प्रवेश के समय स्पष्टता के बिना बीच सत्र में प्रोफेशनल कॉलेजों की फीस नहीं बदली जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि किसी प्रोफेशनल एजुकेशन कोर्स की शुरुआत में तय की गई फीस में आमतौर पर बीच सत्र (कोर्स के दौरान) बदलाव नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारियों और फीस निर्धारण समितियों को छात्र के प्रवेश लेने से पहले ही पूरे कोर्स की अवधि के लिए देय फीस अधिसूचित कर देनी चाहिए। जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस अंतिम निष्कर्ष को बरकरार रखा, जिसने 16 अक्टूबर 2023 की सरकारी अधिसूचना से पहले पश्चिम बंगाल के अंडरग्रेजुएट इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने वाले छात्रों पर थोपी गई फीस वृद्धि को रद्द कर दिया था। शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि फीस निर्धारण में एक ओर छात्रों और अभिभावकों के वित्तीय निश्चितता के वैध हित हैं, तो दूसरी ओर गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए सेल्फ-फाइनेंसिंग उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआई) की वित्तीय संसाधन जुटाने की आवश्यकता है। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है, और फीस निर्धारण समितियों को अपने वैधानिक सार्वजनिक कर्तव्यों का निर्वहन संस्थागत दक्षता के साथ करना चाहिए।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद शैक्षणिक सत्र 2023–24 (2023–27 बैच) के लिए अंडरग्रेजुएट इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल संयुक्त प्रवेश परीक्षा (डब्ल्यूबीजेईई) और जेईई (मेन) की मेरिट रैंकिंग के आधार पर, पश्चिम बंगाल संयुक्त प्रवेश परीक्षा बोर्ड ने जुलाई और अगस्त 2023 के बीच केंद्रीकृत काउंसलिंग आयोजित की थी। मौलाना अबुल कलाम आजाद प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (मकाउत) से संबद्ध एक स्व-वित्तपोषित निजी संस्थान, डॉ. बी.सी. रॉय इंजीनियरिंग कॉलेज में छात्रों ने सितंबर 2023 में अपनी प्रवेश प्रक्रिया पूरी की और फीस जमा की।

कॉलेज के प्रॉस्पेक्टस में चार साल के पाठ्यक्रम के लिए सेमेस्टर-वार फीस संरचना दी गई थी। साथ ही इसमें एक शर्त भी शामिल थी कि “सरकार के निर्णय के अनुसार फीस संरचना में समय-समय पर बदलाव किया जा सकता है।”

प्रवेश प्रक्रिया समाप्त होने के लगभग डेढ़ महीने बाद, 16 अक्टूबर 2023 को पश्चिम बंगाल सरकार के उच्च शिक्षा विभाग ने अधिसूचना संख्या 466-Edn-(T)/10M-04/2004 (पार्ट IV) जारी की। इस अधिसूचना के जरिए निजी सेल्फ-फाइनेंसिंग प्रोफेशनल कॉलेजों द्वारा ली जाने वाली फीस की अधिकतम सीमा को बढ़ाकर 1,10,000 रुपये प्रति वर्ष प्रति छात्र कर दिया गया। इसके अलावा, कॉलेजों को 15 प्रतिशत तक विकास शुल्क (डेवलपमेंट फीस) वसूलने की भी अनुमति दी गई। अधिसूचना में कहा गया कि बी.टेक और बी.फार्मा पाठ्यक्रमों के लिए यह संशोधित ढांचा शैक्षणिक सत्र 2023–24 से कम से कम चार वर्षों तक लागू रहेगा।

यह संशोधन 15 नवंबर 2019 को गठित एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर किया गया था, जिसे फीस संरचना समिति ने 9 जून 2023 को स्वीकार किया था। राज्य में यह बदलाव शैक्षणिक सत्र 2016–17 के बाद, यानी सात वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आया था।

