यह स्पष्ट करते हुए कि आवंटन प्रक्रिया शुरू होने के बाद कोई भी वैधानिक विकास प्राधिकरण पिछली तारीख से ऐसी दस्तावेजी शर्तें नहीं थोप सकता जिनका विज्ञापन में उल्लेख न रहा हो, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस इरशाद अली ने न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (नोएडा) और राज्य सरकार द्वारा पारित निरस्तीकरण आदेशों को रद्द कर दिया है। अदालत ने 2006 की आवासीय योजना के तहत एक औद्योगिक आवेदक द्वारा दायर रिट याचिका स्वीकार करते हुए माना कि सार्वजनिक प्राधिकरणों को घोषित शर्तों का सख्ती से पालन करना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने नोएडा को आठ सप्ताह के भीतर वर्ष 2006 की मूल दरों पर ही आवासीय भूखंड आवंटित करने का निर्देश दिया है।
फैसले की शुरुआत एक बुनियादी कानूनी सिद्धांत से करते हुए जस्टिस इरशाद अली ने टिप्पणी की: “न्याय का मूल सिद्धांत यह है कि मुकदमों का एक अंतिम अंत होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को एक ही कारण के लिए बार-बार मुकदमों के जाल में नहीं फंसाया जाना चाहिए, क्योंकि अंतहीन मुकदमेबाजी स्वयं में एक अन्याय है।”
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अनुराग सिंह और अभिनव श्रीवास्तव ने पैरवी की, जबकि उत्तर प्रदेश राज्य और नोएडा प्राधिकरण का पक्ष चीफ स्टैंडिंग कौंसिल (सीएससी) के साथ अधिवक्ता अशोक शुक्ला और उत्कर्ष श्रीवास्तव ने रखा।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता नलिनी खंडेलवाल, मेसर्स चारू अपेरल्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड (स्थित औद्योगिक भूखंड संख्या ए-26, सेक्टर-2, नोएडा) की शेयरधारक और पूर्णकालिक निदेशक हैं। उन्होंने 16 जून 2006 को नोएडा के सेक्टर-100 में “आवासीय भूखंड योजना, 2006 (1)” के तहत प्लॉट श्रेणी-3 (250 से 300 वर्ग मीटर) में एक आवासीय भूखंड के लिए आवेदन किया था। यह योजना 20 अप्रैल 2006 से 19 जून 2006 तक खुली थी। इसके क्लॉज 1(I)(A)(b) के तहत उन उद्यमियों के लिए आरक्षित श्रेणी बनाई गई थी जिनकी इकाइयां नोएडा में संचालित थीं।
कैनरा बैंक के माध्यम से जमा किए गए आवेदन पत्र के साथ याचिकाकर्ता ने एचडीएफसी बैंक के 1,20,000 रुपये के डिमांड ड्राफ्ट द्वारा पंजीकरण शुल्क का भुगतान किया। उन्होंने सभी आवश्यक दस्तावेज भी संलग्न किए, जिनमें औद्योगिक इकाई का 1 अप्रैल 1987 का फंक्शनल सर्टिफिकेट, आवेदन के लिए अधिकृत करने वाला बोर्ड का प्रस्ताव, निदेशकों और शेयरधारकों की सूची, बैंक द्वारा सत्यापित फोटो और कंपनी के मेमोरेंडम और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की प्रमाणित प्रति शामिल थी।
इन सभी दस्तावेजों के बावजूद नोएडा ने एक प्रोविजनल वरिष्ठता सूची जारी की, जिसमें याचिकाकर्ता का नाम क्रम संख्या 504 पर दर्ज कर टिप्पणी की गई कि “इकाई में आवेदक का कोई स्टेटस नहीं है और फोटो संलग्न नहीं है” तथा उन्हें “अपात्र” घोषित कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने 26 अक्टूबर 2006 और 9 नवंबर 2006 को पूरे रिकॉर्ड के साथ अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। इसके अलावा कंपनी के प्रबंध निदेशक ने भी 30 अक्टूबर 2006 को अलग से आपत्ति प्रस्तुत की। जब कोई राहत नहीं मिली, तो दो दशकों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई शुरू हुई।
