आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की एक खंडपीठ, जिसमें जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस अलापति गिरिधर शामिल हैं, ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा चार्जशीट दाखिल किए जाने से संवैधानिक अदालतों का अधिकार सीमित नहीं हो जाता और अदालतें मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप सकती हैं। विशेष रूप से तब, जब राज्य के पुलिस कर्मियों पर ही हिरासत में हिंसा, हिरासत में मौत और साक्ष्यों को नष्ट करने जैसे गंभीर आरोप हों। मृतक बंदी गाडे साई कृष्णा की मां द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका और अंतरिम आवेदन को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने सीबीआई को तुरंत नियमित आपराधिक मामला दर्ज कर जांच अपने हाथ में लेने का निर्देश दिया। इसके साथ ही पीठ ने पीड़ित की मां को अंतरिम मुआवजे के रूप में 25,00,000 रुपये का भुगतान करने और दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का भी आदेश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता गाडे विजया लक्ष्मी ने अपने 25 वर्षीय बेटे गाडे साई कृष्णा को जीवित या मृत अदालत में पेश करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में उन्होंने बताया कि उनके बेटे पर पूर्व में कई आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें से अधिकांश बरी, समझौते या निपटारे के साथ समाप्त हो चुके थे। कृष्णा लंका पुलिस थाने के कर्मियों के लगातार छापों और पूछताछ के कारण वह मारकापुरम में रहने लगा था।
9 मई 2026 को कृष्णा लंका पुलिस थाने के दो कांस्टेबल याचिकाकर्ता के घर पहुंचे, उन्हें हिरासत में लेकर थाने ले गए और उनका मोबाइल फोन जब्त कर लिया। वहां साई कृष्णा के ठिकाने के बारे में पूछताछ के दौरान पुलिसकर्मियों ने उनसे कहा कि उनका बेटा अब मरने वाला है। उनका मोबाइल फोन 15 दिनों तक पुलिस के पास रहा, जिसके कॉल लॉग और व्यक्तिगत डेटा का उपयोग उनके बेटे को ट्रैक करने के लिए किया गया। इसके बाद 13 मई 2026 को जब याचिकाकर्ता मारकापुरम पहुंचीं, तो स्थानीय लोगों से उन्हें पता चला कि पुलिस उनके बेटे को ले गई है और उसका सारा सामान भी जब्त कर लिया है। जब उन्होंने कृष्णा लंका पुलिस थाने में संपर्क किया, तो पुलिसकर्मियों और तत्कालीन थाना प्रभारी (एसएचओ) इंस्पेक्टर एस.एस.वी.वी. नागराजू ने विरोधाभासी जवाब दिए, जिससे उन्हें बेटे को गैरकानूनी रूप से छिपाकर रखने का गहरा संदेह हुआ।
मानवाधिकार आयोग और उच्चाधिकारियों को दी गई शिकायतों के बावजूद, न तो कोई गिरफ्तारी मेमो दिया गया, न कोई रिमांड रिपोर्ट पेश की गई और न ही बंदी को किसी अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। याचिका के लंबित रहने के दौरान उन्होंने 19 जून 2026 को औपचारिक शिकायत दर्ज कराई, जिस पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) की धारा 127(4), 127(6), 103(1) और 238 के तहत अपराध संख्या 107/2026 दर्ज किया गया। बाद में राज्य सरकार ने हिरासत में हुई इस मौत की जांच के लिए आईपीएस अधिकारी श्री एम. रवि प्रकाश के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री एन. अश्विनी कुमार ने दलील दी कि मामले के तथ्य अवैध हिरासत, प्रताड़ना, हत्या और शव को गायब करने की एक सुनियोजित साजिश को दर्शाते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायिक निगरानी में सीबीआई से स्वतंत्र जांच कराना बेहद जरूरी है, क्योंकि आरोपी पुलिस अधिकारी राज्य मशीनरी का हिस्सा हैं और उनका संस्थागत प्रभाव जांच को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य ने संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत दिए गए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन किया है, इसलिए पीड़ित मां लोक कानून (पब्लिक लॉ) के तहत मौद्रिक मुआवजे की हकदार हैं।
सीबीआई जांच की मांग का विरोध करते हुए विशेष सरकारी वकील सुश्री एस. प्रणति ने दलील दी कि यद्यपि सामग्री प्रथम दृष्टया पुलिस हिरासत में साई कृष्णा की मौत की ओर संकेत करती है, लेकिन राज्य सरकार ने तुरंत एसआईटी गठित कर निष्पक्ष कदम उठाए हैं। एसआईटी ने कई आरोपी पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया है और 19 सितंबर 2026 को द्वितीय अतिरिक्त सिविल जज (जूनियर डिवीजन) सह द्वितीय अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, विजयवाड़ा की अदालत में चार्जशीट भी दाखिल कर दी है। उन्होंने तर्क दिया कि जब चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, तो सीबीआई जांच की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि मुआवजे का दावा केवल सिविल अदालत के समक्ष निजी कानून (प्राइवेट लॉ) के माध्यम से ही किया जा सकता है।
एसआईटी की रिपोर्ट और निष्कर्ष
एसआईटी द्वारा प्रस्तुत स्टेटस रिपोर्ट का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि गाडे साई कृष्णा को 6 मई 2026 की रात लगभग 3:00 बजे मारकापुरम में दो गैर-जमानती वारंटों की तामील के लिए टास्क फोर्स की टीम ने पकड़ा था। उसे उसी दिन सुबह 7:00 बजे कृष्णा लंका पुलिस थाने लाकर संतरी को सौंपा गया और बाद में उसकी कस्टडी एसएचओ नागराजू (आरोपी संख्या 1) को दे दी गई।
अदालत ने रेखांकित किया कि गिरफ्तारी भले ही कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई थी, लेकिन बंदी को कानून द्वारा निर्धारित समय-सीमा के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया। जांच में सामने आया कि साई कृष्णा को हिरासत में बुरी तरह पीटा गया था। 8 मई 2026 को एक पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी (आरएमपी) ने उसके शरीर पर गंभीर चोटों और सूजन के निशान देखे थे। हिरासत में दी गई यातना के कारण ही उसकी मौत हो गई। अपराध पर पर्दा डालने के लिए आरोपी संख्या 1 से आरोपी संख्या 4 तक के लोगों ने शव को ठिकाने लगाया और 12-13 मई 2026 की दरमियानी रात स्वर्गपुरी श्मशान घाट पर उसे जलाकर राख कर दिया।
एसआईटी की जांच में साक्ष्यों से बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ का भी खुलासा हुआ:
- कृष्णा लंका पुलिस थाने के सीसीटीवी रिकॉर्डिंग वाले 8-टीबी के चार मूल हार्ड डिस्क (जिनमें घटना की अवधि और पिछले 18 महीनों का डेटा था) होमगार्ड कोनेटी वेंकट राजू (आरोपी संख्या 7) की मदद से हटा दिए गए और उनकी जगह अनाधिकृत ड्राइव लगा दिए गए।
- कमांड कंट्रोल सेंटर से जुड़े प्रवेश द्वार के दो सीसीटीवी कैमरों को हटा दिया गया।
- हेड कांस्टेबल पोतरलंका अशोक कुमार (आरोपी संख्या 2) ने दूसरी मंजिल के क्राइम रूम की दीवारों पर लगे खून जैसे सूखे धब्बों पर रंगाई कराने के लिए एक पेंटर को बुलाया।
- मृतक के मोबाइल फोन को 30 मई से 9 जून 2026 के बीच एक परिचित के जरिए गोवा भेजा गया और वहां चालू कराया गया, ताकि यह झूठा डिजिटल रिकॉर्ड बन सके कि वह जीवित है और फरार है।
- आरोपी संख्या 1 ने शुरुआती सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट को लिखित रूप से झूठी जानकारी दी कि बंदी के ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण
पीठ ने विचार के लिए तीन मुख्य बिंदु तय किए: क्या यह हिरासत में हिंसा और मौत का मामला है; क्या मामले में सीबीआई जांच आवश्यक है; और क्या अनुच्छेद 226 के तहत मुआवजा दिया जाना चाहिए।
