अवमानना मामलों में पारित अंतरिम आदेशों के खिलाफ उपलब्ध कानूनी उपचार पर स्थिति स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि सिंगल जज द्वारा अवमानना याचिका में दिया गया कोई आदेश विवाद के मूल मेरिट में प्रवेश करता है या पक्षों के substantive अधिकारों का निर्धारण करता है, तो उसके खिलाफ हाईकोर्ट में ही इंट्रा-कोर्ट अपील (डिवीजन बेंच के समक्ष विशेष अपील) दायर की जा सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल अवमानना की कार्यवाही अपने आप में एक विशिष्ट (sui generis) प्रकृति की होती है और इसे आपराधिक क्षेत्राधिकार के समान नहीं माना जा सकता, जिससे कि इंट्रा-कोर्ट अपील पर वैधानिक रोक आकर्षित हो।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राम किशन फौजी बनाम हरियाणा राज्य (2017) में दिए गए तीन जजों की पीठ के फैसले की सत्यता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया। उस फैसले में कहा गया था कि यदि किसी रिट याचिका की जड़ें आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़ी हों, तो उसमें सिंगल जज के आदेश के खिलाफ इंट्रा-कोर्ट अपील नहीं की जा सकती। पीठ ने माना कि यह व्याख्या न्याय तक पहुंच के अधिकार को बाधित करती है और नागरिकों के लिए अनुचित असमानता पैदा करती है। इसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने राम किशन फौजी के फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामले को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के समक्ष बड़ी पीठ के गठन हेतु भेज दिया और अपीलकर्ता को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष विशेष अपील दाखिल करने की छूट प्रदान की।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद सहायक अभियोजन अधिकारी (एपीओ) के पदों पर भर्ती से संबंधित एक सेवा विवाद से शुरू हुआ था। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के एक सिंगल जज ने 28 जुलाई 2020 के एक आधिकारिक ज्ञापन और 14 अगस्त 2020 के अनुवर्ती आदेश को रद्द करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे रिट याचिकाकर्ताओं (प्रतिवादियों) की उम्मीदवारी पर विचार करें।
उस निर्देश के तथाकथित अनुपालन में सक्षम प्राधिकारी (अपीलकर्ता) ने 2 सितंबर 2026 को एक आदेश पारित कर प्रतिवादियों की उम्मीदवारी खारिज कर दी और इसे अनुपालन हलफनामे के माध्यम से हाईकोर्ट के समक्ष रिकॉर्ड पर रखा।
हालांकि, प्रतिवादियों द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए सिंगल जज ने 3 सितंबर 2026 को अनुपालन हलफनामे को खारिज कर दिया। सिंगल जज ने यह टिप्पणी की कि राज्य सरकार अभी भी प्रतिवादियों को नियुक्त करने के लिए बाध्य है। इसके साथ ही अवमानना याचिका को 17 सितंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध करते हुए यह निर्देश दिया कि यदि रिट कोर्ट के आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो अपर मुख्य सचिव (गृह विभाग) आगे की कार्यवाही, जिसमें आरोप तय करना भी शामिल है, के लिए व्यक्तिगत रूप से पेश हों। सिंगल जज के इसी अंतरिम निर्देश से क्षुब्ध होकर अपीलकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) श्री नटराज ने दलील दी कि जब रिट कोर्ट के निर्देश के अनुपालन में एक बार आदेश पारित कर दिया गया, तो अवमानना क्षेत्राधिकार के तहत उस आदेश की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती थी। जे.एस. परिहार बनाम गणपत दुग्गर और ललित माथुर बनाम एल. महेश्वरा राव मामलों का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि अनुपालन में जारी आदेश सही है या गलत, इसकी जांच अवमानना अदालत में नहीं हो सकती; यदि कोई पक्ष इससे व्यथित है, तो उसके पास नई रिट याचिका दाखिल करने का ही एकमात्र उपाय होता है। उन्होंने नियाज मोहम्मद बनाम हरियाणा राज्य, कपिलदेव प्रसाद साह बनाम बिहार राज्य और अशोक पेपर कामगार यूनियन बनाम धरम गोधा के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सिविल अवमानना के लिए जानबूझकर और इरादतन अवज्ञा साबित होनी चाहिए, जबकि सिंगल जज ने अवमानना के दबाव में ऐसा अनुतोष प्रदान करने की ओर कदम बढ़ाया जो मूल रिट कोर्ट ने भी नहीं दिया था।
