सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मद्रास हाईकोर्ट के लेटर्स पेटेंट के क्लॉज 15 के तहत इंट्रा-कोर्ट अपील की सुनवाई करने वाली खंडपीठ (डिवीजन बेंच), संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सिंगल जज (रिट कोर्ट) द्वारा दिए गए न्यायसंगत और उचित फैसले में सिर्फ इसलिए दखल नहीं दे सकती क्योंकि मामले पर उसका दृष्टिकोण अलग है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसने रिट कोर्ट के निर्णय को पलटते हुए पेरियार यूनिवर्सिटी द्वारा एक कर्मचारी को सेवा से हटाए जाने के दंड को बहाल कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी की अपील स्वीकार करते हुए रिट कोर्ट के फैसले को बहाल रखा, जिसने बर्खास्तगी आदेश को इस आधार पर निरस्त किया था कि विभागीय जांच के निष्कर्ष पूरी तरह मनमाने (विकृत) और ‘बिना किसी सबूत’ पर आधारित थे।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता आर. सरवणन को 2 मई 2000 को विधिवत प्रक्रिया के तहत पेरियार यूनिवर्सिटी में सहायक रजिस्ट्रार (असिस्टेंट रजिस्ट्रार) के पद पर नियुक्त किया गया था। बाद में वह डिप्टी रजिस्ट्रार के रूप में कार्यरत थे। उनकी संपत्ति को लेकर उच्च शिक्षा विभाग को एक शिकायत मिलने के बाद वर्ष 2008 और 2009 में यह निर्देश जारी किए गए कि उनके ज्ञात आय स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोपों की जांच की जाए।
शुरुआत में गठित तीन सदस्यीय समिति असहयोग और बाधाओं के आरोपों के चलते जांच आगे नहीं बढ़ा सकी। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने 19 अप्रैल 2011 को एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया। इस आयोग ने 14 आरोपों में से आरोप संख्या 1, 4, 10, 13 और 14 को साबित पाया, जबकि अन्य आरोपों को साबित नहीं माना।
यूनिवर्सिटी के सिंडिकेट ने आयोग के निष्कर्षों को स्वीकार करते हुए 26 जुलाई 2013 के पत्र के जरिए अपीलकर्ता को 27 जुलाई 2013 से सेवा से हटाने का आदेश दिया। सेवा से हटाने का यह दंड मुख्य रूप से तीन आरोपों पर आधारित था:
- आरोप संख्या 1: गंगा कॉलेज ऑफ एजुकेशन (जिसमें उनकी पत्नी मैनेजिंग ट्रस्टी थीं) को संबद्धता दिलाने के लिए अधिकारियों को प्रभावित करना।
- आरोप संख्या 4: यूनिवर्सिटी से पूर्व अनुमति लिए बिना पेरियार नगर में अपनी मां के नाम पर आवासीय संपत्ति खरीदना।
- आरोप संख्या 10: यूनिवर्सिटी की अनुमति के बिना और नियमित आय स्रोत से अधिक कीमत पर 4 लाख रुपये मूल्य की सैंट्रो कार खरीदना।
अपीलकर्ता ने इस बर्खास्तगी आदेश को मद्रास हाईकोर्ट में रिट याचिका (डब्ल्यूपी संख्या 23936/2013) के जरिए चुनौती दी। सिंगल जज की रिट कोर्ट ने जांच रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद पाया कि आयोग के निष्कर्ष किसी भी ठोस साक्ष्य पर आधारित नहीं थे और पूरी तरह मनमाने थे, जिसके चलते कोर्ट ने सेवा से हटाने के आदेश को रद्द कर दिया। हालांकि, पेरियार यूनिवर्सिटी द्वारा लेटर्स पेटेंट के क्लॉज 15 के तहत दायर इंट्रा-कोर्ट अपील (रिट अपील संख्या 2329/2018) में खंडपीठ ने विभागीय जांच की सामग्री का दोबारा मूल्यांकन किया और यह मानते हुए कि रिपोर्ट दस्तावेजी साक्ष्यों से पुष्ट है, सेवा से हटाने के दंड को बहाल कर दिया। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि एक सदस्यीय आयोग को आरोप तय करने या अनुशासनात्मक कार्यवाही चलाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था, क्योंकि इसका गठन केवल तथ्यों का पता लगाने के लिए किया गया था। यह भी तर्क दिया गया कि आरोप संख्या 1, 4 और 10 पर दिए गए निष्कर्ष काल्पनिक, अनुमान आधारित और बिना किसी आपत्तिजनक सामग्री के थे। साथ ही, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने केवल सुनी-सुनाई बातों (हियरसे) और गलत अनुमानों के आधार पर बर्खास्तगी का निर्णय लेकर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया।
