सार्वजनिक खजाने से राहत मांगने पर राज्य को पक्षकार बनाना अनिवार्य, गैर-अनुदानित कॉलेजों पर लागू नहीं होती सरप्लस समायोजन नीति: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब सार्वजनिक खजाने के खिलाफ कोई ठोस वित्तीय या प्रशासनिक राहत मांगी जाती है, तो राज्य को औपचारिक प्रतिवादी न बनाना रिट याचिका को बुनियादी रूप से त्रुटिपूर्ण बना देता है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बिना अनुदान सहायता (नो ग्रांट-इन-एड) वाले एक निजी कॉलेज के सेवामुक्त लेक्चरर को अतिरिक्त (सरप्लस) शिक्षक संवर्ग में समायोजित करने का निर्देश दिया गया था। पीठ ने स्पष्ट किया कि सरप्लस शिक्षकों को समायोजित करने की नीति केवल सहायता प्राप्त (ग्रांट-इन-एड) संस्थानों पर ही लागू होती है और किसी विभागीय अधिकारी को पक्षकार बनाना स्वयं राज्य को पक्षकार बनाने का विकल्प नहीं हो सकता। हालांकि, न्याय की विफलता को रोकने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सेवानिवृत्त हो चुके लेक्चरर को पूर्ण एवं अंतिम निपटारे के रूप में 10 लाख रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान करे।

मामले की पृष्ठभूमि

प्रथम प्रतिवादी सुधीर को एक पंजीकृत सोसायटी द्वारा संचालित कॉलेज के वाणिज्य संकाय में शैक्षणिक सत्र 1990-1991 के दौरान लेक्चरर नियुक्त किया गया था। इस कॉलेज को पूर्णतः “बिना अनुदान सहायता” (नो ग्रांट-इन-एड) आधार पर संचालित करने की अनुमति दी गई थी। निलंबन और विभागीय जांच के बाद विश्वविद्यालय से अनुमति प्राप्त कर प्रबंधन ने 17 अगस्त 1999 को सुधीर की सेवाएं समाप्त कर दी थीं। इसके साथ ही, छात्रों की कमी के कारण विश्वविद्यालय ने प्रबंधन को शैक्षणिक सत्र 1999-2000 से वाणिज्य संकाय बंद करने की भी मंजूरी दे दी थी।

सुधीर ने अपनी सेवा समाप्ति को नागपुर स्थित यूनिवर्सिटी एंड कॉलेज ट्रिब्यूनल में चुनौती दी, लेकिन ट्रिब्यूनल ने 24 अप्रैल 2000 को उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के समक्ष रिट याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 7 अक्टूबर 2015 को ट्रिब्यूनल का आदेश निरस्त करते हुए सेवा समाप्ति को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले के पैरा 26 (iv) में उच्च शिक्षा संयुक्त निदेशक, नागपुर को निर्देश दिया कि वे सुधीर का नाम सरप्लस लेक्चरर्स की सूची में शामिल कर उन्हें किसी अन्य कॉलेज में समायोजित करें। साथ ही, कॉलेज प्रबंधन को बकाये के बदले 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया। संयुक्त निदेशक ने इस समायोजन निर्देश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसे हाईकोर्ट ने 12 जनवरी 2016 को खारिज कर दिया। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां 11 मार्च 2016 को विशेष अनुमति याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के समायोजन संबंधी निर्देश पर रोक लगा दी गई थी।

पक्षकारों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष महाराष्ट्र सरकार ने दलील दी कि कॉलेज पूरी तरह से गैर-अनुदानित आधार पर संचालित हो रहा था। राज्य सरकार ने 24 मार्च 1994 के सरकारी संकल्प (जीआर) और 21 मार्च 1997 के शुद्धिपत्र का हवाला देते हुए कहा कि अतिरिक्त शिक्षकों के समायोजन की नीति विशेष रूप से केवल सहायता प्राप्त कॉलेजों पर लागू होती है। ऐसे में हाईकोर्ट ने कानून के विपरीत जाकर सुधीर के समायोजन का निर्देश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है।

