रजिस्टर्ड सेल डीड के बिना एग्रीमेंट टू सेल से मालिकाना हक नहीं मिलता; टाइटल पर विवाद होने पर सिर्फ कब्जे का दावा पोषणीय नहीं: सुप्रीम कोर्ट

संपत्ति कानून के स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि रजिस्टर्ड सेल डीड (पंजीकृत विक्रय विलेख) के अभाव में केवल ‘एग्रीमेंट टू सेल’ (बिक्री के करार) से कोई अधिकार, स्वत्व (टाइटिल) या मालिकाना हक प्राप्त नहीं होता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब किसी अन्य पक्षकार के पक्ष में पहले से पंजीकृत दस्तावेज मौजूद होने के कारण वादी के मालिकाना हक पर गंभीर संशय या विवाद (क्लाउड ओवर टाइटल) खड़ा हो, तो ऐसी स्थिति में मालिकाना हक की घोषणा, उस रजिस्टर्ड दस्तावेज को रद्द कराने या विशिष्ट अनुपालन (स्पेसिफिक परफॉरमेंस) की मांग किए बिना केवल कब्जे की बहाली (पजेशन सिम्प्लिसिटर) के लिए दायर किया गया मुकदमा चलने योग्य (मेंटेनेबल) नहीं है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इन टिप्पणियों के साथ स्वर्गीय सोहन सिंह के कानूनी वारिसों की अपील खारिज कर दी और नई दिल्ली स्थित एक बहुमूल्य आवासीय भूखंड पर उनके दावे को खारिज करने वाले ट्रायल कोर्ट व दिल्ली हाईकोर्ट के समवर्ती फैसलों पर अपनी मुहर लगा दी।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद नई दिल्ली स्थित फ्रेंड्स कॉलोनी के प्लॉट नंबर 8 से जुड़ा हुआ है, जो लगभग 4,132 वर्ग गज का है और जिस पर एक इमारत भी बनी हुई है। सोहन सिंह 16 जनवरी 1950 को ‘नत्थू राम फ्रेंड्स कॉलोनी को-ऑपरेटिव हाउसिंग बिल्डिंग सोसायटी लिमिटेड’ के सदस्य बने थे। इसके बाद, 14 जनवरी 1952 के एक एग्रीमेंट टू सेल के जरिए सोसायटी ने उन्हें 11,824 रुपये के एवज में यह भूखंड आवंटित किया। इस समझौते के क्लॉज 7 के तहत एक अनिवार्य शर्त यह थी कि खरीदार को तीन साल की निर्धारित अवधि के भीतर उस भूखंड पर निर्माण कार्य पूरा करना होगा; ऐसा न करने पर वह सेल डीड हासिल करने का अधिकार खो देगा।

सोहन सिंह के सर सोभा सिंह के साथ बेहद करीबी दोस्ताना और व्यावसायिक संबंध थे। निर्माण पूरा करने की तीन साल की मियाद खत्म होने से पहले ही, 4 अक्टूबर 1954 को सोहन सिंह ने सोसायटी को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने मकान बनाने में अपनी असमर्थता जताई और अनुरोध किया कि यह प्लॉट सर सोभा सिंह के बेटे कर्नल गुरबख्श सिंह (प्रतिवादी संख्या 1) के नाम ट्रांसफर कर दिया जाए, जिन्हें पत्र में उन्होंने अपना “भतीजा” बताया था।

सोहन सिंह के इस पत्र पर कार्रवाई करते हुए सोसायटी ने 13 अक्टूबर 1954 को बाकी बकाए के भुगतान की शर्त पर यह भूखंड गुरबख्श सिंह के नाम ट्रांसफर करने का प्रस्ताव पारित किया। गुरबख्श सिंह ने बकाया राशि जमा की, 1954 में कब्जा लिया और अपनी निजी पूंजी से दो मंजिला मकान बनवाकर 1959 तक निर्माण कार्य पूरा कर लिया। इसके बाद, 3 दिसंबर 1960 को सोसायटी ने विधिवत गुरबख्श सिंह के पक्ष में रजिस्टर्ड सेल डीड निष्पादित कर दी।

