इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पति पर अपनी बुजुर्ग विधवा मां को छोड़कर अलग रहने का दबाव बनाना मानसिक क्रूरता है। कोर्ट ने इस आधार पर एक व्यक्ति की तलाक की याचिका स्वीकार करते हुए उसकी शादी समाप्त करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि पत्नी लंबे समय से पति से अलग रह रही थी और उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों का उसने अदालत में कोई विरोध नहीं किया।
जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिवीजन बेंच ने 21 सितंबर को दिए अपने आदेश में फैमिली कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पति की वैवाहिक संबंध बहाल करने या वैकल्पिक रूप से तलाक देने की मांग खारिज कर दी गई थी।
हाईकोर्ट ने माना कि किसी व्यक्ति को अपनी 68 वर्षीय विधवा मां का साथ छोड़ने के लिए मजबूर करना मानसिक क्रूरता है, खासकर तब जब वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा हो।
बुजुर्ग मां से अलग होने का दबाव बनाती थी पत्नी
मामले में पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी लगातार उस पर अपनी मां से अलग रहने का दबाव डालती थी। पति के अनुसार, पत्नी उसकी मां का अपमान करती थी और उसे झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी भी देती थी।
हाईकोर्ट ने इन आरोपों से जुड़े साक्ष्यों की जांच करते हुए पाया कि पत्नी ने इनका खंडन नहीं किया था। वह न तो फैमिली कोर्ट की कार्यवाही में शामिल हुई और न ही हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखने के लिए उपस्थित हुई।
बेंच ने कहा कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी एक बुजुर्ग विधवा मां को उसके बेटे के साथ और देखभाल से वंचित करने की कोशिश क्रूरता है।
कोर्ट ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि पति अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। इसके बावजूद पत्नी उस पर मां को छोड़कर अलग रहने का दबाव बना रही थी।
हाईकोर्ट के अनुसार, पति द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि इनका जिरह के दौरान कोई विरोध नहीं किया गया था।
2012 से पति से अलग रह रही थी पत्नी
पति ने अपनी याचिका में बताया था कि उसकी पत्नी वर्ष 2012 में वैवाहिक घर छोड़कर चली गई थी। इसके बाद उसने कई बार पत्नी को वापस लाने और वैवाहिक जीवन दोबारा शुरू करने का प्रयास किया, लेकिन पत्नी लौटने के लिए तैयार नहीं हुई।
इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल कर वैवाहिक संबंध बहाल करने का आदेश देने की मांग की। उसने वैकल्पिक रूप से तलाक देने का भी अनुरोध किया।
पति के वकील ने बताया कि याचिका दर्ज होने के बाद पत्नी को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन शुरुआत में समन की तामील नहीं हो सकी। बाद में फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका एकतरफा कार्यवाही में खारिज कर दी।
इस फैसले के खिलाफ पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
हाईकोर्ट ने पाया कि नोटिस की तामील होने के बावजूद पत्नी ने न तो फैमिली कोर्ट में अपना पक्ष रखा और न ही हाईकोर्ट की कार्यवाही में हिस्सा लिया।
पत्नी की मां और भाई की गवाही से भी हुई पुष्टि
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पत्नी की मां और भाई की गवाही को भी महत्वपूर्ण माना।
इन दोनों की गवाही से इस बात की पुष्टि हुई कि पत्नी लंबे समय से अपने पति से अलग रह रही थी।
कोर्ट ने पाया कि पत्नी के अलग रहने और पति पर अपनी बुजुर्ग विधवा मां को छोड़ने का दबाव बनाने से संबंधित गवाहों के बयान बिना किसी चुनौती के रिकॉर्ड पर मौजूद थे।
बेंच ने कहा कि पति के आरोपों और उनके समर्थन में पेश साक्ष्यों की सत्यता को जिरह के माध्यम से चुनौती नहीं दी गई थी। ऐसे में इन साक्ष्यों को अविश्वसनीय मानने का कोई आधार नहीं था।
फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द, तलाक मंजूर
हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों, दलीलों और गवाहों के बयानों पर विचार करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि पति मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक पाने का हकदार है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों के बावजूद तलाक से इनकार करने पर पति की वैवाहिक स्थिति अनिश्चित बनी रहेगी। इससे न तो पति को कोई लाभ होगा और न ही पत्नी के हितों की पूर्ति होगी।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और दोनों के बीच विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी का स्थायी गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार बना रहेगा। वह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत उचित आवेदन दाखिल कर स्थायी गुजारा भत्ता प्राप्त करने की मांग कर सकती है।