जब सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पूछा कि क्या इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स, 1952 के तहत इस अंतरिम आदेश के खिलाफ डिवीजन बेंच के समक्ष विशेष अपील दायर हो सकती थी, तो श्री नटराज ने नकारात्मक उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि चूंकि यह आदेश सजा देने वाला नहीं है, इसलिए अवमानना अदालत अधिनियम, 1971 की धारा 19 के तहत वैधानिक अपील लागू नहीं होती। इसके अलावा, उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स के चैप्टर VIII के रूल 5 का हवाला देकर तर्क दिया कि यह नियम आपराधिक क्षेत्राधिकार के प्रयोग से उत्पन्न आदेशों के खिलाफ विशेष अपील को रोकता है। उनका तर्क था कि अवमानना की कार्यवाही अर्ध-आपराधिक (quasi-criminal) प्रकृति की होती है, इसलिए डिवीजन बेंच के सामने कोई विशेष अपील नहीं चल सकती। मिदनापुर पीपुल्स को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम चुन्नीलाल नंदा, अजय कुमार भल्ला बनाम प्रकाश कुमार दीक्षित और सुभाष चंद्रा बनाम श्रीकांत गोस्वामी के फैसलों पर निर्भर रहते हुए उन्होंने दलील दी कि अनुच्छेद 136 के तहत केवल सुप्रीम कोर्ट आना ही एकमात्र कानूनी विकल्प था।
चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने सिंगल जज के आदेश के तथ्यात्मक मेरिट में प्रवेश न करते हुए केवल इस प्रश्न पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया कि क्या इंट्रा-कोर्ट अपील का रास्ता उपलब्ध था, इसलिए प्रतिवादियों के वकील से इस पर जवाब नहीं मांगा गया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत अवमानना शक्तियों की संवैधानिक रूपरेखा का परीक्षण किया और एस.ए.एल. नारायण राव बनाम ईश्वरलाल भगवानदास तथा पी. मोहनराज बनाम शाह ब्रदर्स इस्पात प्राइवेट लिमिटेड के फैसलों पर भरोसा जताया। कोर्ट ने कहा कि सिविल अवमानना क्षेत्राधिकार ‘सुई जेनेरिस’ (अपनी ही तरह का अनूठा) है और यह किसी दंडात्मक कानून के तहत आपराधिक मुकदमा चलाने के बजाय अदालती आदेशों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए ‘विशेष सिविल क्षेत्राधिकार’ के रूप में काम करता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स के चैप्टर VIII के रूल 5 के तहत आपराधिक क्षेत्राधिकार वाले प्रतिबंध पर स्थिति स्पष्ट करते हुए पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“उपर्युक्त संदर्भ में, अवमानना के अर्ध-आपराधिक (क्वासी-क्रिमिनल) होने का अर्थ यह है कि यह दोषसिद्धि और सजा के परिणामों में आपराधिक कानून से मिलता-जुलता है, लेकिन यह वास्तव में कोई आपराधिक मुकदमा नहीं है। यह मुकदमा न तो भारतीय दंड संहिता, 1860 / भारतीय न्याय संहिता, 2023 या अन्य दंडात्मक कानूनों के तहत दंडनीय किसी अपराध के लिए है, और न ही दोष का निर्धारण दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 या अन्य प्रक्रियात्मक कानूनों में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है।”
मिदनापुर पीपुल्स को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम चुन्नीलाल नंदा के सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन परिस्थितियों को सूचीबद्ध किया जहां अवमानना कार्यवाही के दौरान सिंगल जज द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ इंट्रा-कोर्ट अपील विचारणीय होती है:
- ऐसा आदेश जो किसी ऐसे पक्ष को निर्देश जारी करता है जो मूल आदेश से बाध्य नहीं था या रिट याचिका में पक्षकार नहीं था (सिवाय तब जब वह मूल प्रतिवादी के स्थान पर आया हो);
- ऐसा आदेश जो अनुपालन में जारी किए गए आदेश की वैधता या शुद्धता की जांच करके उसे खारिज कर देता है और दोबारा अनुपालन का निर्देश देता है;
- ऐसा आदेश जो मूल आदेश की सीमाओं से आगे निकलकर ऐसा अनुतोष प्रदान करता है जो मूल रूप से दिया ही नहीं गया था; तथा
- ऐसा आदेश जो कानून या तथ्यों के विवादित प्रश्नों का ऐसा निपटारा करता है जिससे पक्षों के वास्तविक और सारभूत (substantive) अधिकारों का अंतिम निर्धारण होता हो।
