सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि अनुबंध की शर्तों में “या अन्यथा” (or otherwise) जैसे व्यापक शब्दों का उपयोग करते हुए ब्याज पर रोक लगाई गई हो, तो मध्यस्थता न्यायाधिकरण (आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल) के पास प्री-रेफरेंस और पेंडेंट लाइट ब्याज देने का कोई अधिकार नहीं है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मेसर्स शर्मा एंटरप्राइजेज द्वारा नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (एनबीसीसी) के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 31(7)(ए) के तहत पक्षों की आपसी सहमति (पार्टी ऑटोनॉमी) सर्वोपरि है और मध्यस्थ अनुबंध से बंधा होने के कारण अनुबंध की तय शर्तों के विपरीत जाकर फैसला सुनाए जाने से पहले की अवधि (प्री-अवार्ड) का ब्याज नहीं दे सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद तीन दशक से भी अधिक पुराना है। 11 जनवरी 1991 को एनबीसीसी ने न्यू बॉम्बे (वर्तमान में नवी मुंबई) स्थित वाशी रेलवे स्टेशन-सह-व्यावसायिक परिसर में फ्लोरिंग और क्लैडिंग कार्यों के निष्पादन के लिए मेसर्स शर्मा एंटरप्राइजेज को 9,50,73,603.20 रुपये का उप-अनुबंध (सब-कॉन्ट्रैक्ट) सौंपा था। यह कार्य दो वर्षों के भीतर पूरा किया जाना था, जिसकी निर्धारित तिथि 10 जनवरी 1993 तय की गई थी।
इस सब-कॉन्ट्रैक्ट का काम एनबीसीसी द्वारा नियुक्त अन्य मुख्य सिविल ठेकेदार, मेसर्स मोहिंदर सिंह एंड कंपनी के सिविल कार्यों पर निर्भर था। सिविल कार्यों में देरी के कारण अपीलकर्ता केवल सीमित हिस्से पर ही काम कर सका, हालांकि उसने 9 मई 1992 के उद्घाटन के लिए प्राथमिकता वाले प्लेटफॉर्म क्षेत्रों का कार्य समय पर पूरा कर दिया था। इसके बावजूद, 22 सितंबर 1992 को एनबीसीसी ने अनुबंध को समाप्त कर दिया और बाद में अपीलकर्ता की बैंक गारंटी भुना ली।
अपीलकर्ता द्वारा अनुबंध की विशेष शर्तों (एससीसी) के क्लॉज 10 के तहत मध्यस्थता शुरू करने के आग्रह के बाद भी जब एनबीसीसी ने मध्यस्थ नियुक्त नहीं किया, तो मामला अदालतों में पहुंचा। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 3 अगस्त 2011 को दोनों पक्षों के दावों और जवाबी दावों के निपटारे के लिए एक एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया।
28 जुलाई 2016 को मध्यस्थ ने अपना फैसला सुनाते हुए एनबीसीसी द्वारा अनुबंध की समाप्ति को अवैध और गलत ठहराया। ट्रिब्यूनल ने अपीलकर्ता के पक्ष में निम्नलिखित राहतें दीं:
- निष्पादित कार्य के लिए क्लेम संख्या 1(ए) के तहत 45,653.15 रुपये;
- अतिरिक्त मदों के लिए क्लेम संख्या 1(बी) के तहत 26,03,465 रुपये;
- बैंक गारंटी विस्तार शुल्क के लिए क्लेम संख्या 2 के तहत 2,77,500 रुपये;
- भुनाई गई बैंक गारंटी की वापसी के लिए क्लेम संख्या 3 के तहत 19,01,480 रुपये;
- मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में क्लेम संख्या 6 के तहत 5,00,000 रुपये; तथा
- क्लेम संख्या 7 के तहत खर्चों को छोड़कर सभी स्वीकृत राशियों पर 22 सितंबर 1992 से वास्तविक भुगतान तक 10 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज, जिसमें प्री-रेफरेंस, पेंडेंट लाइट और पोस्ट-अवार्ड तीनों अवधियां शामिल थीं।
वर्ष 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इस मामले में 1996 का अधिनियम ही लागू होगा। इसके बाद एनबीसीसी ने दिल्ली हाईकोर्ट में धारा 34 के तहत फैसले को चुनौती दी। 19 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने मूल दावों को बरकरार रखा, लेकिन एससीसी के क्लॉज 26 का हवाला देते हुए प्री-रेफरेंस और पेंडेंट लाइट ब्याज को रद्द कर दिया। 20 मार्च 2026 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपीलकर्ता की धारा 37 के तहत दायर अपील खारिज कर दी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि एससीसी का क्लॉज 26 केवल मासिक बिलों के भुगतान में देरी या बकाया राशि रोके जाने से संबंधित है। इसे पेंडेंट लाइट ब्याज पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने ‘एजुसडेम जेनेरिस’ और ‘नोसिटुर ए सोसिएस’ के वैधानिक व्याख्या सिद्धांतों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि “या अन्यथा” शब्दों का अर्थ उससे ठीक पहले लिखे शब्दों (रोके गए भुगतानों) के संदर्भ में ही निकाला जाना चाहिए।
अपीलकर्ता ने ओएनजीसी बनाम जीएंडटी बेकफील्ड ड्रिलिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, फेरो कंक्रीट कंस्ट्रक्शन (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड बनाम राजस्थान राज्य और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मध्यस्थ से पेंडेंट लाइट ब्याज देने का वैधानिक अधिकार छीनने के लिए अनुबंध में बिल्कुल स्पष्ट और प्रत्यक्ष रोक होनी चाहिए, जो कि इस मामले में नहीं थी।