इसके विपरीत, सुधीर के वकील ने तर्क दिया कि महाराष्ट्र विश्वविद्यालय अधिनियम, 1994 की धारा 79(4) के तहत अतिरिक्त शिक्षकों को समायोजित करने का आदेश सभी “संबद्ध कॉलेजों” पर लागू होता है, जिसमें सहायता प्राप्त और गैर-अनुदानित संस्थानों के बीच कोई भेद नहीं किया गया है। इसलिए 1997 का शुद्धिपत्र कानूनन निष्प्रभावी है। सुधीर ने एक अन्य दिवंगत लेक्चरर भाऊराव पुंडलिकराव कड़व के समायोजन का उदाहरण देते हुए समानता के आधार पर राहत की मांग की। प्रक्रियात्मक त्रुटि पर उन्होंने तर्क दिया कि रिट याचिका विचारणीय थी क्योंकि राज्य का प्रतिनिधित्व संयुक्त निदेशक कार्यालय कर रहा था और सहायक सरकारी वकील ने मेरिट के आधार पर मामले की पैरवी की थी।

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने 'शिवलिंग पर बिच्छू' वाली टिप्पणी को लेकर मानहानि के मामले को खारिज करने की शशि थरूर की याचिका को खारिज कर दिया

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि विवाद की मुख्य जड़ एक मूलभूत प्रक्रियात्मक खामी में निहित है: हाईकोर्ट के समक्ष रिट कार्यवाही में महाराष्ट्र राज्य को पक्षकार न बनाया जाना। सुधीर ने वर्ष 2000 में याचिका दायर की थी, लेकिन लगभग पंद्रह वर्षों बाद मार्च 2015 में उन्होंने केवल “संयुक्त निदेशक” को प्रतिवादी बनाने का आवेदन दिया, न कि औपचारिक रूप से महाराष्ट्र राज्य को।

विभागीय अधिकारी के प्रतिनिधित्व को पर्याप्त मानने की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्थापित विधि को दोहराया:

“संविधान के अनुच्छेद 300 के तहत राज्य को एक विधिक निकाय के रूप में औपचारिक रूप से पक्षकार बनाए बिना, केवल किसी अधिकारी या विभाग को पक्षकार बनाना याचिका को मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण बनाता है, खासकर तब जब सार्वजनिक खजाने से कोई ठोस राहत मांगी गई हो।”

पीठ ने आगे टिप्पणी की:

READ ALSO  केरल उच्च न्यायालय ने NHAI को एक सप्ताह के भीतर सड़कें ठीक करने का निर्देश दिया कहा सड़कों को हत्या का मैदान नहीं बनने दे सकते

“संप्रभु या वित्तीय दायित्व तय करने के उद्देश्य से राज्य के किसी अधिकारी या विभाग की तुलना स्वयं राज्य से नहीं की जा सकती।”

इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के महत्वपूर्ण निर्णयों का विश्लेषण किया:

  • रंजीत मल बनाम महाप्रबंधक, उत्तर रेलवे (1977) मामले में तीन जजों की पीठ ने निर्णय दिया था कि सेवा समाप्ति को रद्द करने वाले आदेश को लागू कराने के लिए कोई कर्मचारी केवल महाप्रबंधक को पक्षकार नहीं बना सकता; केंद्र सरकार एक आवश्यक पक्षकार है क्योंकि आदेश का निष्पादन अंततः उसी के विरुद्ध होना है।
  • जगतू बनाम सूरज मल (2010) मामले में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 79 और आदेश 27 नियम 1 को आदेश 1 नियम 9 के साथ पढ़ते हुए कोर्ट ने माना था कि जहां राज्य की भूमि के संबंध में अधिकारों की घोषणा मांगी जाती है, वहां राज्य एक अपरिहार्य पक्षकार है और उसकी अनुपस्थिति में वाद चलने योग्य नहीं है।
  • चमन लाल बनाम पंजाब राज्य (2014) मामले में कोर्ट ने राज्य को औपचारिक रूप से पक्षकार बनाए बिना सरकारी खजाने के विरुद्ध राहत देने की परिपाटी की आलोचना की थी और स्पष्ट किया था कि ऐसे मामले में त्रुटिवश पारित की गई डिक्री राज्य पर बाध्यकारी नहीं होती।

मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि गैर-अनुदानित कॉलेज में नियुक्त होने के कारण सुधीर 1997 के शुद्धिपत्र के तहत राज्य की सरप्लस समायोजन नीति के दायरे से बाहर थे, जिसे उन्होंने कभी चुनौती भी नहीं दी थी। समानता के आधार पर उनके दावे को खारिज करते हुए कोर्ट ने चमन लाल फैसले का संदर्भ देते हुए कहा:

“संविधान का अनुच्छेद 14 नकारात्मक समानता की परिकल्पना नहीं करता है। यदि अनजाने में या गलती से किसी समान स्थिति वाले व्यक्ति को कोई अवैध या अनियमित लाभ दे दिया गया है, तो यह किसी गैरकानूनी कार्य को जारी रखने के लिए दूसरों को उसी राहत का दावा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता है।”

संतुलन और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट का समायोजन का निर्देश गलत था, लेकिन कोर्ट ने मामले की विशिष्ट परिस्थितियों और मानवीय पहलुओं पर भी गौर किया। सुधीर वर्ष 1999 से सेवा से बाहर थे और इस मुकदमेबाजी के दौरान ही 30 नवंबर 2025 को अधिवर्षिता (रिटायरमेंट) की आयु प्राप्त कर चुके थे। सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक के कारण वे बहाली के आदेश का लाभ नहीं ले सके थे और उन्होंने समायोजन की उम्मीद में प्रबंधन से 10 लाख रुपये का मुआवजा स्वीकार किया था।

पीठ ने टिप्पणी की:

READ ALSO  Supreme Court Reiterates Openness to Direct Dialogue with Farmers Amid Punjab Protests

“यद्यपि अपीलकर्ता की यह दलील सही है कि समायोजन का कानूनी आदेश ‘बिना अनुदान सहायता’ (नो ग्रांट-इन-एड) वाले कॉलेज पर लागू नहीं होता, लेकिन जीवन के इस पड़ाव पर सुधीर को बेसहारा छोड़ देना न्याय का मखौल उड़ाने जैसा होगा।”

कोर्ट ने यह भी माना कि राज्य सरकार ने भी हाईकोर्ट के समक्ष शुरुआत में ही गैर-पक्षकार बनाए जाने की आपत्ति मजबूती से दर्ज न कराकर देरी की, जिसके लिए वह भी आंशिक रूप से जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राज्य द्वारा प्रस्तुत गणना चार्ट से स्पष्ट हुआ कि यदि सुधीर 30 नवंबर 2025 तक कार्यरत रहते, तो बकाये वेतन की राशि अत्यधिक होती। ऐसे में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए राहत के स्वरूप को बदला।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के पैरा 26 (iv) को निरस्त करते हुए अपील स्वीकार कर ली। साथ ही, महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सुधीर को आठ सप्ताह के भीतर 10 लाख रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान करे, जो उनके सभी दावों का पूर्ण एवं अंतिम निपटारा होगा। कॉलेज प्रबंधन द्वारा पूर्व में दिए गए 10 लाख रुपये के मुआवजे को यथावत रखा गया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्देश इस मामले के विशिष्ट तथ्यों के तहत जारी किया गया है और इसे भविष्य के लिए नजीर नहीं माना जाएगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: महाराष्ट्र राज्य बनाम सुधीर आत्मज मोतीरामजी हिवरकर एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2963-2964/2016
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 13 अक्टूबर 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles