दिल्ली हाईकोर्ट ने 86 प्रतिशत स्थायी लोकोमोटर दिव्यांगता से पीड़ित एक व्यक्ति द्वारा अपनी पूर्व पत्नी और उसके परिजनों के खिलाफ दायर प्रताड़ना की शिकायत को बहाल कर दिया है। अदालत ने निचली विशेष अदालत द्वारा इस मामले को खारिज करने के फैसले को गैर-जिम्मेदाराना और अनुचित ठहराते हुए शिकायत पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस प्रतीक जालान ने मामले की सुनवाई करते हुए 13 अक्टूबर को स्पष्ट किया कि विशेष अदालत ने पूरे प्रकरण को केवल वर्ष 2012 तक सीमित मानकर भारी चूक की, जबकि याचिकाकर्ता ने 2012 के बाद भी लगातार उत्पीड़न जारी रहने के गंभीर आरोप लगाए थे, जिसमें वर्ष 2025 की एक घटना भी शामिल है। हाईकोर्ट ने कहा कि उसका यह फैसला आरोपों के सही या गलत होने पर कोई राय व्यक्त नहीं करता, बल्कि निचली अदालत को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (आरपीडब्ल्यूडी एक्ट), 2016 के व्यापक संरक्षणकारी उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए पूरे मामले की नए सिरे से समीक्षा करनी चाहिए।
विशेष अदालत के फैसले में गंभीर खामियां
इस मामले की शुरुआत 14 अप्रैल 2012 को हुए विवाह से हुई थी। दोनों पक्ष 8 मई 2012 को अलग हो गए, यानी उनका वैवाहिक जीवन एक महीने से भी कम समय तक चला। इसके बाद दोनों के बीच कई कानूनी मुकदमे चले और अंततः उनका तलाक हो गया।
इसके बाद पीड़ित व्यक्ति ने पूर्व पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ आरपीडब्ल्यूडी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई, जिसे 15 दिसंबर 2025 को विशेष अदालत ने खारिज कर दिया था। विशेष अदालत ने इसे वैवाहिक विवाद और पुराने मामलों को उठाने का प्रयास करार दिया था। उसका मानना था कि 2012 के दौरान साथ रहने की अवधि से जुड़े आरोपों में तारीख, समय और विशिष्ट घटनाओं का ठोस विवरण नहीं दिया गया था।
हालांकि, जस्टिस जालान ने पाया कि विशेष अदालत ने इस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि प्रताड़ना केवल 2012 तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि उसके बाद के वर्षों में भी जारी रही। यद्यपि निचली अदालत के संज्ञान में बाद की घटनाओं का उल्लेख आया था, फिर भी उसने यह मानकर शिकायत खारिज कर दी कि सभी आरोप सिर्फ 2012 से संबंधित हैं।
लगातार अपमान और करियर को नुकसान पहुंचाने के आरोप
याचिकाकर्ता का आरोप है कि उसकी पूर्व पत्नी और उसके रिश्तेदारों ने उसकी दिव्यांगता को लेकर उसे बार-बार अपमानित किया। शिकायत के मुताबिक, पूर्व पत्नी ने उसे लगातार “लंगड़ा” कहकर संबोधित किया और ताने दिए कि एक दिव्यांग से शादी करके उसका जीवन बर्बाद हो गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि महिला और उसके परिवार ने झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी दी और विवाह विच्छेद के नाम पर 16 लाख रुपये की मांग की।
पीड़ित ने अदालत को बताया कि यह उत्पीड़न उसके पेशेवर जीवन तक भी पहुंच गया। आरोपियों ने उसके कार्यस्थल पर वरिष्ठ अधिकारियों और सहकर्मियों से संपर्क कर मानहानिकारक बातें कहीं, जिससे उसकी प्रतिष्ठा और करियर को नुकसान पहुंचे। इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने बताया कि 5 जुलाई 2025 को पूर्व पत्नी, उसकी मां और बहन ने उसकी विवाहित बहन की ससुराल जाकर जमकर हंगामा किया।
इस संबंध में पीड़ित ने 2012 की पुलिस शिकायतों के अलावा 4 अक्टूबर 2025 को दिल्ली के सीमापुरी थाने के एसएचओ को भी एक लिखित शिकायत सौंपी थी। उसका तर्क था कि 2016 में कानून लागू होने के बाद भी प्रताड़ना का यह सिलसिला जारी रहा, इसलिए बाद की घटनाओं की जांच इस कानून के तहत की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट का निर्देश और कानूनी उपाय
मामले में अदालत की सहायता कर रहीं एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) मंजीत आर्य ने अदालत के समक्ष माना कि 2012 के आरोप आरपीडब्ल्यूडी एक्ट के लागू होने से पहले के थे और शिकायत में विशिष्ट विवरणों की कमी थी। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि विशेष अदालत समन जारी करने से पहले गवाही दर्ज करके और अधिक जानकारी मांग सकती थी।
हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर 2025 के निचली अदालत के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को कानून के अनुसार नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया। जस्टिस जालान ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता मूल शिकायत दर्ज होने के बाद घटी घटनाओं के लिए अलग से नई शिकायत दर्ज कराने सहित कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्पों को अपनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने साफ किया कि उसकी टिप्पणियां केवल रिवीजन याचिका के निस्तारण तक सीमित हैं और इनका निचली अदालत के गुण-दोष आधारित अंतिम निर्णय पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।

