जहां आर्बिट्रेशन समझौते में दो स्थानों का उल्लेख हो, वहां एक्सक्लूसिव ज्यूरिसडिक्शन क्लॉज ज्यूरिडिकल सीट तय कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी आर्बिट्रेशन क्लॉज में दो अलग-अलग स्थानों का उल्लेख हो और अनुबंध में किसी एक स्थान की अदालतों को विशेष क्षेत्राधिकार (एक्सक्लूसिव ज्यूरिसडिक्शन) सौंपा गया हो, तो वही स्थान आर्बिट्रेशन की ज्यूरिडिकल सीट माना जाएगा, जबकि दूसरा स्थान केवल सुनवाई का वेन्यू (स्थल) रहेगा। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 11(6) के तहत एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि चूंकि आर्बिट्रेशन की ज्यूरिडिकल सीट गोवा में स्थित है, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के पास मध्यस्थ नियुक्त करने का क्षेत्राधिकार नहीं था।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद 3 अगस्त 2023 को आर्सेस क्लीन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड और पार्श्व इनोवेशन के बीच निष्पादित एक फ्रैंचाइज़ एग्रीमेंट से जुड़ा है।

इस अनुबंध के क्लॉज 32 में आर्बिट्रेशन और विवाद समाधान का प्रावधान किया गया था। क्लॉज 32.4 में कहा गया था कि आर्बिट्रेशन का सटीक स्थान दिल्ली के भीतर होगा। वहीं क्लॉज 32.5 में यह व्यवस्था भी दर्ज थी कि आर्बिट्रेशन की कार्यवाही गोवा में आयोजित की जाएगी और कार्यवाही की भाषा अंग्रेजी होगी। इसके अतिरिक्त, शासी कानून और क्षेत्राधिकार से संबंधित क्लॉज 38 में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि यह समझौता भारतीय कानूनों के तहत लागू होगा और दोनों पक्ष गोवा की सक्षम अदालतों के अनन्य क्षेत्राधिकार के अधीन होने पर सहमत हैं।

विवाद उत्पन्न होने पर रेस्पोंडेंट ने 25 मार्च 2025 को नोटिस भेजकर एकमात्र मध्यस्थ का नाम प्रस्तावित किया, जिसे अपीलकर्ता ने 19 अप्रैल 2025 को खारिज कर दिया। इसके बाद रेस्पोंडेंट ने मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 11(6) के तहत दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दिल्ली हाईकोर्ट ने 11 नवंबर 2025 को मध्यस्थ नियुक्त करते हुए सुनवाई का वेन्यू दोनों पक्षों की सहमति से तय करने का फैसला मध्यस्थ पर छोड़ दिया। इस आदेश के खिलाफ अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि दिल्ली हाईकोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं था, क्योंकि आर्बिट्रेशन की ज्यूरिडिकल सीट गोवा में है। अपीलकर्ता का कहना था कि क्लॉज 32.4 केवल कार्यवाही के स्थल (वेन्यू) का उल्लेख करता है, जबकि क्लॉज 32.5 को जब क्लॉज 38 के साथ पढ़ा जाता है, तो वह गोवा की अदालतों को एक्सक्लूसिव ज्यूरिसडिक्शन प्रदान करता है, जिससे गोवा ही वास्तविक ज्यूरिडिकल सीट बन जाता है। अपने पक्ष के समर्थन में अपीलकर्ता ने आरिफ अजीम कंपनी लिमिटेड बनाम माइक्रोमैक्स इन्फॉर्मेटिक्स एफजेडई, इंडस मोबाइल डिस्ट्रीब्यूशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम डेटाविंड इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड, स्वस्तिक गैसेस (पी) लिमिटेड बनाम इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, बीजीएस एसजीएस सोमा जेवी बनाम एनएचपीसी लिमिटेड और एक्टिविटास मैनेजमेंट एडवाइजर प्राइवेट लिमिटेड बनाम माइंड प्लस हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड जैसे फैसलों पर भरोसा जताया।

