सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक संपत्ति के लिए अधिकतम मूल्य हासिल करने के उद्देश्य से कोई भी सार्वजनिक प्राधिकरण ई-नीलामी प्रक्रिया को वापस लेने या उसकी समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार रखता है, बशर्ते कन्वेयंस डीड (हस्तांतरण पत्र) के निष्पादन के जरिए कोई बाध्यकारी अनुबंध अस्तित्व में न आया हो। न्यायमूर्ति पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने मेसर्स बेदी हॉस्पिटल को आवंटित नर्सिंग होम प्लॉट का आवंटन रद्द करने के आदेश को खारिज कर दिया था। अपीलों को स्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत ने चंडीगढ़ प्रशासन को इस वाणिज्यिक भूखंड के लिए तीन महीने के भीतर नए सिरे से ई-नीलामी आयोजित करने का निर्देश दिया।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा 31 अगस्त 2022 को जारी एक ई-नीलामी नोटिस से शुरू हुआ। प्रशासन ने सेक्टर 33सी, चंडीगढ़ में फ्रीहोल्ड आधार पर दो नर्सिंग होम प्लॉटों—साइट नंबर 3 और साइट नंबर 4—के लिए बोलियां आमंत्रित की थीं। दोनों प्लॉटों का क्षेत्रफल 744.44 वर्ग गज था और प्रत्येक का आरक्षित मूल्य 6.91 करोड़ रुपये तय किया गया था।
20 अक्टूबर 2022 को हुई नीलामी में अपीलकर्ता सतिंदर पाल सिंह की साइट नंबर 3 के लिए लगाई गई 18.25 करोड़ रुपये की बोली को सबसे अधिक होने के कारण स्वीकार कर लिया गया। वहीं, पास के साइट नंबर 4 के लिए प्रतिवादी मेसर्स बेदी हॉस्पिटल 12.58 करोड़ रुपये की पेशकश के साथ सबसे बड़ा बोलीदाता बनकर उभरा। मेसर्स बेदी हॉस्पिटल ने अनिवार्य 25 प्रतिशत राशि जमा की, जिसके बाद एस्टेट ऑफिसर ने 28 अक्टूबर 2022 को उसके पक्ष में एक एग्रीमेंट टू सेल (बिक्री समझौता) निष्पादित किया। इसके बाद 16 नवंबर 2022 को अस्पताल ने शेष 75 प्रतिशत राशि भी जमा कर दी।
हालांकि, 11 जनवरी 2023 को चंडीगढ़ प्रशासन ने इस आवंटन पर पुनर्विचार किया। प्रशासन ने पाया कि समान आकार और समान स्थान होने के बावजूद साइट नंबर 4 के लिए साइट नंबर 3 की तुलना में लगभग 6 करोड़ रुपये कम मिले हैं। इसके चलते 27 जनवरी 2023 को प्रशासन ने बोली अनुबंध को इस आधार पर रद्द कर दिया कि बोली की यह रकम बाजार के रुझान को नहीं दर्शाती है। प्रशासन ने जमा की गई पूरी राशि वापस करने की प्रक्रिया शुरू की और अस्पताल को अगली नीलामी में भाग लेने की छूट दी। इसके बाद 9 फरवरी 2023 को औपचारिक एग्रीमेंट टू सेल को भी रद्द कर दिया गया।
मेसर्स बेदी हॉस्पिटल ने रद्दीकरण के दोनों पत्रों को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी। 10 फरवरी 2023 को याचिका पर विचार करते समय हाईकोर्ट ने प्रशासन को नई नीलामी आयोजित करने की अनुमति दी, लेकिन निर्देश दिया कि इसे अगली सुनवाई तक अंतिम रूप न दिया जाए। इस छूट के तहत 6 सितंबर 2023 को आयोजित की गई नई नीलामी में अपीलकर्ता 18.30 करोड़ रुपये की पेशकश कर सबसे बड़ा बोलीदाता बना, जबकि मेसर्स बेदी हॉस्पिटल ने इसमें भाग नहीं लिया। पुनः नीलामी के इस परिणाम के बावजूद, हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए दोनों रद्दीकरण आदेशों को खारिज कर दिया और मेसर्स बेदी हॉस्पिटल के पक्ष में मूल आवंटन बहाल कर दिया। इसी फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल ने न्यायिक अनुमति के तहत आयोजित बाद की नीलामी में हिस्सा लिया, 18.30 करोड़ रुपये की बोली लगाई और पूरी राशि का भुगतान कर दिया। उन्होंने कहा कि एक संपन्न हो चुकी नई नीलामी के बाद अपीलकर्ता को हटाना पूरी तरह से अनुचित होगा।
