किसी मामले की पैरवी से पीछे हटने का दबाव बनाने के लिए वकील पर जानलेवा हमला किए जाने की घटना को अत्यंत गंभीर बताते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने वकीलों की सुरक्षा के लिए एक व्यापक कानून बनाए जाने की तात्कालिक आवश्यकता रेखांकित की है। बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस माधव जे. जामदार की एकल पीठ ने एक वकील के दफ्तर में घुसकर धमकी देने और धारदार हथियार से हमला कराने के आरोपी किरण माधवराव कहांडळ की अग्रिम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
आरोपी ने नासिक शहर के आडगांव पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध संख्या 229/2025 के सिलसिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 482 के तहत गिरफ्तारी से पूर्व जमानत की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) की धारा 109, 333, 351(3), 352 और 3(5) के तहत गंभीर अपराध दर्ज हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
प्राथमिकी (एफआईआर) के अनुसार, घटना 2 जुलाई 2025 की शाम 5:00 से 5:30 बजे के बीच की है। शिकायतकर्ता एडवोकेट रामेश्वर विट्ठल बोराडे छत्रपति संभाजीनगर हाईवे रोड, नासिक स्थित मांडसांगवी में सेंट्रल बैंक के पास अपने निजी कार्यालय में बैठे थे और मुवक्किल दिनकर टिळे से बात कर रहे थे। उसी दौरान तीन अज्ञात व्यक्ति बिना अनुमति उनके दफ्तर में घुस आए।
हमलावरों ने दफ्तर में रखा स्टूल उठाया, कंप्यूटर और अन्य सामान तोड़ दिया तथा एडवोकेट बोराडे को थप्पड़ मारे। गले में रुमाल बांधे सफेद शर्ट पहने एक हमलावर ने धारदार हथियार से दिनकर टिळे के बाएं हाथ पर वार किया। इसके बाद आरोपी ने “तुझे जान से खत्म कर दूंगा” कहते हुए एडवोकेट बोराडे के सिर पर उसी हथियार से हमला कर दिया। इस बीच दफ्तर के बाहर मोपेड पर बैठा उनका चौथा साथी लगातार हमलावरों को वकील को जान से मारने के लिए उकसा रहा था। वकील पर वार करने वाले आरोपियों में से एक, श्रुत नवनाथ कुलये, को मौके पर ही पकड़ लिया गया था।
रिकॉर्ड के मुताबिक, याचिकाकर्ता के पिता माधवराव रामचंद्र कहांडळ और गणपत दाते व अन्य के बीच एक सिविल और तीन आपराधिक मामले अदालत में लंबित हैं। शिकायतकर्ता वकील इन सभी मामलों में दाते परिवार की तरफ से पैरवी कर रहे थे। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि वकील पर इन मुकदमों से अपनी वकालत वापस लेने और पैरवी छोड़ने का भारी दबाव बनाया जा रहा था। जब वकील ने अपना कानूनी दायित्व निभाने से पीछे हटने से इनकार कर दिया, तो उनके साथ मारपीट और जानलेवा हमला किया गया।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील चैतन्य पेंडसे ने अदालत में दलील दी कि इस अपराध में उनके मुवक्किल की कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का नाम एफआईआर में दर्ज नहीं है और न ही वह घटना के समय मौके पर मौजूद था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को केवल एक सह-आरोपी (आदित्य कहांडळ) के बयान के आधार पर फंसाया गया है, और सह-आरोपी के बयान को अग्रिम जमानत के चरण में भी आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पी. कृष्ण मोहन रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2025) का हवाला दिया। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि भले ही याचिकाकर्ता के पिता का इस मामले से संबंध हो, लेकिन याचिकाकर्ता का इससे कोई लेना-देना नहीं है। इसके अलावा, वह बीएनएसएस की धारा 179 के तहत जारी नोटिस पर पुलिस स्टेशन में उपस्थित हुआ था और उसका मोबाइल फोन भी जब्त कर लिया गया था।
अग्रिम जमानत का कड़ा विरोध करते हुए राज्य की अतिरिक्त लोक अभियोजक (एपीपी) एस. एम. यादव और शिकायतकर्ता वकील की ओर से पेश वकील संजीव बी. देवरे ने चार्जशीट में दर्ज गवाह भालचंद्र भास्कर कहांडळ के बयान की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया। इसके साथ ही एपीपी ने स्पष्ट किया कि पुलिस ने याचिकाकर्ता का मोबाइल फोन जब्त नहीं किया है।