इस सरकारी अधिसूचना के आधार पर कॉलेज ने 15 दिसंबर 2023 को एक नोटिस जारी किया। इसके तहत जनवरी 2024 (दूसरे सेमेस्टर) से ट्यूशन फीस में भारी वृद्धि कर दी गई और एक नया विकास शुल्क भी जोड़ दिया गया। इस संशोधन से प्रत्येक छात्र की कुल फीस में 37.5 प्रतिशत की सीधी बढ़ोतरी हो गई। इस फैसले से व्यथित होकर छात्रों ने पहले कॉलेज प्रबंधन को ज्ञापन सौंपकर बढ़ोतरी वापस लेने की मांग की और बाद में राहत न मिलने पर कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कानूनी प्रक्रिया: सिंगल जज और खंडपीठ का रुख

हाईकोर्ट के समक्ष छात्रों ने अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (व्यावसायिक कॉलेजों में फीस के मानदंड और दिशा-निर्देश तथा प्रवेश दिशा-निर्देश) विनियम, 1994 (एआईसीटीई विनियम 1994) के विनियम 7 का हवाला दिया। छात्रों ने अपनी चुनौती को केवल इस बिंदु तक सीमित रखा कि 16 अक्टूबर 2023 की अधिसूचना उन छात्रों पर लागू नहीं हो सकती जो इस तारीख से पहले ही दाखिला ले चुके थे।

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हाईकोर्ट के सिंगल जज ने 15 जनवरी 2026 को छात्रों की रिट याचिकाएं खारिज कर दीं। सिंगल जज ने माना कि नियमों के तहत फीस संरचना अविभाज्य नहीं है, कॉलेज प्रॉस्पेक्टस में सरकारी निर्णयों के अनुसार फीस बदलने का अधिकार सुरक्षित रखा गया था और संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्टुअल) दायित्वों से बचने के लिए रिट क्षेत्राधिकार का सहारा नहीं लिया जा सकता।

इसके बाद छात्रों ने हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपील दायर की। खंडपीठ ने 23 मार्च 2026 को सिंगल जज के आदेश को पलट दिया। खंडपीठ ने माना कि एआईसीटीई विनियम 1994 का विनियम 7(7) पूरे कोर्स के लिए एकमुश्त (एन ब्लॉक) फीस तय करने की परिकल्पना करता है। खंडपीठ ने सरकारी अधिसूचना की व्याख्या को सीमित करते हुए स्पष्ट किया कि यह केवल 16 अक्टूबर 2023 को या उसके बाद प्रवेश लेने वाले छात्रों पर ही लागू होगी। कोर्ट ने कहा कि पहले से प्रवेश ले चुके छात्रों पर इस संशोधन को लागू करना अधिसूचना को अनुचित पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव देना होगा। साम्या (इक्विटी) और प्रॉमिसरी एस्टॉपेल के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए खंडपीठ ने 16 अक्टूबर 2023 से पहले नामांकित छात्रों के लिए संशोधित फीस नोटिस को रद्द कर दिया और कॉलेज को निर्देश दिया कि वह अतिरिक्त वसूली गई राशि वापस करे या आगामी फीस में समायोजित करे।

इस फैसले के खिलाफ कॉलेज और एसोसिएशन ऑफ प्रोफेशनल एकेडमिक इंस्टीट्यूट्स, वेस्ट बंगाल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता कॉलेजों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता हारिन रावल और वरिष्ठ अधिवक्ता रऊफ रहीम पेश हुए, जबकि प्रतिवादी छात्रों का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता संजय आर. हेगड़े ने रखा।

कॉलेजों की ओर से तर्क दिया गया कि सेल्फ-फाइनेंसिंग निजी संस्थानों को संचालन, आवर्ती (रेकरिंग) और विकासात्मक खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधनों की जरूरत होती है। उन्होंने इसके लिए प्रवेश विवरणिका (प्रॉस्पेक्टस) की शर्त और राज्य सरकार की अधिसूचना पर भरोसा जताया। वहीं, छात्रों की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने प्रवेश के समय घोषित फीस संरचना के आधार पर ही दाखिला लिया था। बीच सत्र में अप्रत्याशित फीस वृद्धि से उन पर भारी वित्तीय बोझ पड़ा है, जो एआईसीटीई के वैधानिक मानदंडों के पूरी तरह विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और सिद्धांत

फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेशनल शिक्षा के क्षेत्र में परस्पर विरोधी हितों के टकराव को रेखांकित किया। परिवारों की आर्थिक स्थिति पर विचार करते हुए पीठ ने राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के सर्वेक्षण आंकड़ों का हवाला दिया, जिसमें सामने आया था कि परिवार सामान्य पाठ्यक्रमों की तुलना में प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों पर कहीं अधिक खर्च करते हैं और इसमें सबसे बड़ा हिस्सा फीस का होता है।

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अदालत ने टिप्पणी की:

“अधिकांश परिवारों के लिए, किसी प्रोफेशनल कोर्स की फीस परिवार की आय और बचत का एक बड़ा हिस्सा होती है; यह कोई सामान्य या आकस्मिक खर्च नहीं है। माता-पिता इस उम्मीद और आकांक्षा के साथ प्रोफेशनल कोर्स की फीस का प्रबंध करते हैं कि उनके बच्चे बेहतर योग्यता हासिल करेंगे, बेहतर अवसर पाएंगे और अपने वर्तमान से कहीं अधिक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकेंगे।”

कोर्ट ने आर्थिक अनिश्चितता को दूर करने में सुशासन के महत्व पर जोर देते हुए कहा:

“राज्य और उसकी नियामक संस्थाओं के लिए सुशासन का तकाजा है कि वे ऐसा तंत्र तैयार करें जिसमें छात्रों और उनके परिवारों पर प्रोफेशनल डिग्री हासिल करने के वित्तीय दायित्वों को लेकर पूरी निश्चितता हो। वित्तीय देनदारियों में प्रतिकूल बदलाव और उससे पैदा होने वाली असुरक्षा का असर छात्र और उसके परिवार पर पड़ता है, और लंबे समय में यह तैयार हो रहे प्रोफेशनल्स की गुणवत्ता और क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।”

इसके साथ ही पीठ ने राष्ट्र निर्माण में निजी संस्थानों के योगदान को भी स्वीकार किया। अदालत ने टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002), इस्लामिक एकेडमी ऑफ एजुकेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2003) और पी.ए. इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2005) के ऐतिहासिक निर्णयों का संदर्भ देते हुए टिप्पणी की:

“सेल्फ-फाइनेंसिंग संस्थानों को भूमि, भवन, सुविधाओं, छात्र सेवाओं, पुस्तकालयों, उपकरणों और तकनीक के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है। उन्हें आकर्षक और उचित पारिश्रमिक देकर योग्य संकाय और पेशेवर कर्मचारियों को आकर्षित करने व बनाए रखने में सक्षम होना चाहिए। वैध परिचालन और विकास खर्चों को पूरा करने के बाद, इन संस्थानों को अपने अस्तित्व और भावी विकास के लिए उचित लाभ (रीज़नेबल रिटर्न) अर्जित करने की अनुमति भी दी जानी चाहिए।”

एआईसीटीई विनियम 1994, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी-2020) और लाइफकेयर इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ (2025) के फैसले का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने माना कि फीस निर्धारण में संस्थागत दक्षता अत्यंत आवश्यक है। विनियम 7 के अनुसार, फीस का निर्धारण पिछले दो वर्षों के ऑडिटेड खर्चों और आगामी तीन वर्षों के अनुमानित खर्चों के आधार पर किया जाना चाहिए, और पूरे कोर्स की फीस की अग्रिम सूचना दी जानी चाहिए।

पीठ ने स्पष्ट किया:

“चार या पांच साल के किसी प्रोफेशनल कोर्स में प्रवेश लेने वाले छात्र को शुरुआत में ही अपने या अपने परिवार पर आने वाले वित्तीय दायित्व का स्पष्ट पता होना चाहिए। यह अग्रिम निर्धारण पारदर्शिता लाता है, सोच-समझकर निर्णय लेने में मदद करता है और वित्तीय योजना को आसान बनाता है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि किसी भी असाधारण परिस्थिति में फीस संरचना में बदलाव किया ही नहीं जा सकता। असाधारण आर्थिक परिस्थितियों, वैधानिक संशोधनों या ऐसे कारणों से लागत अप्रत्याशित रूप से बढ़ सकती है जिसका पहले से अनुमान लगाना संभव न रहा हो। ऐसी असाधारण परिस्थितियों से निपटने के लिए एक अत्यंत सीमित और स्पष्ट व्यवस्था बनाई जा सकती है। लेकिन ऐसा संशोधन केवल अपवाद स्वरूप होना चाहिए, यह समय पर आकलन और उचित संस्थागत योजना का विकल्प नहीं बन सकता।”