दूसरी तरफ, पेरियार यूनिवर्सिटी की ओर से कहा गया कि तमिलनाडु सिविल सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1955 के नियम 17(जी) के तहत सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता वाले आयोग से जांच कराना पूरी तरह कानूनी था। यूनिवर्सिटी ने यह आपत्ति भी उठाई कि अपीलकर्ता ने नियमों के नियम 19 के तहत उपलब्ध वैधानिक अपील के वैकल्पिक उपाय का उपयोग नहीं किया, इसलिए रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी। यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ वकील ने यह भी तर्क दिया कि विभागीय प्राधिकारी के निष्कर्षों की सत्यता की समीक्षा करने के लिए रिट कोर्ट खुद को अपीलीय अदालत में तब्दील नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले जांच प्रक्रिया से जुड़ी तकनीकी चुनौतियों पर विचार किया। कोर्ट ने पाया कि आयोग ने वैधानिक नियमों के अनुरूप कार्यवाही की थी, जिसमें अपीलकर्ता की मौजूदगी में 22 गवाहों से पूछताछ की गई और उन्हें बचाव का पूरा अवसर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि जब तक कर्मचारी को कोई वास्तविक नुकसान (प्रेजुडिस) न पहुंचा हो, तब तक मामूली तकनीकी प्रक्रियात्मक उल्लंघनों से पूरी जांच रद्द नहीं होती। इसके अलावा, आयोग के गठन को चुनौती देने वाली याचिका 2017 में ही निष्प्रभावी होकर खारिज हो चुकी थी, जिसे आगे चुनौती नहीं दी गई थी।
वैकल्पिक वैधानिक उपचार के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि हालांकि वैधानिक उपचारों के इस्तेमाल का नियम प्रशासनिक सुविधा का एक स्वस्थ सिद्धांत है, लेकिन यह मनमाने दंड के मामलों में अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की व्यापक शक्तियों को सीमित नहीं कर सकता:
“सेवा से बर्खास्तगी या हटाने का दंड सबसे कठोर उपाय है और यह एक सरकारी कर्मचारी के लिए मौत की सजा से कम नहीं है। इसके दूरगामी प्रभाव होते हैं और यह कर्मचारी के परिवार को भी प्रभावित करता है। इस तरह के दंड से कर्मचारी के वे सभी सेवा-संबद्ध लाभ समाप्त हो जाते हैं जो उसने अर्जित किए थे और वह पूरी तरह बेसहारा हो जाता है। यदि परिणाम इतने गंभीर हैं, तो रिट कोर्ट को मूकदर्शक नहीं बने रहना चाहिए। उपयुक्त मामलों में, रिट कोर्ट से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी स्व-लगाए गए प्रतिबंध से बाहर आए और दंड के आदेश के खिलाफ दी गई चुनौती पर सुनवाई करे।”
जांच रिपोर्ट की मेरिट पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी एक अर्ध-न्यायिक भूमिका निभाता है और उसे अभियोजक (प्रॉसिक्यूटर) का रूप धारण नहीं करना चाहिए। मुख्य आरोपों पर विचार करते हुए पीठ ने पाया:
- आरोप संख्या 1 पर आयोग ने प्रभाव डालने का कोई साक्ष्य दर्ज नहीं किया, बल्कि केवल इस अनुमान पर आरोप साबित मान लिया कि अपीलकर्ता द्वारा अधिकारियों को प्रभावित करने की संभावना से “इनकार नहीं किया जा सकता।”
- आरोप संख्या 4 के मामले में, अपीलकर्ता को केवल इसलिए अपनी मां के मकान का वास्तविक स्वामी मान लिया गया क्योंकि वह एचडीएफसी बैंक के ऋण में सह-ऋणी (को-ऑब्लीगैंट) के रूप में ईएमआई चुका रहे थे और उन्होंने मालिकाना हक का दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया था। कोर्ट ने कहा कि यह सबूत के भार (बर्डन ऑफ प्रूफ) को गलत तरीके से उलटने जैसा था।