इसके कई दशकों बाद, सोहन सिंह के कानूनी वारिसों ने निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में सिविल वाद दायर कर विवादित संपत्ति के कब्जे और हर्जाने (मेसने प्रॉफिट्स) की मांग की। उनका दावा था कि गुरबख्श सिंह के पक्ष में किया गया ट्रांसफर और उसके बाद निष्पादित की गई सेल डीड फर्जी, कपटपूर्ण और अमान्य थी।

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दोनों पक्षों के तर्क

अपीलकर्ताओं (वादियों) का कहना था कि सोहन सिंह ने पूरी तयशुदा रकम चुका दी थी, इसलिए वही इस संपत्ति के पूर्ण स्वामी थे। उन्होंने दलील दी कि जब सोहन सिंह शिमला में रह रहे थे, तब सर सोभा सिंह केवल उनके एजेंट के रूप में निर्माण कार्य की देखरेख कर रहे थे। वादियों ने आरोप लगाया कि सोसायटी ने गुरबख्श सिंह के साथ मिलीभगत करके 3 दिसंबर 1960 की सेल डीड धोखे से निष्पादित करवाई थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वे लगातार को-ऑपरेटिव सोसायटीज के रजिस्ट्रार और अन्य मंचों पर अपनी शिकायत उठाते रहे हैं, इसलिए उनका 1975 का मुकदमा मियाद कानून (लिमिटेशन) के दायरे में है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 53ए के तहत ‘पार्ट-परफॉरमेंस’ (आंशिक पालन) का संरक्षण भी मांगा।

दूसरी ओर, प्रतिवादी संख्या 1 (गुरबख्श सिंह) ने दलील दी कि केवल कब्जे की मांग को लेकर दायर यह मुकदमा शुरू से ही पोषणीय नहीं है, क्योंकि वादियों ने न तो 1952 के एग्रीमेंट के विशिष्ट अनुपालन (स्पेसिफिक परफॉरमेंस) की मांग की और न ही 3 दिसंबर 1960 की रजिस्टर्ड सेल डीड को रद्द करने की कोई प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि यह वाद लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 54, 59 और 64 के तहत समय-सीमा से पूरी तरह बाहर (बार्ड बाय लिमिटेशन) हो चुका है। मेरिट पर उनका तर्क था कि सोहन सिंह ने 4 अक्टूबर 1954 के पत्र के जरिए स्वेच्छा से अपने अधिकारों का परित्याग कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने स्वयं कब्जा लेकर अपने पैसे से निर्माण कराया और 1954 से लगातार संपत्ति पर निर्बाध रूप से काबिज रहे।

निचली अदालतों के निर्णय

तीस हजारी, दिल्ली की अदालत (अडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज) ने 14 जनवरी 2010 को इस मुकदमे को खारिज कर दिया था। हालांकि लिमिटेशन के मुद्दे पर ट्रायल कोर्ट ने माना कि वादी 1963 से 1975 तक विभिन्न मंचों पर इस मामले को उठाते रहे थे, लेकिन मेरिट के आधार पर कोर्ट ने वादियों के खिलाफ फैसला सुनाया। ट्रायल कोर्ट ने माना कि जब सोहन सिंह ने स्वेच्छा से अपना दावा छोड़ दिया और निर्माण में कोई आर्थिक योगदान नहीं दिया, तो अब उनके वारिस इस ट्रांसफर को चुनौती देने के हकदार नहीं हैं और वे विबंधन (एस्ट्रोपेल) के सिद्धांत से बंधे हैं।

इसके बाद, 2 फरवरी 2012 को दिल्ली हाईकोर्ट ने वादियों की पहली नियमित अपील (आरएफए) खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने माना कि यह मुकदमा लिमिटेशन एक्ट के आर्टिकल 59 के तहत पूरी तरह से समय-बाधित है। हाईकोर्ट ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि सोहन सिंह 1952 के समझौते के तहत अपने अधिकारों को पहले ही त्याग चुके थे, इसलिए उन्हें ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 53ए का लाभ नहीं मिल सकता और वे भारतीय साक्ष्य अधिनियम (एविडेंस एक्ट) की धारा 115 के तहत विबंधन के दायरे में आते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट के लिए मुख्य विचारणीय प्रश्न यह था कि क्या वादी के मुकदमे को खारिज करने वाले हाईकोर्ट के फैसले में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। अदालत ने कई कानूनी पहलुओं की पड़ताल करते हुए इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक में दिया:

1. मियाद कानून (लिमिटेशन) से बाधित मुकदमा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परिसीमा (लिमिटेशन) के कानून दो विधिक सूत्रों पर आधारित हैं: “इंटरेस्ट रिपब्लिकाई उट सिट फिनिस लिटियम” (राज्य के हित में यह आवश्यक है कि मुकदमों का अंत हो) और “विजिलेंटीबस नॉन डॉर्मिएंटीबस जुरा सबवेनिएंट” (कानून सतर्क रहने वालों की मदद करता है, अपने अधिकारों पर सोने वालों की नहीं)। केरल राज्य बनाम वी.आर. कल्लियानीकुट्टी (1999) मामले का हवाला देते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

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“एक सुप्त दावा न्याय दिलाने के बजाय अधिक क्रूर हो सकता है।”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि प्रक्रियात्मक समय-सीमा बासी और खत्म हो चुके दावों को दोबारा जिंदा होने से रोकने के लिए बनाई गई है:

  • आर्टिकल 54 (विशिष्ट अनुपालन): अहमदसाहब अब्दुल मुल्ला बनाम बीबीजान (2009) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि निर्माण की तीन साल की मियाद 14 जनवरी 1955 को पूरी हो गई थी, जिसके अनुसार मियाद 1958 में खत्म हो गई। यदि सोसायटी द्वारा इंकार करने की जानकारी की तारीख (23 मई 1963) से भी गणना की जाए, तो भी तीन साल की अवधि 1966 में समाप्त हो गई थी।
  • आर्टिकल 59 (दस्तावेज रद्द कराना): 3 दिसंबर 1960 की सेल डीड को रद्द कराने का मुकदमा जानकारी मिलने के तीन साल के भीतर किया जाना चाहिए था। वादियों के अनुसार उन्हें इसकी जानकारी मई 1963 में हुई थी, तब भी यह अवधि 1966 में समाप्त हो गई। अत: 1975 में लाया गया मुकदमा पूरी तरह समय-बाधित था।
  • आर्टिकल 64 और धारा 27 (पिछले कब्जे के आधार पर बेदखली का वाद): आर्टिकल 64 के लिए पूर्व कब्जा और बिना सहमति के बेदखली जरूरी है। यहां सोहन सिंह ने 1954 के पत्र से स्वेच्छा से कब्जा छोड़ा था, इसलिए बेदखली का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यदि काल्पनिक रूप से बेदखली मानी भी जाए, तो 12 साल की सीमा 1966 में और सेल डीड की तारीख से 1972 में खत्म हो चुकी थी।

2. एग्रीमेंट टू सेल से मालिकाना हक का हस्तांतरण नहीं होता

ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 54 और रामभाऊ नामदेव गजरे बनाम नारायण बापूजी धोत्रे (2004) तथा सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम हरियाणा राज्य (2012) के नजीरों को दोहराते हुए कोर्ट ने कहा:

“यह कानून का सर्वमान्य सिद्धांत है कि बिक्री का करार (एग्रीमेंट टू सेल) संपत्ति पर कोई स्वत्व हस्तांतरित नहीं करता और न ही कोई अधिकार सृजित करता है… केवल एग्रीमेंट टू सेल का अस्तित्व, रजिस्टर्ड सेल डीड के अभाव में, किसी भी तरह से संपत्ति पर मालिकाना हक या स्वत्व प्रदान नहीं करता है।”

अदालत ने रेखांकित किया कि सोहन सिंह के पक्ष में मालिकाना हक तभी आ सकता था जब वह तीन साल में निर्माण की अनिवार्य शर्त पूरी करते, जिसे वे पूरा नहीं कर सके।

