सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (आईबीसी) की धारा 62 के तहत वैधानिक अपील दाखिल करने की मियाद (परिसीमा अवधि) नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) द्वारा खुली अदालत में आदेश सुनाए जाने की तारीख से शुरू होती है, न कि उस तारीख से जब कोई अपीलकर्ता अपनी मर्जी से प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन करता है या उसे प्राप्त करता है। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने प्रतिवादी द्वारा मियाद को लेकर उठाई गई प्रारंभिक आपत्ति को स्वीकार करते हुए केंद्रीय कर विभाग की ओर से दाखिल अपील खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि आईबीसी की धारा 62 के तहत अपील दाखिल करने की अधिकतम 60 दिनों की अंतिम समय-सीमा को किसी मुकदमेबाज़ की सुविधा या सुस्ती के आधार पर अनिश्चित या अस्थिर नहीं बनाया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद कॉर्पोरेट देनदार मेसर्स साम्यु ग्लास प्राइवेट लिमिटेड के कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी) से जुड़ा है। कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत पंजीकृत यह कंपनी उच्च गुणवत्ता वाले ग्लास कंटेनर बनाती थी और 100% निर्यातोन्मुख इकाई (ईओयू) के रूप में काम कर रही थी। केंद्रीय उत्पाद एवं सेवा कर विभाग ने 2013 से 2017 के बीच कंपनी के खिलाफ उत्पाद शुल्क वसूली की कई कार्यवाहियां शुरू की थीं। इसी बीच, नवंबर/दिसंबर 2016 के आसपास कंपनी का विनिर्माण कार्य बंद हो गया। कॉर्पोरेट देनदार ने उत्पाद शुल्क विभाग की इन मांगों को सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (सीईएसटीएटी) के समक्ष चुनौती दी थी।
बाद में, एक वित्तीय लेनदार आंध्रा बैंक (वर्तमान में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया) ने आईबीसी की धारा 7 के तहत आवेदन किया। निर्णायक प्राधिकरण (अड्ज्यूडिकेटिंग अथॉरिटी) ने आवेदन स्वीकार करते हुए सीआईआरपी प्रक्रिया शुरू कर दी और प्रतिवादी संख्या 1 को रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (आरपी) नियुक्त किया।
जब केंद्रीय कर विभाग ने 04 नवंबर 2019 को कुर्क की गई मशीनरी की नीलामी के लिए न्यूनतम आरक्षित मूल्य तय करने हेतु संयुक्त मूल्य निर्धारण समिति की बैठक बुलाई, तो रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने विभाग को सूचित किया कि आईबीसी के तहत मोराटोरियम (रोक) प्रभावी हो चुका है, जो किसी भी बाहरी प्राधिकरण को कॉर्पोरेट देनदार की संपत्ति बेचने से रोकता है। इसके बाद 27 नवंबर 2019 को केंद्रीय कर उपायुक्त ने 22,60,32,948 रुपये के बकाये का दावा फॉर्म-एफ में प्रस्तुत किया। हालांकि कॉर्पोरेट देनदार ने ‘सबका विश्वास (विरासत विवाद समाधान) योजना, 2019’ के तहत 4,32,80,741 रुपये में निपटारे की योजना पेश की थी, लेकिन नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी), हैदराबाद ने 13 अगस्त 2021 को एक रेजोल्यूशन प्लान को मंजूरी दी। इस स्वीकृत प्लान के तहत विभाग के आबकारी बकाये के मद में केवल 1,34,657 रुपये की राशि आवंटित की गई।
एनसीएलटी के इस फैसले को केंद्रीय कर विभाग ने एनसीएलएटी, चेन्नई में चुनौती दी। 02 अगस्त 2023 को एनसीएलएटी ने विभाग की अपील खारिज करते हुए एनसीएलटी के आदेश की पुष्टि कर दी। इसके बाद विभाग ने 21 नवंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट में आईबीसी की धारा 62 के तहत सिविल अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