पश्चिम बंगाल में नियामक प्रक्रिया में हुई देरी पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कोर्ट ने कहा:

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“फीस निर्धारण समिति और राज्य सरकार ने अकुशलता से काम किया, क्योंकि वे 2023-27 बैच के लिए समय पर फीस पुनरीक्षण प्रक्रिया पूरी करने में विफल रहे। सात साल के अंतराल के बाद 16 अक्टूबर 2023 को नया फीस संशोधन किया गया। पहले सेमेस्टर की समाप्ति के बाद संशोधित फीस संरचना को लागू करने की अपीलकर्ता-कॉलेज की जल्दबाजी के लिए उसे पूरी तरह दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि राज्य सरकार शैक्षणिक सत्र 2023-2024 के शुरू होने से पहले ही यह अधिसूचना जारी कर देती, तो बीच सत्र में नई फीस व्यवस्था लागू करने से उपजी इस समस्या से बचा जा सकता था।”

हाईकोर्ट के कानूनी तर्कों से असहमति और अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा दिए गए व्यावहारिक निर्देशों को बरकरार रखा, लेकिन उसके कुछ कानूनी आधारों से असहमति जताई।

पीठ ने रेखांकित किया:

“यद्यपि हम अपने स्वतंत्र कारणों के आधार पर हाईकोर्ट की खंडपीठ के निष्कर्षों को सही ठहराते हैं, लेकिन हम खंडपीठ के इस तर्क से सहमत नहीं हैं कि 2023-27 बैच के लिए संशोधित फीस संरचना लागू करने से 16 अक्टूबर 2023 की अधिसूचना को पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव मिलेगा। हमारा यह भी मानना है कि कॉलेज विवरणिका के आधार पर अपीलकर्ता-कॉलेज के खिलाफ साम्या और विबंधन (एस्टॉपेल) के सिद्धांतों को लागू करने का हाईकोर्ट का दृष्टिकोण कानूनन सही नहीं है। उस सीमा तक हाईकोर्ट का फैसला खारिज किया जाता है।”

अपीलों का आंशिक रूप से निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित तीन प्रमुख निर्देश दिए:

  1. फीस निर्धारण समितियों का एक वैधानिक आधार है और वे महत्वपूर्ण सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति करती हैं। हाईकोर्टों को न्यायिक समीक्षा के माध्यम से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ये समितियां संस्थागत दक्षता, विशेषज्ञता और सत्यनिष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करें।
  2. नियामक व्यवस्था, एआईसीटीई विनियम, एनईपी-2020 और वित्तीय निश्चितता का सिद्धांत यह अनिवार्य करते हैं कि सक्षम प्राधिकारी छात्र के प्रवेश लेने से पहले ही पूरे कोर्स की देय फीस अधिसूचित करें। कोर्स के दौरान फीस में बदलाव केवल असाधारण और अप्रत्याशित खर्चों जैसी दुर्लभ परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
  3. हाईकोर्ट की खंडपीठ का वह अंतिम निर्देश बरकरार रहेगा जिसमें कहा गया था कि फीस वृद्धि 16 अक्टूबर 2023 से पहले प्रवेश ले चुके छात्रों पर लागू नहीं होगी, और उनसे ली गई अतिरिक्त राशि को वापस या समायोजित किया जाए। कॉलेज को इन निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: डॉ. बी.सी. रॉय इंजीनियरिंग कॉलेज व अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य 

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या [एसएलपी (सिविल) संख्या 13237/2026 से उद्भूत] एवं अन्य संबद्ध अपीलें 

पीठ: जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे 

निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर 2026

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