बॉम्बे हाईकोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी द्वारा अपने एक पूर्व कर्मचारी को नौकरी से निकाले जाने के 11 साल पुराने फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ किया कि अगर कोई कर्मचारी गंभीर बीमारी की वजह से लंबे समय तक दफ्तर नहीं आ पाता है, तो इसे अपनी मर्जी से सेवा छोड़ना (एबेंडनमेंट ऑफ सर्विस) नहीं कहा जा सकता। अदालत ने सार्वजनिक क्षेत्र की इस बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह 36 साल तक सेवा देने वाले इस कर्मचारी के सभी रिटायरमेंट लाभ, जिनमें पेंशन और भविष्य निधि (पीएफ) का बकाया शामिल है, तुरंत जारी करे।
जस्टिस आर आई छागला और जस्टिस फिरदौस पी पूनीवाला की खंडपीठ ने यह फैसला उस याचिका पर सुनाया, जिसमें 8 अप्रैल 2013 के बर्खास्तगी आदेश को चुनौती दी गई थी। बीमा कंपनी ने बिना कोई नया नोटिस दिए या बिना किसी आंतरिक जांच के कर्मचारी को 600 दिनों से अधिक समय तक अनुपस्थित रहने के आधार पर हटा दिया था। कर्मचारी ने कंपनी के अपीलीय प्राधिकरण के सामने भी गुहार लगाई थी, लेकिन 5 जून 2017 को वहां से भी उसकी अपील खारिज हो गई थी। हाईकोर्ट ने कंपनी को यह भी आदेश दिया कि कर्मचारी ने जितनी अवधि के दौरान वास्तव में काम किया था और वह छुट्टी पर नहीं था, उस समय का बकाया वेतन भी उसे दिया जाए।
नौकरी छोड़ने की कानूनी व्याख्या
12 अक्टूबर को आए अपने फैसले में खंडपीठ ने रेखांकित किया कि सिर्फ लंबे समय तक काम पर न आने के आधार पर यह मान लेना गलत है कि कर्मचारी ने नौकरी छोड़ दी है। पीठ ने कहा कि किसी कर्मचारी द्वारा स्वेच्छा से पद त्याग साबित करने के लिए नियोक्ता के पास ठोस साक्ष्य होने चाहिए, जिससे यह साफ झलके कि कर्मचारी ने दोनों पक्षों के सेवा संबंध को स्थायी रूप से खत्म करने का स्पष्ट, अचूक और सचेत इरादा बना लिया था।
अदालत ने कहा कि जब कोई वास्तविक बीमारी के कारण अनुपस्थित रहता है, लगातार प्रबंधन को अपनी स्थिति की जानकारी देता है और अपने सेवा अधिकारों की मांग करता रहता है, तो उसे कभी भी पद का स्वैच्छिक त्याग नहीं ठहराया जा सकता।
स्थानांतरण और बिगड़ती सेहत का विवाद
याचिकाकर्ता ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी में बतौर डेवलपमेंट ऑफिसर अपने करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद उसने सहायक प्रशासनिक अधिकारी और सहायक प्रबंधक जैसे कई पदों पर काम किया और मुंबई में 36 वर्षों तक बेदाग सेवा रिकॉर्ड बनाए रखा।
समस्या की शुरुआत साल 2005-06 के दौरान हुई, जब वह कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहा था और उसे मुंबई के विशेषज्ञ डॉक्टरों से इलाज की जरूरत थी। इसी दौरान कंपनी ने उसका तबादला मुंबई से गुजरात के वापी में कर दिया। वह वहां पदभार संभाल पाता, इससे पहले ही उसका ट्रांसफर पुणे कर दिया गया। पुणे क्षेत्रीय कार्यालय में करीब 15 दिन काम करने के बाद उसे दोबारा पिंपरी मंडल कार्यालय भेज दिया गया।
साल 2006 में पिंपरी दफ्तर में वह अचानक बेहोश होकर गिर पड़ा और उसे सांस लेने में भारी तकलीफ हुई। स्वास्थ्य ज्यादा बिगड़ने के कारण वह नियमित रूप से काम पर जाने में असमर्थ हो गया। कर्मचारी ने लगातार कंपनी को अपनी बीमारी से अवगत कराते हुए मेडिकल लीव की मांग की।
जांच रिपोर्ट छिपाई, फिर सीधे सेवा से हटाया
बीमारी की सत्यता जांचने के लिए बीमा कंपनी ने एक सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) को नियुक्त किया था। जांच अधिकारी मुंबई स्थित कर्मचारी के घर पहुंचा, जहां उसने उसे बिस्तर पर लाचार पाया और अस्पताल पहुंचाने में मदद भी की। सेवानिवृत्त एसीपी ने बाद में कंपनी को अपनी रिपोर्ट सौंप दी, लेकिन याचिकाकर्ता का आरोप था कि यह जांच रिपोर्ट उसे कभी दिखाई ही नहीं गई।
इसके बाद 8 अप्रैल 2013 को कंपनी ने 600 से अधिक दिनों तक अनुपस्थित रहने का हवाला देकर उसे सेवा त्यागने का दोषी ठहराया और बर्खास्त कर दिया।
सेवा में बने रहने का लगातार प्रयास
अदालत ने दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद पाया कि कर्मचारी लगातार मेडिकल आधार पर मुंबई ट्रांसफर मांग रहा था, विशेषज्ञ अस्पतालों के मेडिकल सर्टिफिकेट जमा कर रहा था और यात्रा न कर पाने की वजह से विभागीय जांच मुंबई में कराने की गुहार लगा रहा था। यहां तक कि उसने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीएसएस) के तहत भी आवेदन किया था।
अदालत ने पाया कि कर्मचारी का यह सारा आचरण यह दिखाता है कि वह लगातार सेवा में बने रहने का इच्छुक था, न कि नौकरी छोड़ने का।
लोन डिफॉल्ट को बर्खास्तगी का आधार नहीं माना जा सकता
कंपनी ने अदालत के सामने यह दलील भी रखी थी कि कर्मचारी ने कंपनी से लिए गए होम लोन और व्हीकल लोन की अदायगी में चूक की है और वह आदतन डिफॉल्टर है, इसलिए उसकी याचिका खारिज की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कंपनी की यह दलील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि गृह ऋण या वाहन ऋण चुकाने में डिफॉल्ट होना उस याचिका को खारिज करने की वजह नहीं बन सकता, जिसमें गैरकानूनी तरीके से सेवा से हटाए जाने को चुनौती दी गई है। इसके साथ ही अदालत ने बर्खास्तगी आदेश और अपीलीय प्राधिकरण के फैसले को दरकिनार करते हुए कर्मचारी को राहत प्रदान की।