प्रतिवादी संख्या 2 की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री रितिन राय ने अपील के समय-सीमा से बाहर होने को लेकर प्रारंभिक आपत्ति उठाई। उन्होंने दलील दी कि आईबीसी एक पूर्ण और स्वतंत्र संहिता है जिसमें वैधानिक उपचारों की सख्त समय-सीमा तय है। धारा 62 के तहत अपील के लिए निर्धारित 45 दिन और विलंब माफी की 15 दिन की अवधि 03 अगस्त 2023 से शुरू होकर 01 अक्टूबर 2023 (60वें दिन) को समाप्त हो गई थी, जबकि अपील 111वें दिन यानी 21 नवंबर 2023 को दाखिल की गई।
उन्होंने वैकल्पिक तर्क देते हुए कहा कि यदि परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 12 के तहत प्रमाणित प्रति प्राप्त करने में लगे समय को घटा भी दिया जाए, तो भी अपीलकर्ता ने प्रमाणित प्रति के लिए 06 सितंबर 2023 को आवेदन किया था और उसे प्रति 11 अक्टूबर 2023 को मिली। इस अवधि को बाहर करने के बाद भी अपील हर हाल में 05 नवंबर 2023 तक दायर की जानी चाहिए थी। इसलिए अपील दोनों ही आधारों पर मियाद से बाहर है।
दूसरी तरफ, अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील श्री सौरव रॉय ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 421 और 423 के साथ पठित आईबीसी की धारा 62(1) में दर्ज वाक्यांश “ऐसे आदेश की प्राप्ति की तारीख से पैंतालीस दिनों के भीतर” पर भरोसा जताया। उन्होंने तर्क दिया कि धारा 62 के तहत मियाद की गणना का शुरुआती बिंदु आदेश पारित होने की तारीख नहीं, बल्कि प्रमाणित प्रति की वास्तविक प्राप्ति की तारीख है। चूंकि प्रमाणित प्रति 11 अक्टूबर 2023 को प्राप्त हुई थी और अपील 21 नवंबर 2023 को 41 दिनों के भीतर दायर की गई, इसलिए यह अपील कानूनन निर्धारित मियाद के भीतर है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व निर्णय
कानूनी ढांचे का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आईबीसी की धारा 238-ए के तहत परिसीमा अधिनियम, 1963 के प्रावधान इस संहिता के तहत होने वाली कार्यवाहियों और अपीलों पर “यथासंभव” लागू होते हैं। पीठ ने मियाद के सिद्धांतों पर पहले दिए गए अपने बाध्यकारी निर्णयों का उल्लेख किया:
- सगुफा अहमद एवं अन्य बनाम अपर असम प्लाइवुड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य मामले में अदालत ने माना था कि परिसीमा का कानून लैटिन सूक्ति विजिलैंटिबस एट नॉन डॉर्मिएंटिबस जूरा सबवेनियंट (कानून केवल जागरूक लोगों की सहायता करता है, उन लोगों की नहीं जो अपने अधिकारों पर सोते रहते हैं) पर आधारित है। वैधानिक रूप से निर्धारित अवधि में वह अतिरिक्त समय शामिल नहीं होता जो अदालतें या न्यायाधिकरण उचित कारण दिखाए जाने पर अपने विवेकाधिकार से माफ करते हैं।
- वी. नागराजन बनाम एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड एवं अन्य मामले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि आईबीसी एक संपूर्ण संहिता है और इसकी धारा 238 अन्य कानूनों पर अधिभावी प्रभाव (ओवरराइडिंग इफेक्ट) रखती है। प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन करना अपीलकर्ता की सक्रिय तत्परता को दर्शाता है; आवेदन दाखिल करने से पहले की गई देरी या निष्क्रियता के लिए परिसीमा अधिनियम की धारा 12(2) के तहत छूट नहीं मांगी जा सकती।
- सीए रामचंद्र डल्लाराम चौधरी बनाम अदाणी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड मामले में अदालत ने दोहराया था कि आईबीसी की धारा 62 के तहत अपील दाखिल करने की अंतिम बाहरी सीमा 60 दिन (45 दिन + 15 दिन की रियायती अवधि) है। इस 60 दिन की अवधि के बाद अदालत के पास विलंब माफ करने का कोई क्षेत्राधिकार नहीं बचता।
आईबीसी की धारा 62 और परिसीमा अधिनियम की धारा 12(2) के आपसी संबंध को स्पष्ट करते हुए पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“धारा 62(1) में प्रयुक्त वाक्यांश ‘आदेश प्राप्त होने की तारीख से’ का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि यह वह तारीख है जब कोई पक्षकार प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन करने और उसे प्राप्त करने का विकल्प चुनता है। यदि परिसीमा की घड़ी मुकदमेबाज़ की सुविधा पर भौतिक रूप से प्रति एकत्र करने तक रुकी रहे, तो परिसीमा अवधि अनिश्चित और अस्थिर हो जाएगी। इसके अलावा, 1963 के अधिनियम की धारा 12(2) पूरी तरह से निरर्थक हो जाएगी।”
एनसीएलएटी नियम, 2016 के नियम 91 का हवाला देते हुए—जो खुली अदालत में आदेश सुनाना अनिवार्य बनाता है—पीठ ने कहा:
“खुली अदालत में आदेश सुनाने को अनिवार्य बनाने वाले नियम के सीधे अध्ययन से स्पष्ट है कि इस नियम का अनुपालन होते ही जानकारी और परिसीमा की अवधि शुरू हो जाएगी। नतीजतन, आईबीसी की धारा 62 के तहत इस अदालत में अपील करने के लिए परिसीमा अवधि उसी तारीख से शुरू होती है जिस दिन एनसीएलएटी आदेश सुनाता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के घटनाक्रम की गणना करते हुए निम्नलिखित बिंदु दर्ज किए:
- एनसीएलएटी ने 02 अगस्त 2023 को फैसला सुनाया।
- अपीलकर्ता ने प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन करने से पहले 35 दिन की देरी की और 06 सितंबर 2023 को आवेदन किया। परिसीमा अधिनियम की धारा 12 के स्पष्टीकरण के तहत आवेदन से पहले के इन 35 दिनों की निष्क्रियता को छूट में शामिल नहीं किया जा सकता और यह मूल 45 दिनों में से घटेंगे।
- रजिस्ट्री में आवेदन लंबित रहने और 11 अक्टूबर 2023 को प्रति मिलने के बीच का समय (35 दिन) धारा 12(2) के तहत “आवश्यक समय” माना गया और इसे गणना से बाहर रखा गया।
- 11 अक्टूबर 2023 को प्रति मिलने के बाद प्रारंभिक 45 दिनों की अवधि में से केवल 10 दिन शेष बचे थे (जो 21 अक्टूबर 2023 को समाप्त हो गए), और इसके बाद धारा 62(2) के तहत 15 दिन की अतिरिक्त विवेकाधीन अवधि 05 नवंबर 2023 को समाप्त हो गई।
- प्रति प्राप्त करने के बाद भी अपीलकर्ता ने अपील दायर करने में 41 दिन का समय लिया और अपील 21 नवंबर 2023 को दाखिल की गई।
इस प्रकार, अपीलकर्ता द्वारा लिए गए कुल समय (आवेदन से पहले के 35 दिन और प्रति मिलने के बाद के 41 दिन) को जोड़ने पर कुल 76 दिन होते हैं—जो 60 दिन की अधिकतम वैधानिक सीमा से 16 दिन अधिक है।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यदि अपीलकर्ता की दलील को स्वीकार किया जाता है:
“…तो यह परिसीमा अवधि और माफी योग्य अवधि दोनों को निष्फल कर देगा, और अपील के अधिकार को एक अनिश्चित और अस्थिर परिसीमा अवधि के अधीन बना देगा।”
अदालत ने माना कि यह अपील विलंब माफ करने के उसके वैधानिक क्षेत्राधिकार की अधिकतम सीमा के बाद दायर की गई है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक आपत्ति स्वीकार करते हुए केंद्रीय कर विभाग की सिविल अपील को मियाद पूरी होने के आधार पर खारिज कर दिया। मामले में किसी भी पक्ष पर कोई हर्जाना (कॉस्ट) नहीं लगाया गया।
मामले का शीर्षक: द असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ सेंट्रल टैक्स, सीजीएसटी डिवीजन बनाम श्रीनिवास राव रविनुथला और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 7882/2023
पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर 2026

