहां दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें रख सकेंगे।”
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपों की सच्चाई और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच ट्रायल के दौरान ही की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि रिश्वत मांगने के आरोप से जुड़े इस मामले में धारा 17A के तहत पूर्व मंजूरी लेना आवश्यक नहीं था।
बेंच ने कहा कि “धारा 17A के तहत पूर्व मंजूरी नहीं लिए जाने से अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की वैधता किसी भी तरह प्रभावित नहीं हुई है।”
इस निष्कर्ष के साथ सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कांस्टेबल की अपील खारिज कर दी।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: तेजाराम बनाम राजस्थान राज्य
केस नंबर: आपराधिक अपील संख्या ___/2026 (एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 11709/2025 से उत्पन्न)
बेंच: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
फैसले की तारीख: 16 अक्टूबर 2026