इसके बाद पीठ ने राम किशन फौजी बनाम हरियाणा राज्य में तय किए गए सिद्धांत पर गहरी असहमति जताई, जिसमें माना गया था कि यदि रिट याचिका का मूल विषय आपराधिक कानून से जुड़ा है, तो उसमें अनुच्छेद 226 का प्रयोग आपराधिक क्षेत्राधिकार माना जाएगा और इंट्रा-कोर्ट अपील खारिज हो जाएगी। आपराधिक मामले, आपराधिक कार्यवाही और आपराधिक क्षेत्राधिकार के अंतर को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“अनुच्छेद 226 सीधे और स्पष्ट शब्दों में एक एकल, मूल, विशेष और असाधारण संवैधानिक क्षेत्राधिकार प्रदान करता है। यह क्षेत्राधिकार न तो सिविल है और न ही आपराधिक, बल्कि ‘सुई जेनेरिस’ (अपनी प्रकृति में अद्वितीय) है। यह भी विचारणीय है कि किसी हाईकोर्ट या इस अदालत के समक्ष रिट याचिकाओं को ‘सिविल’ या ‘आपराधिक’ के रूप में केवल वर्गीकृत या आवंटित कर देना, अपने आप में अनुच्छेद 226 के तहत प्रयुक्त क्षेत्राधिकार की प्रकृति निर्धारित करने का कोई सैद्धांतिक आधार नहीं बनता।”
सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि यदि आपराधिक पृष्ठभूमि वाली याचिकाओं में इंट्रा-कोर्ट अपील का दरवाजा बंद कर दिया जाता है, तो नागरिकों को अनुच्छेद 21 के तहत अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सीधे दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 136 के तहत गुहार लगानी पड़ती है। पीठ ने अनीता कुशवाहा बनाम पुष्प सूदन मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय तक आसान पहुंच संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का एक अभिन्न अंग है। देश के दूरदराज हिस्सों से दिल्ली आकर भारी खर्च वहन करना हर नागरिक के लिए संभव नहीं है, और ऐसी पाबंदी न्याय तक पहुंच को नुकसान पहुंचाती है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने सिंगल जज के अंतरिम आदेश की वैधता पर मेरिट के आधार पर कोई भी राय व्यक्त करने से इनकार कर दिया और अपीलकर्ता को हाईकोर्ट के भीतर ही उपलब्ध इंट्रा-कोर्ट अपील के उपचार का उपयोग करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने अपीलकर्ता को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष दो सप्ताह के भीतर विशेष अपील दायर करने की अनुमति दी और डिवीजन बेंच को निर्देश दिया कि वह कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर इस पर विचार करे।
इस कानूनी उपचार को प्रभावी बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सिंगल जज के समक्ष लंबित अवमानना की कार्यवाही पर दो महीने की अवधि के लिए रोक लगा दी।
इसके साथ ही पीठ ने राम किशन फौजी के फैसले की शुद्धता से जुड़े विधिक प्रश्नों को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के पास भेज दिया ताकि इस पर विचार के लिए एक उचित बड़ी पीठ का गठन किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तैयार किए गए संदर्भ प्रश्न इस प्रकार हैं:
“क्या राम किशन फौजी बनाम हरियाणा राज्य (2017) 5 एससीसी 533 का निर्णय, ऊपर उल्लिखित संविधान के अनुच्छेद 226 द्वारा प्रदत्त क्षेत्राधिकार की प्रकृति के आलोक में, विभिन्न हाईकोर्ट्स को नियंत्रित करने वाले लेटर्स पेटेंट में वर्णित इंट्रा-कोर्ट अपीलों की पोषणीयता की सही व्याख्या करता है? क्या यह अनुपात लेटर्स पेटेंट या संविधान के निर्माताओं द्वारा अकल्पित अनुच्छेद 226 में विभाजन पैदा करने के अलावा, प्रभावी रूप से इंट्रा-कोर्ट अपीलीय स्तर पर न्याय तक उचित पहुंच को समाप्त नहीं करता है? क्या इस राय के पैराग्राफ 49 से 51 में की गई चर्चाओं के मद्देनजर राम किशन फौजी (उपर्युक्त) के निर्णय पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए?”
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: संजय प्रसाद बनाम मधुसूदन द्विवेदी एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… / 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 33319 / 2026 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर 2026