गवाह भालचंद्र भास्कर कहांडळ के बयान से यह तथ्य सामने आया कि जून 2025 के दूसरे हफ्ते में याचिकाकर्ता किरण कहांडळ ने उससे एडवोकेट बोराडे तक यह संदेश पहुंचाने को कहा था कि वह बातचीत के जरिए जमीन विवाद सुलझा लें। जब वकील ने कहा कि दोनों पक्ष खुद सीधे बात करके फैसला करें, तो दो दिन बाद किरण ने गवाह से साफ शब्दों में कहा: “रामेश्वर बोराडे को कहो कि वह हमारे सभी मामलों से जल्द से जल्द हट जाएं।” इस पर एडवोकेट बोराडे ने यह कहते हुए हटने से इनकार कर दिया कि वह केवल एक वकील के तौर पर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। इस बातचीत के कुछ ही दिनों बाद 2 जुलाई 2025 को वकील के दफ्तर में हमला कर दिया गया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
चार्जशीट में मौजूद सबूतों की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि गवाह भालचंद्र भास्कर कहांडळ के बयान से विरोधी पक्ष के वकील को धमकाने और हमला कराने के गंभीर अपराध में याचिकाकर्ता की प्रथम दृष्टया संलिप्तता पूरी तरह स्पष्ट होती है। पीठ ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता के पिता और अन्य आरोपियों के खिलाफ दायर चार्जशीट में भी उसकी भूमिका सामने आ चुकी थी और आगे की जांच में भी उसकी संलिप्तता उजागर हुई।
अग्रिम जमानत के कानूनी सिद्धांतों पर विचार करते हुए जस्टिस जामदार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय एक्स बनाम अरुण कुमार सी.के. (2022) 17 एससीसी 391 का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
“कानून को लेकर यह एक गंभीर भ्रांति प्रतीत होती है कि यदि अभियोजन पक्ष हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता साबित नहीं कर पाता, तो केवल वही अग्रिम जमानत देने का ठोस आधार बन जाता है। अग्रिम जमानत की अर्जी तय करते समय अन्य आधारों के साथ-साथ हिरासत में पूछताछ एक प्रासंगिक पहलू हो सकती है। ऐसे कई मामले हो सकते हैं जहां आरोपी से हिरासत में पूछताछ की जरूरत न हो, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आरोपी के खिलाफ बने प्रथम दृष्टया मामले की अनदेखी कर दी जाए और उसे अग्रिम जमानत दे दी जाए। अग्रिम जमानत की सुनवाई कर रही अदालत को सबसे पहले आरोपी के खिलाफ बने प्रथम दृष्टया मामले पर विचार करना चाहिए। इसके बाद अपराध की प्रकृति और सजा की गंभीरता को देखा जाना चाहिए। अग्रिम जमानत खारिज करने के आधारों में हिरासत में पूछताछ भी एक पहलू हो सकती है। हालांकि, केवल हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता न होना अपने आप में अग्रिम जमानत देने का आधार नहीं बन सकता।”
मामले की गंभीरता पर जस्टिस जामदार ने टिप्पणी की:
“यह बेहद गंभीर मामला है जहां एक वकील, जो पक्षकार का प्रतिनिधित्व कर रहा है और अदालत का अधिकारी है, उस पर कार्यवाही से हटने का दबाव बनाया गया और जब उसने ऐसा करने से इनकार किया, तो उस पर हमला कर दिया गया।”
हाईकोर्ट ने अधिवक्ताओं की सुरक्षा के मुद्दे पर जोर देते हुए आगे कहा:
“वास्तव में, यह मामला दर्शाता है कि अदालत के अधिकारी होने के नाते अधिवक्ताओं को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक व्यापक कानून बनाने की तत्काल आवश्यकता है।”
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी के पक्ष में अग्रिम जमानत देने का कोई औचित्य नहीं बनता है और उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: किरण माधवराव कहांडळ बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य
वाद संख्या: अग्रिम जमानत आवेदन संख्या 2558/2026
पीठ: जस्टिस माधव जे. जामदार
निर्णय की तिथि: 13 अक्टूबर 2026