चंडीगढ़ प्रशासन का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने कहा कि प्रशासन के पास चंडीगढ़ एस्टेट रूल्स, 2007 और निविदा की शर्तों के तहत सरकारी खजाने के लिए अधिकतम राजस्व जुटाने हेतु बोलियां रद्द करने और संपत्तियों को वापस लेने की वैधानिक शक्तियां हैं।
मेसर्स बेदी हॉस्पिटल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. पटवालिया ने न्यायिक मिसालों का हवाला देते हुए दलील दी कि पूरी हो चुकी नीलामी प्रक्रिया की कानूनी शुचिता होती है। केवल इसलिए इसे मनमाने ढंग से रद्द नहीं किया जा सकता कि प्रशासन को अधिक रकम की उम्मीद थी। उन्होंने यह भी कहा कि उनका मुवक्किल साइट को अपने पास रखने के लिए अपीलकर्ता की 18.30 करोड़ रुपये की उच्च बोली की बराबरी करने को तैयार है।
कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब की राजधानी (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1952 के तहत बनाए गए चंडीगढ़ एस्टेट रूल्स, 2007 के नियम 5 और ई-नीलामी नोटिस के सामान्य नियमों और शर्तों की जांच की। पीठ ने माना कि नियम 5(iv) के तहत परिकल्पित एग्रीमेंट टू सेल अपने आप में भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 2(h) के तहत एक बाध्यकारी अनुबंध नहीं है।
अदालत ने कहा: “कानून में लागू करने योग्य समझौता ही अनुबंध होता है। वर्तमान मामले में ऐसा लागू करने योग्य समझौता कन्वेयंस डीड (हस्तांतरण पत्र) के निष्पादन के बाद ही अस्तित्व में आएगा। कन्वेयंस डीड का निष्पादन उस प्रक्रिया की परिणति है जिसके द्वारा वादा, प्रस्ताव, स्वीकृति, प्रतिफल का भुगतान और एग्रीमेंट टू सेल का निष्पादन पूरा होता है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक आवंटन पत्र जारी नहीं हो जाता और कन्वेयंस डीड निष्पादित नहीं हो जाती, तब तक अधिकार और दायित्व तय नहीं होते, जिससे प्रशासन रद्दीकरण की अपनी आरक्षित शक्तियों का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र रहता है: “नियमों के साथ-साथ निविदा शर्तों के तहत, चंडीगढ़ प्रशासन ने बिना कोई कारण बताए ‘नीलामी के लिए रखी गई किसी भी साइट या इमारत को वापस लेने’ का अपना अधिकार सुरक्षित रखा है, और इस संबंध में चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से कार्रवाई करने वाले एस्टेट ऑफिसर का निर्णय अंतिम घोषित किया गया है।”
