दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी के ऐतिहासिक दिल्ली जिमखाना क्लब की 27.3 एकड़ जमीन वापस लेने और परिसर खाली कराने की सरकारी कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। क्लब के 11 सदस्यों की ओर से दायर इस याचिका पर सोमवार को सुनवाई करते हुए जस्टिस अमित महाजन ने केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय, उप भूमि एवं विकास अधिकारी, एस्टेट ऑफिसर और दिल्ली जिमखाना क्लब लिमिटेड को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया। अदालत अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को करेगी।
अंतरिम रोक की मांग पर केंद्र का कड़ा ऐतराज
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता सदस्यों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम यानी पीपी एक्ट के तहत चल रही बेदखली की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की अपील की। हालांकि, केंद्र सरकार के स्थायी वकील आशीष दीक्षित ने इस मांग का कड़ा विरोध किया। केंद्र ने दलील दी कि पीपी एक्ट के तहत जारी कानूनी प्रक्रिया पर अदालत से रोक नहीं लगाई जा सकती। इसके साथ ही उन्होंने याचिका की वैधता पर भी सवाल उठाया और कहा कि नियमानुसार याचिकाकर्ताओं को अपनी आपत्तियां लेकर सीधे एस्टेट ऑफिसर के समक्ष जाना चाहिए, न कि सीधे हाईकोर्ट।
रक्षा जरूरतों का हवाला देकर रद्द किया गया था पट्टा
विपिन अग्रवाल और 10 अन्य सदस्यों की ओर से दायर इस याचिका में मुख्य रूप से दो प्रशासनिक आदेशों को चुनौती दी गई है। इनमें भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) द्वारा 22 मई को जारी वह आदेश शामिल है, जिसके तहत 2, सफदरजंग रोड स्थित इस ब्रिटिश कालीन क्लब का स्थायी पट्टा (परपेचुअल लीज) निरस्त कर दिया गया था। उस आदेश में रक्षा ढांचे को मजबूत और सुरक्षित करने की जरूरत बताते हुए क्लब प्रबंधन को 5 जून तक पूरी 27.3 एकड़ जमीन सरकार को सौंपने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद एस्टेट ऑफिसर ने परिसर खाली कराने के लिए 29 जून को बेदखली का नोटिस जारी किया था, जिसे याचिकाकर्ताओं ने मनमाना और असंवैधानिक करार दिया है।
सदस्यों का आरोप: क्लब पर पूरे नियंत्रण की सुनियोजित कोशिश
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह कदम किसी मकान मालिक या पट्टादाता द्वारा की जाने वाली सामान्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह पिछले 25 वर्षों से क्लब का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में लेने की सरकारी कोशिशों का हिस्सा है। याचिका में कहा गया है कि केंद्र ने पहले पूरी तरह अपनी पसंद की ‘जनरल कमेटी’ बिठाकर क्लब के संचालन पर कब्जा जमाया—जिसकी वैधता खुद हाईकोर्ट में विचाराधीन है—और फिर पट्टादाता के तौर पर जमीन छीनने और पीपी एक्ट के जरिए बेदखली की प्रक्रिया शुरू कर दी। सदस्यों का कहना है कि सरकार द्वारा नियुक्त मौजूदा प्रबंधन इस कार्रवाई के खिलाफ अदालत नहीं जाता, इसलिए क्लब से बेदखल किए जा रहे सदस्यों को अपने मौलिक और संपत्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए खुद अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
कर्मचारियों की याचिका समेत चार अन्य मामले भी लंबित
हाईकोर्ट के समक्ष दिल्ली जिमखाना क्लब से जुड़े चार अन्य मुकदमे भी विचाराधीन हैं। इनमें से एक याचिका क्लब के कर्मचारियों ने दायर की है। रसोइयों, वेटरों, किचन और हाउसकीपिंग स्टाफ, मालियों, ग्राउंड्समैन, इलेक्ट्रीशियन, प्लंबरों, लाइफगार्ड्स और सुरक्षा कर्मियों ने अदालत से गुहार लगाई है कि उनकी आजीविका के साधन की रक्षा की जाए। कर्मचारियों ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(जी) और 21 के तहत मिले अपने मौलिक अधिकारों का हवाला देते हुए अदालत से सुरक्षा की मांग की है।