- आरोप संख्या 10 में, कार ऋण की नियमित ईएमआई चुकाने को इस बात का ठोस सबूत नहीं माना जा सकता कि उनके पास आय से अधिक संपत्ति थी।
सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा:
“जांच रिपोर्ट से जो बात सामने आई है वह यह है कि अपीलकर्ता को बिना किसी सबूत के दोषी ठहरा दिया गया। इससे बड़ा अन्याय उसके साथ और क्या हो सकता है कि उसे केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर सूली पर चढ़ा दिया जाए। अपीलकर्ता के खिलाफ दोष का निष्कर्ष दर्ज करने के लिए बुनियादी साक्ष्यों का पूरी तरह अभाव है।”
हरि विष्णु कामथ बनाम अहमद इशाक, द कस्टोडियन ऑफ इवैक्यूई बनाम खान साहेब अब्दुल शकूर, टी.सी. बसप्पा बनाम टी. नागप्पा और सैयद याकूब बनाम के.एस. राधाकृष्णन जैसे संविधान पीठ के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि हालांकि रिट कोर्ट सबूतों को तौलने वाली अपीलीय अदालत नहीं है, लेकिन यदि कोई निष्कर्ष ‘बिना किसी सबूत’ या निराधार अनुमानों पर टिका हो, तो यह रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष कानूनी त्रुटि (एरर ऑफ लॉ अपरेंट ऑन द फेस ऑफ रिकॉर्ड) मानी जाती है और इसमें उत्प्रेषण रिट (सर्टिओरारी) जारी की जा सकती है।
क्लॉज 15 के तहत लेटर्स पेटेंट अपील के दायरे पर चर्चा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया कि हालांकि इस अपील में तथ्यों और कानून दोनों पर विचार किया जा सकता है (जैसा कि अलापति कासी विश्वनाथम बनाम ए. शिवराम कृष्णय्या और आशा देवी बनाम दुखी साव में निर्धारित है), लेकिन इस अधिकार क्षेत्र की अपनी सीमाएं हैं। खंडपीठ को सिंगल जज के विवेकपूर्ण फैसले में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि वह आदेश प्रत्यक्ष रूप से त्रुटिपूर्ण न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया:
“यदि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए रिट कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय न्याय, समता और सद्विवेक को बढ़ावा देने वाला है और सार्वजनिक नीति के विपरीत नहीं है, तो मद्रास हाईकोर्ट के लेटर्स पेटेंट के क्लॉज 15 या अन्य हाईकोर्ट्स के लेटर्स पेटेंट के समान प्रावधानों के तहत गठित लेटर्स पेटेंट बेंच रिट कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने के लिए अपने अपीलीय अधिकार क्षेत्र का प्रयोग नहीं कर सकती। सीधे शब्दों में कहें तो, लेटर्स पेटेंट बेंच रिट कोर्ट द्वारा दिए गए उस निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकती जो अन्यथा न्यायसंगत और उचित है।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने केवल अनुमानों के आधार पर पूरे साक्ष्यों का अनुचित पुनर्मूल्यांकन किया और बिना किसी ठोस आधार के रिट कोर्ट के सुविचारित फैसले को पलट दिया। तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील को स्वीकार करते हुए 29 अगस्त 2019 के खंडपीठ के आदेश को रद्द कर दिया और रिट कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह बहाल कर दिया, जिसने अपीलकर्ता को सेवा से हटाने के यूनिवर्सिटी के आदेश को निरस्त किया था।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: आर. सरवणन बनाम पेरियार यूनिवर्सिटी एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एसईएलपी (सिविल) संख्या 4216/2020 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026