याचिकाकर्ता ने सबसे पहले मिस. रिट याचिका संख्या 63153 वर्ष 2006 दायर की, जिसमें हाईकोर्ट ने 22 नवंबर 2006 को आरक्षित श्रेणी में आवंटन प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी। बाद में 19 सितंबर 2009 को याचिका का निस्तारण करते हुए कोर्ट ने नोएडा के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) को मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया। पुनर्विचार के बाद नोएडा ने 26 मई 2009 को यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता 31 मार्च 2006 की कथित कट-ऑफ तिथि तक कंपनी की निदेशक नहीं थीं।
याचिकाकर्ता ने इसे सिविल मिस. रिट याचिका संख्या 33634 वर्ष 2009 में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 26 नवंबर 2011 को नोएडा के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि योजना के ब्रोशर में 31 मार्च 2006 की कोई कट-ऑफ तिथि तय नहीं की गई थी और याचिकाकर्ता योजना की अंतिम तिथि 19 जून 2006 से पहले ही 6 मई 2006 को निदेशक बन चुकी थीं।
हाईकोर्ट द्वारा यह आधार खारिज किए जाने के बाद नोएडा ने 10 सितंबर 2012 को एक नया आधार बनाकर आवेदन फिर निरस्त कर दिया। इस बार कहा गया कि याचिकाकर्ता ने 2006 में मूल आवेदन के साथ कंपनी रजिस्ट्रार के समक्ष दाखिल किया जाने वाला वैधानिक फॉर्म-32 (जो निदेशक पद की नियुक्ति का प्रमाण है) संलग्न नहीं किया था।
इसे रिट-सी संख्या 60782 वर्ष 2012 में चुनौती दी गई, जिसे हाईकोर्ट ने 12 फरवरी 2016 को वैधानिक उपचार अपनाने की छूट देते हुए निस्तारित कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने यूपी नगर नियोजन और विकास अधिनियम, 1973 की धारा 41(3) के तहत राज्य सरकार के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर की। हालांकि, औद्योगिक विकास विभाग के प्रमुख सचिव ने 17 मार्च 2017 को यह पुनरीक्षण याचिका भी खारिज कर दी और नोएडा के इस रुख की पुष्टि की कि मूल आवेदन के साथ फॉर्म-32 नहीं दिया गया था। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने वर्तमान याचिका दायर की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव ने दलील दी कि 2006 की योजना के ब्रोशर में आवेदन के साथ फॉर्म-32 जमा करना अनिवार्य शर्त नहीं थी। ब्रोशर में केवल यह अपेक्षा थी कि आवेदक इकाई में अपने निदेशक होने का वैध प्रमाण दे, जो फंक्शनल सर्टिफिकेट, बोर्ड प्रस्ताव, निदेशकों की सूची और कंपनी के दस्तावेजों से पूरी तरह साबित हो रहा था।
वकील ने तर्क दिया कि नोएडा ने मुकदमेबाजी के विभिन्न चरणों में अपने रुख लगातार बदले हैं—पहले स्टेटस और फोटो का अभाव बताया, फिर 31 मार्च 2006 की कट-ऑफ तिथि का अनुचित आधार गढ़ा, और जब वह कोर्ट में खारिज हो गया तो पिछली तारीख से फॉर्म-32 की नई शर्त थोप दी। संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी सार्वजनिक संस्था खेल शुरू होने के बाद उसके नियम नहीं बदल सकती।
अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने के. मंजूश्री बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, तेज प्रकाश पाठक बनाम राजस्थान हाईकोर्ट, दिल्ली विकास प्राधिकरण बनाम जॉइंट एक्शन कमेटी, अलॉटी ऑफ एसएफएस फ्लैट्स और नरेश चंद्र गुप्ता बनाम कलेक्टर, यूपी के निर्णयों पर भरोसा जताया। उन्होंने यह भी कहा कि इस पूरी देरी के लिए प्राधिकरण के गलत फैसले जिम्मेदार हैं, इसलिए याचिकाकर्ता 2006 की मूल प्रीमियम दरों पर ही भूखंड आवंटन की हकदार हैं।
दूसरी तरफ, नोएडा की ओर से अधिवक्ता उत्कर्ष श्रीवास्तव ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि केवल आवेदन करने और पंजीकरण शुल्क जमा करने से भूखंड आवंटन का कोई अकाट्य अधिकार नहीं मिल जाता। प्राधिकरण का यह दायित्व था कि वह जांचे कि आवेदक का औद्योगिक इकाई से संबंध स्थापित हुआ है या नहीं। फॉर्म-32 निदेशक पद के सत्यापन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज था, और मूल आवेदन के समय इसके न होने के कारण अपात्र घोषित किया जाना उचित था।