3. टाइटल पर संशय होने पर सिर्फ कब्जे का दावा पोषणीय नहीं

वाद की पोषणीयता पर सुप्रीम कोर्ट ने अनथुला सुधाकर बनाम पी. बुची रेड्डी (2008) और कुरैला नागा ध्रुव उदय भास्कर राव बनाम गल्ला जानी कम्मा (2008) के फैसलों का आधार लिया। अनथुला सुधाकर मामले की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा:

“किसी व्यक्ति के टाइटल पर संशय (क्लाउड) तब माना जाता है, जब उसकी संपत्ति के अधिकार में कोई स्पष्ट खामी नजर आए या किसी तीसरे पक्ष का प्रथम दृष्टया अधिकार दिखाई दे। संपत्ति के टाइटल पर पड़े इस संशय को दूर करने का कानूनी उपाय घोषणा (डेक्लेरेशन) का वाद है।”

इसी आधार पर पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि गुरबख्श सिंह के पास 3 दिसंबर 1960 की रजिस्टर्ड सेल डीड थी, जिससे वादियों के दावे पर गंभीर संशय उत्पन्न हो चुका था, इसलिए:

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“कब्जे की मूल मांग तब नहीं टिक सकती जब प्रतिवादी संख्या 1 के नाम पर एक रजिस्टर्ड सेल डीड मौजूद हो, जो वादियों के मालिकाना हक को निष्प्रभावी करती है।”

4. विबंधन (एस्ट्रोपेल) और मौन सहमति (एक्विसेस)

एविडेंस एक्ट की धारा 115 और प्रतिमा चौधरी बनाम कल्पना मुखर्जी (2014) में निर्धारित चार आधारों का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि सोहन सिंह ने 4 अक्टूबर 1954 को यह स्पष्ट प्रतिवेदन दिया था कि वे निर्माण करने में असमर्थ हैं और प्लॉट गुरबख्श सिंह को ट्रांसफर कर दिया जाए। सोसायटी और गुरबख्श सिंह ने इस पर भरोसा करके अपनी स्थिति बदली—गुरबख्श सिंह ने अपने पैसे से मकान बनवाया और सेल डीड प्राप्त की।

इसके साथ ही, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम एम.जे. जेम्स (2022) के आधार पर कोर्ट ने टिप्पणी की:

“उनका आचरण, निर्माण कार्य करने के अपने दायित्व का सचेत और स्पष्ट परित्याग था तथा प्रतिवादी संख्या 1 के पक्ष में भूखंड के तदनुसार ट्रांसफर की स्वीकृति थी।”

5. धारा 53ए के तहत दावा खारिज

ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 53ए (पार्ट-परफॉरमेंस) की मांग को खारिज करते हुए कोर्ट ने नत्थूलाल बनाम फूलचंद (1969), श्रीमंत शामराव सूर्यवंशी बनाम प्रहलाद भैरोबा सूर्यवंशी (2002) और गिरियप्पा बनाम कमलम्मा (2024) का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि वादी इसकी मूलभूत शर्तें पूरी नहीं करते—वे मुकदमा दायर करते समय कब्जे में नहीं थे, और न ही सोहन सिंह तीन साल में निर्माण करने की अपनी अनिवार्य शर्त को पूरा करने के लिए तैयार व तत्पर थे।

कोर्ट का अंतिम फैसला

अपने निष्कर्षों को समेटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि यह मुकदमा मियाद कानून के तहत पूरी तरह से बाधित था, रजिस्टर्ड सेल डीड के बिना एग्रीमेंट टू सेल से कोई मालिकाना हक नहीं मिलता, रजिस्टर्ड सेल डीड को रद्द कराए बिना या मालिकाना हक की घोषणा मांगे बिना केवल कब्जे का दावा चलने योग्य नहीं था, और वादी विबंधन तथा मौन सहमति के सिद्धांतों से बंधे हुए थे।

इन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने वादियों की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश की पुष्टि कर दी।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्रीमती रानो सिंह एवं अन्य बनाम श्री गुरबख्श सिंह (मृत) कानूनी वारिसों के जरिए एवं अन्य

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 7025/2012

पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली

निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026

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