इसके विपरीत, एनबीसीसी की ओर से पेश अधिवक्ता शिल्पी चौधरी ने दलील दी कि धारा 31(7)(ए) की शुरुआत ही “जब तक पक्षों द्वारा अन्यथा सहमति न हो” शब्दों से होती है, जिसका अर्थ है कि मध्यस्थ का विवेकाधिकार अनुबंध की शर्तों के अधीन है। उन्होंने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मनराज एंटरप्राइजेज, जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड बनाम टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (इंडिया) लिमिटेड, यूनियन ऑफ इंडिया बनाम ब्राइट पावर प्रोजेक्ट्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड और लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड का संदर्भ देते हुए कहा कि “या अन्यथा” शब्द स्वतंत्र है और ‘या’ शब्द से अलग किया गया है। इसलिए इसका दायरा व्यापक है और अनुबंध के इस स्पष्ट निषेध को सीमित करने के लिए ‘एजुसडेम जेनेरिस’ का नियम लागू नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का विश्लेषण
1996 के अधिनियम की धारा 28(3) और धारा 31(7)(ए) का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि फैसला आने से पहले की अवधि के लिए ब्याज देने की शक्ति पूरी तरह से पक्षों की आपसी सहमति पर निर्भर करती है:
“अधिनियम की धारा 28(3) और धारा 31(7)(ए) के अवलोकन से स्पष्ट है कि यह वैधानिक ढांचा स्वयं मध्यस्थ के विवेकाधिकार को ब्याज से संबंधित अनुबंध के प्रावधानों के अधीन रखता है।”
कोर्ट ने पुनः दोहराया कि मध्यस्थ अनुबंध का ही सृजन होता है, इसलिए यदि समझौते में रोक लगी है तो वह निष्पक्षता या औचित्य के आधार पर भी ब्याज नहीं दे सकता:
“एक बार जब ठेकेदार इस बात पर सहमत हो जाता है कि वह अनुबंध के तहत देय राशियों पर ब्याज का हकदार नहीं होगा, जिसमें बयाना राशि और सुरक्षा जमा पर ब्याज भी शामिल है, जैसा कि पक्षों के बीच समझौते/अनुबंध के क्लॉज 16(2) में उल्लिखित है, तो मध्यस्थता कार्यवाही में अनुबंध का सृजन होने के नाते मध्यस्थ के पास पक्षों के बीच हुए समझौते/अनुबंध की शर्तों के विपरीत और विचाराधीन समझौते/अनुबंध के क्लॉज 16(2) के विपरीत ब्याज देने का कोई अधिकार नहीं है।”
अपीलकर्ता द्वारा दिए गए ‘एजुसडेम जेनेरिस’ के तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने माना कि क्लॉज 26 में “या अन्यथा” से पहले आने वाले शब्द किसी एक विशिष्ट श्रेणी या वर्ग का निर्माण नहीं करते हैं, बल्कि वे ‘या’ शब्द से स्वतंत्र रूप से जुड़े हैं। लीलावती बाई बनाम बॉम्बे राज्य के संविधान पीठ के निर्णय का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि “या अन्यथा” शब्द विस्तार के लिए होते हैं, न कि सीमा तय करने के लिए:
“इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि एजुसडेम जेनेरिस का नियम व्याख्या का एक साधन है और यह केवल तभी लागू होता है जब सामान्य शब्द किसी विशिष्ट वर्ग या श्रेणी का अनुसरण करते हैं। क्लॉज 16(3) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति ‘अनुबंध के तहत ठेकेदार को देय राशियां’ स्वतंत्र, विशिष्ट और व्यापक दायरे वाली है, और इसके सीधे अर्थ को विफल करने के लिए इसे सीमित नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने ओएनजीसी बनाम जीएंडटी बेकफील्ड ड्रिलिंग सर्विसेज मामले से वर्तमान मामले को अलग बताया और टिप्पणी की कि एनबीसीसी के अनुबंध में प्रयुक्त अवशिष्ट शब्द “या अन्यथा” का वही कानूनी प्रभाव है जो सईद अहमद एंड कंपनी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड में व्याख्यायित किए गए वाक्यांश “या किसी अन्य मामले में जो कुछ भी हो” का था।
इसके अलावा, पीठ ने धारा 31(7)(ए) के तहत प्री-अवार्ड ब्याज और धारा 31(7)(बी) के तहत पोस्ट-अवार्ड ब्याज के बीच के वैधानिक अंतर को भी स्पष्ट किया:
“इसलिए क्लॉज (बी), क्लॉज (ए) के बिल्कुल विपरीत है और पक्षों की आपसी सहमति के अधीन नहीं है। दूसरे शब्दों में, क्लॉज (बी) पक्षों को फैसले के बाद की अवधि के लिए ब्याज से ‘अनुबंध के जरिए बाहर निकलने’ का अधिकार नहीं देता है। धारा 31(7)(बी) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति ‘जब तक कि निर्णय में अन्यथा निर्देश न दिया गया हो’ ब्याज की दर से संबंधित है, न कि ब्याज की पात्रता से।”
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मध्यस्थ ने एससीसी के क्लॉज 26 का उल्लंघन करते हुए प्री-रेफरेंस और पेंडेंट लाइट ब्याज देकर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर काम किया था। हाईकोर्ट द्वारा मूल दावों और फैसले के बाद के ब्याज को बरकरार रखते हुए केवल फैसला आने से पहले के ब्याज को रद्द करने के आदेश में कोई त्रुटि नहीं पाते हुए पीठ ने अपील को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मेसर्स शर्मा एंटरप्राइजेज बनाम नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 13782 / 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 17072 / 2026 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 15 अक्टूबर 2026

