कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्कूल सर्विस कमीशन (SSC) की भर्ती प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले छह अभ्यर्थियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल विरोध प्रदर्शन करने या नारे लगाने से किसी सभा को गैरकानूनी नहीं माना जा सकता। इसके लिए कानून में निर्धारित शर्तों का पूरा होना जरूरी है।
जस्टिस अनुज सिंह ने 7 अक्टूबर को पारित आदेश में कहा कि FIR में लगाए गए आरोपों से अभ्यर्थियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने पाया कि प्रदर्शन में शामिल होने के कारण अभ्यर्थियों को आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा था।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोई प्रदर्शन केवल इसलिए अपराध नहीं बन जाता क्योंकि वह अधिकारियों को पसंद नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पूरी FIR पढ़ने के बाद भी किसी अपराध के जरूरी तत्व सामने नहीं आते हैं, तो न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए ऐसी कार्रवाई रद्द की जा सकती है।
केवल नारे लगाने से गैरकानूनी जमावड़े का अपराध नहीं बनता
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 141 और 143 के तहत लगाए गए आरोपों की जांच की।
कोर्ट ने कहा कि किसी सभा को गैरकानूनी मानने के लिए उसके सदस्यों का साझा उद्देश्य कानून में बताई गई पांच श्रेणियों में से किसी एक के अंतर्गत आना चाहिए।
जस्टिस सिंह ने पाया कि FIR में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि प्रदर्शनकारियों का ऐसा कौन-सा साझा उद्देश्य था, जिसके आधार पर उनकी सभा को गैरकानूनी माना जा सके।
कोर्ट ने कहा कि केवल विरोध प्रदर्शन करना और नारे लगाना अपने आप में गैरकानूनी उद्देश्य नहीं माना जा सकता। इसलिए अभ्यर्थियों के खिलाफ IPC की धारा 143 के तहत अपराध भी नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस के सभी आरोपों को सही मान लेने के बावजूद गैरकानूनी जमावड़े से संबंधित अपराध की जरूरी शर्तें पूरी नहीं होती हैं।
COVID-19 से संक्रमित होने का भी कोई आरोप नहीं
हाईकोर्ट ने प्रदर्शन के दौरान COVID-19 प्रोटोकॉल के कथित उल्लंघन के आरोपों पर भी विचार किया।
कोर्ट ने पाया कि FIR में ऐसा कोई तथ्य नहीं था, जिससे यह माना जा सके कि प्रदर्शनकारी COVID-19 से संक्रमित थे या उन्हें कोई संक्रामक बीमारी थी।
जस्टिस सिंह ने कहा कि FIR में जिन अपराधों का उल्लेख किया गया था, उनके आवश्यक तत्व ही मौजूद नहीं थे। ऐसे में अभ्यर्थियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई जारी रखने का कोई आधार नहीं था।
कोर्ट ने इस कार्रवाई को परेशान करने वाली और निराधार माना। साथ ही कहा कि मामले की परिस्थितियों से यही निष्कर्ष निकलता है कि अभ्यर्थियों को प्रदर्शन करने के कारण आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ रहा था।
भर्ती में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ किया था प्रदर्शन
यह मामला 28 सितंबर 2021 को हुए एक प्रदर्शन से जुड़ा है। स्कूल सर्विस कमीशन की भर्ती प्रक्रिया से असंतुष्ट अभ्यर्थियों ने कथित अनियमितताओं के खिलाफ विरोध जताने के लिए प्रदर्शन किया था।
अभ्यर्थियों के अनुसार, वे बेरोजगारी, भूख और भर्ती प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों से जुड़ी अपनी शिकायतें पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री तक पहुंचाना चाहते थे। इसी उद्देश्य से वे उनके आवास के सामने एकत्र हुए थे।
हालांकि, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कर दी।
पुलिस ने आरोप लगाया कि अभ्यर्थियों ने COVID-19 से संबंधित नियमों का उल्लंघन किया, निर्देश दिए जाने के बावजूद वहां से नहीं हटे, सार्वजनिक रास्ते में बाधा डालने की कोशिश की और सरकारी अधिकारियों को उनके कर्तव्यों का पालन करने से रोका।
इसके बाद छह अभ्यर्थियों ने आपराधिक कार्रवाई रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अभ्यर्थियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार का हवाला दिया
अभ्यर्थियों की ओर से अधिवक्ता अर्क प्रतीम चौधरी, पूजा राजभर और स्वस्तिक बटब्याल ने दलील दी कि उनके मुवक्किल संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि संविधान नागरिकों को अपनी बात रखने, विचार व्यक्त करने और बिना हथियारों के शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार देता है।
वकीलों ने दलील दी कि अभ्यर्थियों का प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और उसका उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी शिकायतों को सामने रखना था।
उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2021 में ऐसा कोई नोटिफिकेशन या नोटिस जारी नहीं किया गया था, जिसके आधार पर पुलिस को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई करने का अधिकार मिलता।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से पेश अधिवक्ता गौतम मिश्रा ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।
आपराधिक कार्रवाई जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग: हाईकोर्ट
दोनों पक्षों की दलीलों और FIR में दर्ज आरोपों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि अभ्यर्थियों के खिलाफ लगाए गए अपराधों का प्रथम दृष्टया कोई आधार नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब FIR में अपराध के आवश्यक तत्व ही मौजूद नहीं हों, तो केवल आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस अनुज सिंह ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में कार्यवाही जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
इन टिप्पणियों के साथ कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्कूल सर्विस कमीशन के सभी छह अभ्यर्थियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

