मद्रास हाईकोर्ट ने तिरुचिरापल्ली जिले के थुरैयूर में लंबित एक तलाक के मामले को तांबरम स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक मामलों में सुनवाई का स्थान तय करते समय पति के मुकाबले पत्नी की सुविधा को प्राथमिकता दी जाती है।
जस्टिस एन. माला ने महिला की ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किया। अदालत ने पति विघ्नेश्वरन द्वारा थुरैयूर के सब कोर्ट में दायर तलाक की याचिका को वहां से वापस लेकर तांबरम के सब कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया। हाईकोर्ट ने 5 अक्टूबर को दिए अपने फैसले में पाया कि मामले में सुविधा का संतुलन (बैलेंस ऑफ कन्वीनियंस) याचिकाकर्ता पत्नी के पक्ष में है, जिसे अपनी तीन साल की बेटी के साथ लगभग 300 किलोमीटर का सफर तय करके मुकदमे की पैरवी करने में गंभीर व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।
सफर की मुश्किलें और नौकरी की जिम्मेदारी
महिला ने 2025 में पति द्वारा थुरैयूर की अदालत में तलाक का मुकदमा दायर किए जाने के बाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में उसने बताया कि वह चेन्नई की एक निजी रियल एस्टेट फर्म में पूर्णकालिक नौकरी करती है और रामापुरम स्थित अपने मायके में बच्ची के साथ रह रही है। इससे पहले वह अपने माता-पिता के साथ कांचीपुरम में रह रही थी।
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष दलील दी कि इतनी छोटी बच्ची की प्राथमिक देखभाल करते हुए चेन्नई से थुरैयूर के बीच लंबी दूरी की यात्रा करना बेहद कठिन है। इसके साथ ही उसने आरोप लगाया कि उसका पति खुद चेन्नई क्षेत्र के सिरुसेरी में कार्यरत है। पत्नी का कहना था कि चेन्नई में काम करने के बावजूद पति ने थुरैयूर में मुकदमा सिर्फ इसलिए दायर किया ताकि उसके लिए कानूनी लड़ाई लड़ना मुश्किल हो जाए।
नोटिस मिलने के बाद भी पति ने नहीं दिया जवाब
हाईकोर्ट ने ट्रांसफर याचिका की प्रक्रिया के दौरान पति की ओर से हुई देरी को भी रिकॉर्ड पर लिया। अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, पति को 5 फरवरी 2026 को ही नोटिस मिल चुका था, लेकिन उसने पत्नी के दावों और अपने सिरुसेरी में काम करने के आरोप का खंडन करने के लिए कोई जवाबी हलफनामा (काउंटर एफिडेविट) दाखिल नहीं किया।
जवाब दाखिल न करने पर जस्टिस माला ने टिप्पणी की कि ऐसा लगता है कि प्रतिवादी केवल कार्यवाही को लंबा खींचना चाहता है। अदालत ने साफ किया कि यह टिप्पणी केवल नोटिस मिलने के बाद भी जवाब न देने के संदर्भ में की गई है, और इसे पति के आचरण या विवाह से जुड़े उसके इरादों पर अदालत का कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। महिला के रोजगार, रामापुरम में उसके निवास और तीन साल की बच्ची की परवरिश को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि थुरैयूर जाने में उसकी असमर्थता मुकदमे के स्थानांतरण के लिए एक ठोस आधार है।
पारिवारिक विवाद की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षों का विवाह 11 फरवरी 2022 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार तयशुदा रिश्ते के तहत हुआ था। विवाह के बाद थुरैयूर में पति के पैतृक घर पर करीब एक सप्ताह रुकने के बाद यह जोड़ा चेन्नई आ गया था। इसके बाद 30 अगस्त 2023 को उनकी बेटी का जन्म हुआ।
आगे चलकर आपसी मतभेद बढ़ने पर पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए थुरैयूर सब कोर्ट में याचिका दायर कर दी थी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका यह आदेश केवल मुकदमे की उचित अदालत तय करने तक सीमित है। अदालत ने क्रूरता के आरोपों के गुण-दोष या शादी को समाप्त किए जाने की मांग पर कोई फैसला नहीं दिया है। मामले को तांबरम सब कोर्ट स्थानांतरित करने के साथ ही हाईकोर्ट ने इससे जुड़ी विविध याचिका को भी निस्तारित कर दिया और मुकदमे के खर्च को लेकर कोई आदेश पारित नहीं किया।

