एक इमारत में हुए भीषण अग्निकांड के पीड़ितों के उपचार और मुआवजे से जुड़े मामले पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को बड़ा निर्देश दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह हादसे में स्थायी रूप से दिव्यांग हो चुके पीड़ित के इलाज पर अब तक हुए खर्च का पुनर्भुगतान (रीइंबर्समेंट) करे और आगे के मासिक मेडिकल बिलों का भी भुगतान सुनिश्चित करे। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार से पीड़ित को दिए जाने वाले प्रस्तावित मुआवजे पर स्पष्ट निर्देश मांगे हैं, ताकि पीठ यह तय कर सके कि प्रस्तावित राशि पर्याप्त है या नहीं।
मामले की पृष्ठभूमि और पक्षकारों की पैरवी
यह सुनवाई शिवेंदु पांडेय द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य (अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव, गृह विभाग, लखनऊ) तथा 11 अन्य के खिलाफ दाखिल जनहित याचिका संख्या 603/2026 और उससे जुड़ी एक अन्य जनहित याचिका संख्या 609/2026 (अभिषेक दुबे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 5 अन्य) पर हुई।
मामले में याचिकाकर्ता व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। उनके साथ अधिवक्ता राकेश देवी प्रसाद कुमार, रोहित त्रिपाठी, शिशिर श्रीवास्तव और सैयद जुल्फिकार हुसैन नकवी उपस्थित रहे। वहीं प्रतिवादी पक्ष की ओर से अपर महाधिवक्ता (एएजी) वी.के. शाही, भारत के अपर सॉलिसिटर जनरल (एएसजीआई), मुख्य स्थायी अधिवक्ता (सीएससी) और अधिवक्ता अपराजिता बंसल, मनीष जौहरी, रत्नेश चंद्रा, शैलेंद्र सिंह चौहान और शुभम त्रिपाठी ने पैरवी की।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने मामले में दो अलग-अलग पक्षकार (इंटरवेंशन) अर्जियों को स्वीकार किया। पहली अर्जी घायल पीड़ित जयंत गुप्ता की ओर से दाखिल की गई थी, जिनकी ओर से अधिवक्ता शशांक तिल्हारी पेश हुए। दूसरी अर्जी पीड़ित परिवारों की ओर से दाखिल की गई, जिनका प्रतिनिधित्व अधिवक्ता रोहित त्रिपाठी ने किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई पर वाद सूची में दोनों अधिवक्ताओं के नाम संबंधित पक्षकारों के काउंसिल के रूप में दर्ज किए जाएं।
जिस इमारत में आग लगी थी, उसके मालिकाना हक का जिक्र करते हुए अधिवक्ता कौस्तुभ शांडिल्य ने कोर्ट को बताया कि वह कमियों को दूर करने के बाद दोनों मालिकों में से एक, वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला की ओर से वकालतनामा दाखिल कर रहे हैं। इस पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह दिन में ही दूसरे सह-मालिक सुरेंद्र प्रसाद शुक्ला को भी पक्षकार बनाएं। अधिवक्ता कौस्तुभ शांडिल्य ने कहा कि वह नए पक्षकार बनाए गए सह-मालिक की ओर से भी वकालतनामा दाखिल करेंगे, जिससे अलग से नोटिस जारी करने की आवश्यकता नहीं होगी। अदालत ने इमारत के दोनों मालिकों को अगली सुनवाई से पहले अपना जवाब दाखिल करने की छूट दी।
पक्षकारों की दलीलें
राज्य सरकार की ओर से पेश अपर महाधिवक्ता वी.के. शाही ने गृह विभाग, उत्तर प्रदेश शासन के सचिव द्वारा जारी 15 अक्टूबर 2026 का एक आदेश कोर्ट के समक्ष रखा। इस शासनादेश के तहत अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव (चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग) को निर्देश दिए गए हैं कि किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में जयंत गुप्ता के इलाज का कोई खर्च उनसे नहीं लिया जाएगा, उन्हें समुचित चिकित्सा मुहैया कराई जाएगी और यदि कोई चिकित्सकीय खर्च आता है तो उसकी मांग राज्य सरकार के समक्ष रखी जाएगी, जिसे सरकार वहन करेगी।
वहीं घायल जयंत गुप्ता की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि पीड़ित इलाज पर अब तक लगभग 2.5 लाख रुपये खर्च कर चुका है, जबकि सभी स्रोतों से उसे केवल 1.5 लाख रुपये के आसपास ही मुआवजा मिला है। वकील ने बताया कि पीड़ित पूरी तरह दिव्यांग हो चुका है और चलने-फिरने में असमर्थ है। इस घटना में घायल होने से पहले वह एक कैरेक्टर आर्टिस्ट के रूप में काम कर रहा था और करीब 46,000 रुपये प्रति माह कमाता था। अब वह कोई आजीविका कमाने में सक्षम नहीं है और अपने पिता पर आश्रित है, जिनकी मासिक पेंशन केवल लगभग 25,000 रुपये है। ऐसे में उसे मुआवजा मिलना बेहद जरूरी है।
कोर्ट का रुख और निर्देश
अपने पुराने आदेशों की ओर ध्यान दिलाते हुए खंडपीठ ने राज्य सरकार से पीड़ित को दिए जाने वाले मुआवजे पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा:
“हमने अपने पूर्व के आदेशों में इस संबंध में पहले ही टिप्पणियां की हैं। राज्य सरकार इस बात पर स्पष्ट निर्देशों के साथ आए कि वह याचिकाकर्ता को क्या मुआवजा देने का प्रस्ताव रखती है, फिर हम विचार करेंगे कि वह किस हद तक पर्याप्त है।”
इलाज पर अब तक खर्च की गई रकम की तत्काल वापसी को लेकर पीठ ने भुगतान की स्पष्ट प्रक्रिया तय करते हुए कहा:
“इस बीच, यदि आवेदक जयंत गुप्ता द्वारा इलाज में खर्च किए गए 2.5 लाख रुपये का प्रमाण अपर महाधिवक्ता वी.के. शाही के माध्यम से पूर्वोक्त अपर मुख्य सचिव को प्रस्तुत किया जाता है, तो उस पर कार्रवाई की जाएगी और आवश्यक धनराशि का भुगतान अगली तारीख से पहले उन्हें कर दिया जाएगा।”
अस्पताल या घर पर चल रहे उपचार के नियमित खर्च के लिए भी कोर्ट ने यही मासिक व्यवस्था लागू की:
“अस्पताल में या उनके घर पर इलाज के मौजूदा और लगातार होने वाले खर्च के संबंध में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इसका आशय यह है कि आवेदक जयंत गुप्ता इस संबंध में बिल अपर महाधिवक्ता वी.के. शाही के कार्यालय के माध्यम से पूर्वोक्त अपर मुख्य सचिव को भेजेंगे, जो इसे संबंधित अधिकारी को प्रेषित करेंगे और इस पर प्रक्रिया पूरी कर हर महीने आवेदक को धनराशि का भुगतान किया जाएगा।”
राहत के दीर्घकालिक और नीतिगत समाधान को लेकर अपर महाधिवक्ता वी.के. शाही ने अदालत को बताया कि कोर्ट के 9 सितंबर 2026 के आदेश के अनुपालन में अपर मुख्य सचिव (गृह) की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति बनाई गई है। यह समिति मुआवजा देने से जुड़े नीतिगत ढांचे या कानून के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। इस पर पीठ ने टिप्पणी की:
“हम आशा और विश्वास करते हैं कि उक्त उच्च स्तरीय समिति इस संबंध में एक उचित और निष्पक्ष नीति अथवा प्रस्ताव लेकर सामने आएगी।”
अदालत का फैसला
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि इस कार्यवाही और इससे जुड़े मामले में पूर्व में जारी अन्य सभी निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट अगली सुनवाई पर संबंधित पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत की जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई नवंबर 2026 के चौथे सप्ताह में तय कर दी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: शिवेंदु पांडेय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, जरिए अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव गृह विभाग, लखनऊ व 11 अन्य (संबद्ध जनहित याचिका संख्या 609/2026 के साथ)
वाद संख्या: जनहित याचिका संख्या 603/2026
पीठ: जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला
निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026