पहले बिंदु पर अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह पूरी तरह सिद्ध करते हैं कि यह मामला पुलिस हिरासत में प्रताड़ना, मौत और शव को गायब करने का है। पुलिस द्वारा कानून हाथ में लेने पर गंभीर चिंता जताते हुए पीठ ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को दोहराया:
“लॉक-अप में प्रताड़ना और मौत सहित हिरासत में हिंसा, कानून के शासन पर सीधा प्रहार करती है। कानून का शासन यह मांग करता है कि कार्यपालिका की शक्तियां न केवल कानून से प्राप्त हों, बल्कि कानून द्वारा सीमित भी हों। हिरासत में हिंसा गहरी चिंता का विषय है। यह चिंता इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि यह कृत्य उन लोगों द्वारा किया जाता है जिन्हें नागरिकों का रक्षक माना जाता है। यह वर्दी और अधिकार की आड़ में पुलिस स्टेशन या लॉक-अप की चारदीवारी के भीतर किया जाता है, जहां पीड़ित पूरी तरह लाचार होता है। पुलिस और अन्य कानून-प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा दी जाने वाली यातना और दुर्व्यवहार से किसी व्यक्ति की रक्षा करना एक स्वतंत्र समाज के लिए अत्यंत संवेदनशील मामला है।”
पीठ ने मध्य प्रदेश राज्य बनाम श्यामसुंदर त्रिवेदी मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
“अदालतों को यह नहीं भूलना चाहिए कि पुलिस हिरासत में मौत सभ्य समाज में सबसे घृणित अपराधों में से एक है, जो कानून के शासन से चलने वाले समाज के लिए गंभीर खतरा है। हिरासत में दी जाने वाली यातना भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिकों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन और मानवीय गरिमा पर आघात है। पुलिस की ज्यादतियां और बंदियों/विचाराधीन कैदियों या संदिग्धों के साथ दुर्व्यवहार किसी भी सभ्य राष्ट्र की छवि को धूमिल करता है और खाकी वर्दी वालों को यह मानने के लिए उकसाता है कि वे कानून से ऊपर हैं और कभी-कभी वे खुद ही कानून बन बैठते हैं।”
चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद जांच सीबीआई को सौंपने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने रुबाबउद्दीन शेख बनाम गुजरात राज्य मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
“यद्यपि आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका था, लेकिन अपराध की प्रकृति को देखते हुए, जो कथित तौर पर किसी तीसरे पक्ष द्वारा नहीं बल्कि गुजरात राज्य के पुलिसकर्मियों द्वारा किया गया था, वर्तमान मामले में पूरी की गई जांच को संतोषजनक नहीं माना जा सकता… दूसरी ओर, यह सुनिश्चित करने के लिए कि न्याय न केवल किया जाए बल्कि होता हुआ भी दिखे, और राज्य पुलिस अधिकारियों, विशेषकर उच्च अधिकारियों की संलिप्तता को ध्यान में रखते हुए, हम इस स्तर पर भी सीबीआई को मामले की जांच करने का निर्देश देने के लिए विवश हैं।”
पीठ ने माना कि पश्चिम बंगाल राज्य बनाम कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स, पूजा पाल बनाम भारत संघ, विधान परिषद, उत्तर प्रदेश बनाम सुशील कुमार, खुरशीद अहमद चोहान बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश, और हंसुरा बाई बनाम मध्य प्रदेश राज्य जैसे मामलों से यह स्पष्ट है कि यद्यपि सीबीआई जांच के आदेश असाधारण परिस्थितियों में ही दिए जाने चाहिए, लेकिन जब स्थानीय पुलिस द्वारा साक्ष्यों से छेड़छाड़, संस्थागत पूर्वाग्रह और हिरासत में अपराध के गंभीर आरोप हों, तो न्यायिक प्रणाली में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए स्वतंत्र जांच एजेंसी को मामला सौंपना अनिवार्य हो जाता है।
अनुच्छेद 226 के तहत मुआवजे के विरोध पर अदालत ने सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता को सिविल मुकदमे में भेजा जाना चाहिए। नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य, सूबे सिंह बनाम हरियाणा राज्य, इन री-इनह्यूमन कंडीशंस इन 1382 प्रिजन्स, और आंध्र प्रदेश राज्य बनाम चाल्ला रामकृष्ण रेड्डी के ऐतिहासिक निर्णयों का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा:
“नागरिक का दावा पूर्ण दायित्व (स्ट्रिक्ट लायबिलिटी) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके विरुद्ध संप्रभु उन्मुक्ति (सोवरेन इम्युनिटी) का बचाव उपलब्ध नहीं है। नागरिक को राज्य से मुआवजा मिलना ही चाहिए, और राज्य को यह अधिकार होगा कि वह संबंधित गलत कार्य करने वाले से इसकी भरपाई करे। मुआवजे के निर्धारण में दंडात्मक नहीं, बल्कि क्षतिपूर्ति के तत्व पर जोर होना चाहिए। इसका उद्देश्य घावों पर मरहम लगाना है, न कि अपराधी को दंडित करना; क्योंकि अपराध के लिए उचित दंड देने का काम उन आपराधिक अदालतों पर छोड़ दिया जाना चाहिए जहां आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाया जाता है, जिसे कानूनन करना राज्य का कर्तव्य है।”
हाईकोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के श्याम सुंदर बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) मामले में लागू मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के ‘मल्टीप्लायर फॉर्मूले’ को अपनाने से इनकार कर दिया और कहा कि राज्य के अधिकारियों द्वारा अनुच्छेद 21 का जानबूझकर किया गया उल्लंघन किसी आकस्मिक सड़क दुर्घटना से बिल्कुल अलग होता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा लहरा बाई तमरे बनाम छत्तीसगढ़ राज्य में अपनाए गए दृष्टिकोण का अनुसरण करते हुए पीठ ने पीड़ित की मां को अंतरिम राहत के रूप में 25,00,000 रुपये का मुआवजा मंजूर किया।
इसके अलावा पीठ ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य, मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य, और विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य में गिरफ्तारी और हिरासत के संबंध में दिए गए अनिवार्य दिशानिर्देशों का उल्लेख करते हुए दोहराया कि अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के लिखित आधार न बताना और अनुच्छेद 22(2) के तहत अवैध हिरासत में रखना किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की नींव पर चोट करता है।
हाईकोर्ट का निर्णय
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका और अंतरिम आवेदन संख्या 2/2026 को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित मुख्य निर्देश जारी किए:
- साई कृष्णा की हिरासत में हुई मौत से जुड़ी परिस्थितियों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी जाती है। जांच पूरी होने पर सभी दोषी अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार अभियोजन चलाया जाए।
- निदेशक, सीबीआई, नई दिल्ली तुरंत एक नियमित आपराधिक मामला दर्ज करें और किसी वरिष्ठ अधिकारी को त्वरित जांच की जिम्मेदारी सौंपें।
- पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), आंध्र प्रदेश एक सप्ताह के भीतर विशेष संदेशवाहक (स्पेशल मैसेंजर) के माध्यम से मामले के सभी रिकॉर्ड निदेशक, सीबीआई, नई दिल्ली को भेजना सुनिश्चित करें।
- आंध्र प्रदेश सरकार आज से चार सप्ताह के भीतर 25,00,000 रुपये की मुआवजा राशि सीधे याचिकाकर्ता के बैंक खाते में जमा करे।
- राज्य सरकार संबंधित सेवा नियमों के तहत दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करे।
इसके साथ ही अदालत ने अन्य सभी लंबित विविध आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: गाडे विजया लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं 4 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 15132/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस अलापति गिरिधर
निर्णय की तिथि: 16.10.2026