उन्होंने तर्क दिया कि प्रमुख सचिव का आदेश एक तर्कसंगत आदेश था। प्राधिकरण ने न तो कोई मनमाना फैसला लिया और न ही पात्रता की शर्तें बदलीं, बल्कि अन्य ऐसे सभी आवेदकों के आवेदन भी इसी आधार पर निरस्त किए गए थे जिन्होंने जरूरी दस्तावेज नहीं दिए थे।
कोर्ट का विश्लेषण
मामले के रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने मुख्य मुद्दा तय किया कि क्या नोएडा ब्रोशर में अनिवार्य शर्त न होने के बावजूद फॉर्म-32 जमा न करने के आधार पर आवेदन निरस्त कर सकता था, और क्या किसी प्राधिकरण को प्रक्रिया शुरू होने के बाद पिछली तारीख से नई शर्त जोड़ने का अधिकार है।
अदालत ने माना कि आवेदन करने मात्र से आवंटन का पूर्ण अधिकार नहीं मिल जाता, लेकिन मौजूदा पात्रता की जांच करने और कोई नई पात्रता शर्त थोपने के बीच स्पष्ट अंतर होता है:
“मौजूदा पात्रता शर्त के सत्यापन और एक नई पात्रता या दस्तावेजी शर्त को जोड़ने के बीच का अंतर वर्तमान मामले में काफी महत्वपूर्ण है।”
कोर्ट ने कहा कि ब्रोशर में ऐसा कोई नियम नहीं था जिसमें फॉर्म-32 को निदेशक पद साबित करने का एकमात्र या अनिवार्य जरिया बनाया गया हो। नोएडा के सत्यापन संबंधी तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“किसी पात्रता शर्त के सत्यापन की शक्ति प्राधिकरण को योजना की शर्तों को दोबारा लिखने का अधिकार नहीं देती। यदि किसी आवेदक द्वारा दिए गए दस्तावेज अपर्याप्त माने गए थे, तो प्राधिकरण सत्यापन के लिए अतिरिक्त सामग्री मांग सकता था, जैसा कि बाद में हुआ भी। लेकिन बाद में फॉर्म-32 मंगाए जाने से यह पिछली तारीख से साबित नहीं हो जाता कि मूल आवेदन के साथ इसे जमा करना एक अनिवार्य शर्त थी, जबकि ब्रोशर में ऐसी कोई शर्त मौजूद ही नहीं थी।”
नोएडा द्वारा बार-बार आधार बदलने पर आपत्ति जताते हुए कोर्ट ने कहा:
“विपक्षी पक्षों को एक अस्थिर आधार के निरस्त हो जाने के बाद एक ऐसी नई शर्त की खोज करके उसे सुधारने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जो आवेदक को कभी बताई ही नहीं गई थी और विज्ञापित योजना का हिस्सा भी नहीं थी।”
खेल के नियम बीच में न बदले जाने के सिद्धांत पर जस्टिस इरशाद अली ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के नजीरों का उल्लेख किया:
- के. मंजूश्री बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था: “खेल के नियम, अर्थात चयन के मानदंड, चयन प्रक्रिया शुरू होने के बीच में या उसके बाद संबंधित प्राधिकरणों द्वारा नहीं बदले जा सकते… यहां स्थिति और भी गंभीर है। यहां न केवल खेल के नियम बदले गए, बल्कि खेल खेले जाने और परिणाम की प्रतीक्षा के दौरान बदले गए। यह अस्वीकार्य और अस्वीकार्य है।”
- तेज प्रकाश पाठक बनाम राजस्थान हाईकोर्ट मामले में संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था: “खेल के नियमों को बीच में या खेल खत्म होने के बाद नहीं बदला जाना चाहिए।”
- दिल्ली विकास प्राधिकरण बनाम जॉइंट एक्शन कमेटी, अलॉटी ऑफ एसएफएस फ्लैट्स मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि अनुबंध का कोई भी पक्ष बाद में एकतरफा कार्यालय आदेशों के जरिए ऐसी शर्तें नहीं थोप सकता जो मूल प्रस्ताव या सार्वजनिक सूचना का हिस्सा नहीं थीं।
- नरेश चंद्र गुप्ता बनाम कलेक्टर, यूपी मामले में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना था कि एक बार चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद संशोधित नियम लागू नहीं किए जा सकते।
इन कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा:
“इसलिए ‘खेल शुरू होने के बाद खेल के नियम नहीं बदले जा सकते’ का सिद्धांत वर्तमान मामले के तथ्यों पर पूरी तरह लागू होता है। इस मामले में ‘खेल’ आवासीय भूखंड योजना, 2006 (1) के तहत आवेदनों पर विचार करने की प्रक्रिया है। उस प्रक्रिया के नियम योजना के ब्रोशर में दर्ज थे। याचिकाकर्ता ने उन घोषित शर्तों के अनुसार 16.06.2006 को अपना आवेदन जमा करके प्रक्रिया में प्रवेश किया था। विपक्षी पक्ष निश्चित रूप से याचिकाकर्ता के दावे की जांच और सत्यापन कर सकते थे, लेकिन वे प्रक्रिया शुरू होने के बाद फॉर्म-32 को पात्रता की अनिवार्य शर्त में तब्दील नहीं कर सकते थे, जबकि ब्रोशर से ऐसी किसी आवश्यकता का कोई प्रमाण नहीं मिलता।”
कोर्ट ने पुनरीक्षण प्राधिकारी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि अन्य आवेदकों को भी इसी आधार पर निरस्त किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी गैर-कानूनी शर्त को सबके ऊपर समान रूप से लागू कर देने से वह शर्त वैध नहीं बन जाती।
लंबी मुकदमेबाजी के प्रभाव पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकारियों के गलत फैसलों के कारण हुई देरी का खामियाजा याचिकाकर्ता पर नहीं डाला जा सकता:
“विपक्षी पक्षों को अपने ही क्रमिक निर्णयों के कारण बीते समय का अनुचित लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके विपरीत निर्णय लेने से ऐसी स्थिति उत्पन्न होगी जहां एक आवेदक, जिसके दावे पर 2006 की योजना के तहत विचार होना चाहिए था, केवल इसलिए उस योजना के लाभ से वंचित हो जाएगा क्योंकि अधिकारियों ने उसके दावे को लगातार ऐसे आधारों पर खारिज किया जो न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं सके।”
कोर्ट का निर्णय और निर्देश
हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए प्रमुख सचिव द्वारा पारित 17 मार्च 2017 का पुनरीक्षण आदेश और नोएडा प्राधिकरण का 10 सितंबर 2012 का निरस्तीकरण आदेश रद्द कर दिया।
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- नोएडा और राज्य प्राधिकरण याचिकाकर्ता के 16 जून 2006 के आवेदन पर 2006 की योजना की मूल शर्तों के अनुसार पुनर्विचार करें और उस पर अमल करें। इसमें फॉर्म-32 को मूल आवेदन के साथ न होने के आधार पर अनिवार्य दस्तावेज के रूप में न थोपा जाए और न ही कोई अप्रचारित शर्त जोड़ी जाए।
- यदि याचिकाकर्ता द्वारा आवेदित मूल भूखंड या श्रेणी उपलब्ध है, तो औपचारिकताएं पूरी होने पर 2006 की योजना की मूल दरों पर ही वह भूखंड आवंटित किया जाए, जिसमें पहले जमा की गई राशि को समायोजित किया जाएगा।
- यदि मूल भूखंड उपलब्ध न हो, तो नोएडा सेक्टर-100 या किसी तुलनीय स्थान पर उसी प्रकार, श्रेणी और आकार का वैकल्पिक आवासीय भूखंड 2006 की मूल दर पर ही आवंटित करे। याचिकाकर्ता से कोई बढ़ी हुई या वर्तमान दर नहीं ली जाएगी।
- यह संपूर्ण प्रक्रिया आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के आठ सप्ताह के भीतर पूरी की जाए और याचिकाकर्ता को एक तर्कसंगत निर्णय से अवगत कराया जाए।
अपने आदेश के समापन में कोर्ट ने टिप्पणी की:
“‘खेल शुरू होने के बाद उसके नियम नहीं बदले जा सकते’ का सिद्धांत केवल भर्ती का कोई तकनीकी नियम नहीं है; यह राज्य की कार्रवाई में निष्पक्षता, पारदर्शिता और मनमानेपन के अभाव की व्यापक संवैधानिक आवश्यकता का एक पहलू है।”
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मैसर्स नलिनी खंडेलवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: रिट-सी संख्या 9739 वर्ष 2017
पीठ: जस्टिस इरशाद अली
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