सार्वजनिक कानून के पहलू पर विचार करते हुए अदालत ने चेयरमैन एंड मैनेजिंग डायरेक्टर, सिपकोट, मद्रास एवं अन्य बनाम कॉन्ट्रोमिक्स प्राइवेट लिमिटेड (1995) के फैसले का संदर्भ दिया, जिसमें यह तय किया गया था कि सार्वजनिक संपत्ति की बिक्री में प्रमुख विचार अधिकतम भागीदारी के माध्यम से सर्वोत्तम मूल्य हासिल करना होता है। पीठ ने टिप्पणी की: “हालांकि, सार्वजनिक संपत्ति की बिक्री या पट्टे से जुड़े मामलों में, यदि निर्णय सार्वजनिक संपत्ति की बिक्री/पट्टे के लिए मूल्य को अधिकतम करने के उद्देश्य से लिया गया है, तो किसी सार्वजनिक प्राधिकरण की नीलामी प्रक्रिया को वापस लेने या उस पर पुनर्विचार करने की कार्रवाई उचित होगी। यह तब तक अनुमेय है जब तक कि लागू करने योग्य अनुबंध न हो चुका हो। वर्तमान मामले में, चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा नीलामी पर पुनर्विचार करने का निर्णय आवंटन पत्र को अंतिम रूप देने और उसके परिणामस्वरूप कन्वेयंस डीड के निष्पादन से पहले लिया गया था। इस स्तर पर, नीलामी में काफी कम कीमत मिलना तथाकथित ‘सर्वोच्च बोलीदाता’ के पक्ष में अनुबंध को अंतिम रूप न देने के लिए एक प्रासंगिक विचार हो सकता है।”
कोर्ट ने वाइस-चेयरमैन एंड मैनेजिंग डायरेक्टर, सिटी एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ऑफ महाराष्ट्र लिमिटेड एवं अन्य बनाम शिशिर रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य (2022) और गोल्डन फूड प्रोडक्ट्स इंडिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के फैसलों को अलग बताया। पीठ ने रेखांकित किया कि चंडीगढ़ प्रशासन ने पारदर्शी रूप से काम किया, अपने रद्दीकरण आदेश में कारण स्पष्ट किए, पूरी राशि तुरंत वापस की और अस्पताल को दोबारा बोली लगाने का अवसर दिया।
हाईकोर्ट द्वारा पारित अंतरिम आदेशों की आलोचना करते हुए पीठ ने कहा: “हाईकोर्ट द्वारा की गई उस अंतरिम व्यवस्था ने मुकदमेबाजी के दूसरे दौर को जन्म दिया जो दो साल से अधिक समय तक जारी रहा। आश्चर्यजनक रूप से, जब हाईकोर्ट ने अंतिम सुनवाई के लिए रिट याचिका पर विचार किया, तो उसने बाद की नीलामी के कारण उत्पन्न पक्षों के अधिकारों और दायित्वों के परिणामों पर विचार ही नहीं किया।”
यह रेखांकित करते हुए कि बाद की प्रक्रिया ने यह साबित कर दिया कि संपत्ति से 6 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिल सकते हैं, पीठ ने कहा: “छह करोड़ रुपये कोई छोटी रकम नहीं है, और यह अदालत मूल्य की वास्तविक खोज (प्राइस डिस्कवरी) के संबंध में सामने आए तथ्यों की स्पष्ट सच्चाई से अपनी आंखें नहीं मूंद सकती।”
कोर्ट का निर्णय
अपीलकर्ता को सीधे प्लॉट सौंपने या मेसर्स बेदी हॉस्पिटल को बाद की नीलामी से बाहर बैठने के बाद केवल कीमत की बराबरी करने की अनुमति देने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि जनहित एक खुली प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया की मांग करता है।
अदालत ने अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और चंडीगढ़ प्रशासन को चंडीगढ़ एस्टेट रूल्स, 2007 के तहत सेक्टर 33सी स्थित साइट नंबर 4 के लिए नए सिरे से ई-नीलामी आयोजित करने का निर्देश दिया। आदेश दिया गया है कि यह पूरी प्रक्रिया आज से तीन महीने के भीतर शुरू होकर संपन्न हो जानी चाहिए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सतिंदर पाल सिंह एवं अन्य बनाम बेदी हॉस्पिटल एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 33791 और 33793 / 2025 से उत्पन्न)
पीठ: न्यायमूर्ति पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026