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दूसरी तरफ, रेस्पोंडेंट ने तर्क दिया कि आर्बिट्रेशन समझौता मुख्य अनुबंध से स्वतंत्र होता है, इसलिए क्लॉज 38 आर्बिट्रेशन की सीट तय नहीं कर सकता। यह दलील भी दी गई कि क्लॉज 32 में विशेष रूप से दिल्ली को आर्बिट्रेशन का स्थान बताया गया है और चूंकि क्लॉज 32.4 पहले आता है, इसलिए इसे बाद वाले क्लॉज 32.5 पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए। रेस्पोंडेंट ने सासन पावर लिमिटेड बनाम नॉर्थ अमेरिकन कोल कॉर्पोरेशन (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, मैसर्स केबल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड बनाम मैसर्स जेपी स्पोर्ट्स इंटरनेशनल लिमिटेड, सुनील कुमार चंद्रा बनाम स्पायर टेकपार्क (पी) लिमिटेड, रामकिशोरलाल बनाम कमल नारायण, श्री भवानी कॉटन मिल्स बनाम यूनियन टेक्सटाइल ट्रेडर्स और मैसर्स लाइरस लाइफ साइंसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम मैसर्स एक्मे जेनेरिक एलएलपी जैसे निर्णयों का हवाला दिया।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन कानून में ‘सीट’ और ‘वेन्यू’ के बीच अंतर की पड़ताल की। अदालत ने कहा कि इंडस मोबाइल डिस्ट्रीब्यूशन मामले के अनुसार, सीट का चयन एक्सक्लूसिव ज्यूरिसडिक्शन क्लॉज के समान होता है, जो सीट वाले स्थान की अदालतों को संपूर्ण पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार सौंपता है, भले ही वहां कोई वाद-कारण (कॉज ऑफ एक्शन) उत्पन्न न हुआ हो। स्वस्तिक गैसेस और ब्राह्मणी रिवर पेलेट्स लिमिटेड मामलों का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया कि जब किसी अनुबंध में किसी विशिष्ट स्थान की अदालत को अधिकार दिया जाता है, तो अन्य सभी अदालतों का अधिकार क्षेत्र स्वतः बाहर हो जाता है।

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अदालत ने आरिफ अजीम कंपनी लिमिटेड और बीजीएस एसजीएस सोमा जेवी मामलों में निर्धारित तीन शर्तों के परीक्षण का उल्लेख किया, जिसके तहत वेन्यू को सीट माना जा सकता है—पहला, क्लॉज में केवल एक ही स्थान का नाम हो; दूसरा, पूरी कार्यवाही उसी स्थान पर केंद्रित हो; और तीसरा, कोई विपरीत संकेत मौजूद न हो।

वर्तमान मामले का विश्लेषण करते हुए पीठ ने पाया कि समझौते में केवल एक नहीं बल्कि दिल्ली और गोवा, दोनों स्थानों का उल्लेख किया गया है। रेस्पोंडेंट के इस तर्क को खारिज करते हुए कि आर्बिट्रेशन क्लॉज स्वतंत्र है, सुप्रीम कोर्ट ने मनकस्तु इम्पेक्स (पी) लिमिटेड बनाम एयरविजुअल लिमिटेड फैसले का हवाला देते हुए रेखांकित किया:

“आर्बिट्रेशन का स्थान’ शब्द का मात्र प्रयोग यह निर्धारित करने का आधार नहीं हो सकता कि पक्षों का आशय उस स्थान को आर्बिट्रेशन की ‘सीट’ बनाने का था। ‘सीट’ को लेकर पक्षों का आशय समझौते के अन्य खंडों और उनके आचरण के आधार पर तय किया जाना चाहिए।”

क्लॉज 32.4 और क्लॉज 32.5 के बीच दिखने वाले विरोधाभास का समाधान करते हुए पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“हालांकि, जब हम इनका सामंजस्यपूर्ण अर्थ निकालते हैं ताकि कोई भी प्रावधान निरर्थक न हो, और इन्हें समझौते के क्लॉज 38 के साथ पढ़ते हैं जो गोवा की अदालतों को विशेष क्षेत्राधिकार देता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्यूरिडिकल सीट गोवा में है, दिल्ली केवल एक वेन्यू है।”

इसके अलावा, अदालत ने रेस्पोंडेंट द्वारा प्रस्तुत सभी उदाहरणों को वर्तमान मामले के तथ्यों से भिन्न बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि उन मामलों में या तो केवल एक ही स्थान का उल्लेख था या फिर सीट को लेकर कोई दोहरा प्रावधान मौजूद नहीं था।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अनुबंध के समग्र अध्ययन से यह साफ है कि आर्बिट्रेशन की ज्यूरिडिकल सीट गोवा में थी। इस कारण दिल्ली हाईकोर्ट के पास धारा 11(6) के तहत आवेदन पर सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार नहीं था।

तदनुसार, शीर्ष अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के 11 नवंबर 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने पक्षों को उचित क्षेत्राधिकार वाले हाईकोर्ट के समक्ष नई कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता दी।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: आर्सेस क्लीन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड बनाम पार्श्व इनोवेशन

वाद संख्या: SLP 35915 वर्ष 2025 

पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई

निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026

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